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तो देश के संविधान और कानून से ऊपर हैं बड़े कॉरपोरेट घराने

आपका नुकसान घोटाला और भ्रष्टाचार

अविनाश कुमार चंचल

आज तीसरे दिन भी प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने पर कुमार मंगलम बिरला और सीबीआई की तरफ से कोयला आवंटन घोटाला में उनपर नामजद एफआईआर की खबर जगह बनाए हुये हैं। हर रोज एक नयी खबर सनसनी बनकर पाठकों के दरवाजे पर फेंके जा रहे हैं। जनता के कई बड़े हुक्मरानों के नाम भी हर रोज इस मामले में सामने आ रहे हैं। कभी सिफारिशी चिट्ठी को लेकर नवीन पटनायक सामने आ जाते हैं तो कभी खुद वजीरे-आलम मनमोहन सिंह कटघरे में खड़े दिखते हैं।

इन अखबारी सुर्खियों के साथ-साथ हमारे देश का शहरी मध्यवर्ग भी उफान मार रहा है। क्या फेसबुक और क्या ट्विटर। हर जगह  कोयला घोटाले को लेकर सरकार की आलोचना हो रही है। पूरा शहरी मध्यवर्ग कोलगेट जैसे भ्रष्टचार को लेकर गुस्से में है।

तुम्हारा भ्रष्टाचार और हमारा डेवलपमेंट

लेकिन बात इतनी सीधी भी नहीं है। इस पूरे घोटाले से जो तबका सबसे अधिक प्रभावित होगा उसको बहस से दूर कर दिया गया है। इसी कोयले खदानों के आवंटन से लाखों गरीब-आदिवासी परिवारों के घर उजड़ने वाले हैं, इसी कोयले खदानों से उन आदिवासी और जंगलों पर अपनी जीविका के लिये निर्भर लोगों की रोजी-रोटी छीनी जानी है,  इसी कोयले खदान के आवंटन से गांवों और जंगलों में रहने वाला सिंगरौली का वो आदिवासी उजराज खैरवार फैक्ट्रियों में मजदूर हो जायेगा (अगर काम मिला तो) या फिर भीख माँगने को मजबूर होगा।

लेकिन दिक्कत यह है कि भ्रष्टाचार को लेकर जारी मध्यवर्गीय चिन्ताओं में खैरवार जैसे लोगों को शामिल ही नहीं किया गया है जो सबसे ज्यादा कोयले खदानों से या फिर इस कथित भ्रष्टाचार से प्रभावित हुये और होने वाले हैं।

मध्यवर्गीय चिन्ताओं-बहसों में बड़े आसानी से इसे विकास का नाम दे दिया जाता है और इससे भी ज्यादा क्रूर शब्द की बात करें तो कई लोग आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन से विस्थापन को विकास के लिये जायज ठहराते हुये कोलैटेरल डैमेज जैसे जुमले भी उछाल दिया करते हैं।

बात बहुत सीधी सी है- आपका नुकसान घोटाला और भ्रष्टाचार लेकिन दूसरी तरफ उन आदिवासियों का विस्थापन विकास के लिये जरूरी कोलैटेरल डैमेज।

असल मुद्दा घोटाला नहीं आवंटन ही है

चलो मान लेते हैं कि कोयले खदानों का आवंटन बड़े ही निष्पक्ष तरीके से किया जाता है। सरकार को जितने पैसे मिलने चाहिए उतना पैसा भी मिल जाता है लेकिन क्या इन सबसे आदिवासियों के साथ किये जा रहे भ्रष्टाचार को जस्टिफाई किया जा सकता है? क्या निष्पक्ष ढंग से किये गये कोयला खदानों के आवंटन को जंगलों पर निर्भर रहने वाले लोगों के लिये न्याय माना जा सकता है? क्या मध्यवर्गीय चिन्ता से ओत-प्रोत मीडिया कभी इन विस्थापितों की चिन्ताओं को पहले पन्ने की सुर्खियाँ बनाता? या फिर क्या मध्यवर्ग कभी इन विस्थापनों को विकास की जगह भ्रष्टाचार मानेगा?  इन सबका जबाव न में ही है।

शर्मनाक बयान केन्द्रीय मंत्रियों के

सीबीआई की तरफ से कुमार मंगलम बिरला पर की गयी एफआईआर को लेकर जिस तरीके से देश और जनता के हुक्मरान हल्ला मचा रहे हैं वो अपने आप में शर्मनाक है। केन्द्रीय मंत्री आनंद शर्मा सीबीआई की आलोचना सिर्फ इसलिये कर रहे हैं कि बिरला देश के बड़े उद्योगपति हैं और उन पर कोई एफआईआर दर्ज नहीं होना चाहिए। सिर्फ आनंद शर्मा ही नहीं सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा और मनीष तिवारी जैसे कद्दावर केन्द्रीय नेता भी देश की अर्थव्यवस्था के बहाने सीधा-सीधा संदेश दे रहे हैं कि बड़े कॉरपोरेट घराने देश के संविधान और कानून से ऊपर हैं।

आदिवासी विकास के लिये एक बाधा

अपने जंगल-जमीन बचाने के लिये संघर्ष कर रहे आदिवासियों पर टिप्पणी करते हुये कई बार शहरी मध्यवर्ग को कहते सुनता हूं कि ये लोग देश की अर्थव्यवस्था में बाधा ही हैं। इसी तरह अगर इन संघर्षों में कुछ हिंसा हो जाय तो यही लोग अहिंसा के गीत गाने शुरू कर देते हैं। शायद उस समय कोलैटेरल डैमेट की इनकी थ्योरी गायब हो जाती है।

अगर अब भी सरकार, शहरी मध्यवर्ग, मीडिया उजराज खैरवार जैसे आदिवासियों को न्याय नहीं दे पाएगा, उनके साथ हो रहे भ्रष्टाचार को विकास का नाम देता रहेगा तो फिर इस कॉरपोरेट केन्द्रित व्यवस्था में कोलगेट जैसे घोटाले होते रहेंगे।

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