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तो विकल्प क्या है?

विकल्प?
विवेक मेहता
कक्षा दसवीं तक आते-आते “आगे क्या करना है” ये सवाल ज़हन में उठने लगा था। बड़े भाई साहब का कहना था कि NDA की तैयारी कर फौज में जाने की कोशिश की जाए। मैंने परीक्षा तो दी लेकिन सलेक्शन हुआ नहीं।
फौज में तो जा नहीं पाया, लेकिन शिक्षक बन गया।
इन दिनों देश के पूर्वोतर की एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ाता हूं और वो भी इंजीनियरिंग।
शिक्षक या गुरू को इस देश में ऊंचा पद दिया जाता है। कभी-कभी तो भगवान से भी ऊंचा  – आखिर ऐसे ही तो कबीर ने नहीं लिखा:
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय ;बलिहारी गुरु आपने,गोविंद दियो बताय”
अपेक्षा की जाती है कि एक शिक्षक अपने छात्रों व समाज के लिये आदर्श प्रस्तुत करेगा। शिक्षक का व्यवहार आदर्श होगा।

अब कैसा व्यवहार “आदर्श” होगा ये समय और सामजिक ताने-बाने पर निर्भर करता है। लेकिन कम से कम किसी भी समय या समाज में एक शिक्षक या गुरू से यह अपेक्षा तो होगी ही कि वह अपने सांगठनिक या सामजिक ओहदे का इस्तेमाल अपने किसी छात्र  या अनुयायी का शोषण नहीं करेगा।
हमारे आज के समाज में भी यही अपेक्षा है। लेकिन आए-दिन कुछ ना कुछ ऐसा सुनने-पढ़ने-देखने को मिलता है जो कि इस आदर्श के ठीक उलट होता है, फिर चाहे वो कोई सामाजिक गुरू हों या किसी संस्था से जुड़े शिक्षक।
सामाजिक गुरुओं को छोड़ दें तो आज ही सुबह जब मैंने इंटरनेट पर “teacher held for rape”  सर्च किया  तो पहली खबर मेरे घरेलू राज्य मध्य प्रदेश की मिली।
एक चालीस वर्षीय स्कूली शिक्षक को अपनी तीन नाबालिग छात्राओं के साथ बलात्कार करने के आरोप में पकड़ा गया।
http://www.deccanchronicle.com/nation/crime/041016/madhya-pradesh-teacher-held-for-raping-3-minor-girls.html
उसके बाद की तमाम खबरों में भी पूरे देश भर (शिमला, मेघालय, कलकत्ता, मुंबई) से जुड़ी खबरें थीं जिसमें किसी स्कूली शिक्षक को छात्रों के दैहिक शोषण या उत्पीड़न के आरोप में पकड़ा गया है।

ऐसा हरगिज नहीं है कि ऐसी घटनाएं सिर्फ स्कूलों तक ही सीमित हों।
बड़े-बड़े कालेजों-यूनिवर्सिटियों भी में इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं।
अपने अनुभव से कहूं तो मैं स्वयं देश के जिस उच्च संस्थान में पढ़ा हूं, वहां भी ऐसी घटनाएं होती थीं।
वहीं दूसरी ओर ऐसे भी शिक्षक थे जो ऐसे मुद्दों को लेकर जागरूक थे व इनके खिलाफ आवाज़ भी उठाते थे।
कुल मिलाकर कह सकता हूं कि समाज में शिक्षक की एक आदर्श परिकल्पना व वैसे आदर्श प्रस्तुत करने वाले शिक्षकों के होने के बावजूद ऐसे भी शिक्षक हैं जो छात्रों का शोषण या उत्पीड़न करते हैं।
ऐसे में कल को अगर किसी नाटक या फिल्म में एक शिक्षक को एक छात्रा का बलात्कार करते दिखलाया जाए तो बतौर शिक्षक मुझे या मेरे परिवार वालों और अन्य शिक्षकों या उनके परिवार वालों को क्या करना चाहिए?

क्या हमें सड़क पर उतरकर हंगामा करना चाहिये?
नाटक या फिल्म को बंद व  डायरेक्टर या कलाकारों को जेल में‌ बंद करवाने की मांग करनी चाहिये?
शायद आप हंस रहे हों इन विकल्पों के बारे में सोचकर -शिक्षक व उनके परिवारों का समूह, सड़कों पर, ऐसी मांगों के लिये नारे लगाता हुआ “हमारी मांगे पूरी हों, चाहे जो मज़बूरी हो” वगैरह-वगैरह। 
मुझे तो हंसी भी आयेगी और थोड़ा गुस्सा भी, कि आखिर फिल्म या नाटक में समाज की एक हकीकत को ही तो दर्शाया गया है, तो फिर उसे लेकर इतना हंगामा क्यूं? ना जाने शिक्षण-व्यवस्था से जुड़ी कितनी अन्य मांगे हैं, उनके बारे में लोग सड़कों पर क्यूं नहीं उतरते?
खैर, शिक्षकों की ही तरह हर समाज में समाज के रक्षकों, रणबांकुरों या फौजियों को लेकर भी एक आदर्श भावना या सोच होती है।
अब यह “आदर्श” कैसे हैं व किससे किसकी “रक्षा” की बात है यह अपने आप में बड़े और गहरे सवाल हैं।
इन आदर्शों की गहराई में ना भी जाएं तो भी इनकी सतही झलकियां हमें समाज में दिखती रहती हैं।
अभी हाल ही में हरियाणा के सेंट्रल यूनिवर्सिटी में हुए महाश्वेता देवी के लिखे एक कथानक के चित्रण के मामले में भी हमें यही झलकियां दिखलाई दीं।

