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तौबा-तौबा ये चाल और चरित्र!

प्रदीप कुमार
ढाई साल के अन्दर ही भाजपा में बी.एस. येदुरप्पा की वापसी के साथ ‘अलग चाल, चलन और चरित्र’ का पार्टी का दावा एक बार फिर खोखला साबित हुआ। वापसी भी सुनिश्चित हुयी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार (वैसे इस पद के प्रथम प्रत्याशी लाल कृष्ण आडवाणी अब भी घात लगाए बैठे हैं) नरेंद्र मोदी की इच्छा पर। बड़ी उम्मीदों के साथ येदुरप्पा को वापस लाया गया है। उन्होंने कर्नाटक में विधानसभा का चुनाव जीत कर दक्षिण में पार्टी का झंडा ऊँचा किया था। उन्हीं की वजह से पार्टी के मुँह पर कालिख भी लगी थी और उन्हें बेआबरू होकर पार्टी से बाहर होना पड़ा था।
    यूँ तो येदुरप्पा सरकार की छवि पहले से ही धूमिल हो रही थी, नवंबर 2010 में खुलकर आरोप लगा कि बंगलूर और शिमोगा में हुये भूमि घोटालों में उनके पुत्रों को लाभ मिला। बेलारी, तुमकुर और चित्रदुर्ग में अवैध खनन में भी येदुरप्पा परिवार की संलिप्तता रोशनी में आई। लोकायुक्त संतोष हेगड़े की रिपोर्ट से येदुरप्पा पर मर्मांतक चोट हुयी। लोकायुक्त को सरेआम चुनौतियाँ दी जाने लगीं। येदुरप्पा कुर्सी पर बने रहने के लिये आखिरी वक्त तक विरोधियों से दो-दो हाथ करते रहे। पार्टी नेतृत्व का एक वर्ग भी उनके साथ खड़ा था। लेकिन वक्त उनके खिलाफ था। पार्टी लगातार कलंकित हो रही थी। 31 जुलाई 2011 को उन्होंने मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया।
    येदुरप्पा के इस्तीफे के फौरन बाद पार्टी नेतृत्व अचानक नैतिकता के हिमालय पर बैठा हुआ महसूस करने लगा। उन दिनों यात्राएँ कर रहे आडवाणी ने कहा, ‘‘हम पार्टी की किसी भी कमजोरी को हलके-फुल्के नहीं लेते। कर्नाटक में हमने यह साबित कर दिया। हमने उन्हें पहले ही चेतावनी दे दी थी। लेकिन लोकायुक्त रिपोर्ट आने के फौरन बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। हम इस तथ्य से अच्छी तरह अवगत हैं कि कांग्रेस के खिलाफ कोई भी पार्टी जनता का विश्वास नहीं जीत सकती, अगर वह खुद उसी तरह की कमजोरियों से ग्रस्त है।’’
    लोकायुक्त अदालत ने एक भूमि घोटाले में येदुरप्पा को जेल भेज दिया। आर.एस.एस. की इच्छा से भाजपा के अध्यक्ष बने नितिन गडकरी ने कहा, ‘‘जो भ्रष्टाचार में लिप्त रहना चाहते हैं, उनके लिए पार्टी में कोई स्थान नहीं हो सकता। उनके लिए दरवाजे बंद हैं।’’ जब बड़े नेता किसी को पीट रहे हों तो छोटों का भी हाथ साफ करने का मन हो जाता है। इसलिए शाह नवाज ने कहा, ‘‘भाजपा में भ्रष्टाचार बिल्कुल नाकाबिले बर्दाश्त है। लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद पार्टी ने कुछ दिनों नहीं, कुछ घंटों में फैसला ले लिया।’’
    उन दिनों चर्चा थी और असलियत भी यह थी कि आडवाणी और उनके समर्थक येदुरप्पा के सख्त खिलाफ हो गये थे। अनंत कुमार खुल कर बोल रहे थे। 9 जनवरी 2014 को बंगलूर में पार्टी मुख्यालय में इन्हीं अनंतजी ने येदुरप्पा को मिठाई खिलाकर पार्टी में उनका स्वागत किया। उन्होंने इस अवसर पर घोषणा की, ‘‘हम फिर अलग कभी नहीं होंगे। हम साथ-साथ रहेंगे। मिलकर संघर्ष करेंगे।’’  येदुरप्पा ने कहा, ‘‘जिस पार्टी को मैंने खड़ा किया था, मेरी अनुपस्थिति में उसे नुकसान पहुँचा। मैं पूरे राज्य का दौरा करूँगा और मोदी को मजबूत करने और प्रधानमंत्री बनवाने के लिये काम करूँगा।’’
    प्रधानमंत्री पद की लालसा क्या-क्या न करवाए। 2008 में कर्नाटक में पार्टी नेतृत्व जब येदुरप्पा के हाथों में था, भाजपा को लोकसभा की 50 में से 33 सीटें मिली थीं। 2008 में पार्टी को राज्य में 33.86 प्रतिशत मत मिले थे। 2013 के विधानसभा चुनाव में येदुरप्पा की कर्नाटक जनता पार्टी को 9.8 फीसदी वोट मिले, जिससे भाजपा 19.95 प्रतिशत पर ठहर गयी। भाजपा को उम्मीद है कि येदुरप्पा की वापसी से उनके लिंगायत समुदाय के अधिकांश वोट उसे प्राप्त हो जाएँगे। पार्टी में औपचारिक वापसी से पहले ही येदुरप्पा विश्वास व्यक्त कर चुके हैं कि कम से कम 28 सांसद तो वह मोदी को उपहार में दे ही देंगे।
यहाँ एक पेंच फँस रहा है। भाजपा अगर अन्य पार्टियों वाली कमजोरियों से ग्रस्त रही, तो वह जनता का विश्वास नहीं जीत पाएगी-आडवाणी की यह चेतावनी सही साबित हो गई तो?
लोकसंघर्ष पत्रिका चुनाव विशेषांक

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