नाटक के किसी एक दृश्य में एक जवान को किसी महिला के साथ बलात्कार करते दिखलाया गया था।
लोग व छात्र संगठन सड़कों पर उतर आये। नाटक से जुड़े यूनिवर्सिटी के शिक्षकों व छात्रों के खिलाफ देश-विरोधी मामलों में केस चलाने की मांग होने लगी।
खतरा है कि शिक्षकों के खिलाफ सख्त कार्यवाही हो।
कथानक के इस दृश्य के बारे में पढ़ते ही मेरे दिमाग में जो पहली तस्वीर उभरी, वो थी मणिपुर की उन महिलाओं की, जो बिना कपड़ों के अपने हाथ में बड़ा सा बैनर लिये विरोध प्रदर्शन कर रही थीं। बैनर पर अंग्रेजी में लिखा हुआ था “भारतीय फौज हमारा बलात्कार करो”।

ये महिलाएं थेंगजम मनोरमा के “तथाकथित” बलात्कार व हत्या के बाद विरोध प्रदर्शन कर रही थीं।
तथाकथित इसलिये क्यूंकि आज तक यह सिद्ध नही हो पाया है कि मनोरमा के साथ बलात्कार हुआ भी था और अगर हुआ तो किसने किया। हालांकि जिस हालत में उसका बेजान शरीर मिला था उसे देखकर उन महिलाओं में से एक ज्ञानेश्वरी कहती हैं

“मैं मनोरमा को नहीं जानती थी, लेकिन एक लड़की के साथ ऐसा कुछ भयानक किया जा सकता है, देखकर मैं चौंक गई। इतनी भीषण क्रूरता कि मेरा दिल लहूलुहान हो गया। ऐसा लगा कि गिद्धों ने उसका शिकार किया हो।”

मनोरमा को एक रात असम राइफल्स के जवानों द्वारा घर से यह कह कर उठा लिया गया था कि वह एक उग्रवादी संगठन की सदस्य है। चंद घंटों बाद मिले उसके शरीर के गुप्तांग में 16 गोलियां मारे जाने के घाव थे।
http://www.outlookindia.com/website/story/indian-army-rape-us/296634
मनोरमा और निर्भया के साथ जो घटा, वो कई मायनों में शायद एक जैसा ही था। लेकिन इन दोनों मामलों में देश की अधिकतर जनता व तंत्र की प्रतिक्रिया एकदम अलग-अलग।
क्या इसका एक कारण एक मामले के तथाकथित आरोपियों का फौजी होना है?

‘Right to Justice’ Deprived by State: Case of ‘Manorama Vs AFSPA’ from Manipur, India

मणिपुर देश के उन हिस्सों में से एक है जहां आज भी AFSPA लागू है जिसके तहत फौज को विशेषाधिकार मिले हुए हैं।
हाल ही के समय के सबसे सम्मानित जजों में से एक जस्टिस वर्मा 2013 में गृह-मंत्रालय को सौंपी अपने आयोग की रपट में देश के ऐसे हिस्सों से आने वाली महिलाओं के साथ हुई बातचीत के आधार पर लिखते हैं कि 
“शुरुआत में हमें यह दिखता है कि देश के उस बड़े हिस्से में‌ जहां AFPSA लागू है वहां आंतरिक सुरक्षा कर्तव्यों की  प्रक्रिया की आड़ में व्यवस्थागत या छुटपुट यौन हिंसा के मामलों को वैधता दी जा रही है”।
निर्भया मामले के बाद महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न के  मामलों से जुड़े कानूनों में सुधार सुझाने के लिये बने इस तीन सदस्यीय आयोग ने एक महीने के भीतर ही अपनी रपट सरकार को सौंप दी थी।
http://www.thehindu.com/news/national/dont-allow-armymen-to-take-cover-under-afspa-says-verma/article4337125.ece
मैंने महाश्वेता देवी को बहुत नहीं पढ़ा है, लेकिन इतना जानता हूं कि उनकी कलम जनमानस के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ बखूबी चली है।
तो क्या महाश्वेता देवी ने जो अपने कथानक में लिखा वो समाज की एक सच्चाई को बयां नहीं करता?
क्या जस्टिस वर्मा जैसे काबिल व्यक्ति बिना किसी आधार के अपनी रपट में इतनी बड़ी बात लिखेंगे?
मैं तो नहीं मानता।
मैं मानता हूं कि शिक्षकों की ही तरह फौज में भी कुछ ऐसे भी व्यक्ति होंगे जो अपने विशेषाधिकारों का गलत इस्तेमाल करते होंगे या हैं।

तो क्या ऐसे लोगों को आम कानूनों के दायरे में सिर्फ इसलिये नहीं आना चाहिये क्यूंकि वो फौजी हैं?
मुझे तो नहीं लगता। अगर महाश्वेता देवी के कथानक को आधार बनाकर कोई हमारे समाज के इस पहलू को ऊजागर कर रहा है तो क्या हम उन लोगों को सजा देने की बात करेंगे या फिर अपनी व्यवस्था को दुरुस्त करने की।
विकल्प हमारे सामने हैं – आने वाला समाज इसी बात पर निर्भर करेगा कि सामूहिक तौर पर हम क्या विकल्प चुनते हैं।

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