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थर्ड जेंडर- वे भी पैदा नहीं होते बनाए जाते हैं

सामाजिक जेंडर व्यवस्था का डस्टबिन समझा जाता है थर्ड जेंडर को
अपर्णा दीक्षित
“औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।“ फ्रांसीसी नारीवादी लेखिका सीमोन द बाउवर का ये वाक्य जेंडर आधारित गैरबराबरी का सूत्र वाक्य है। इसे आगे बढ़ाते हुए भारतीय शिक्षाशास्त्री कृष्ण कुमार ने कहा “मर्द भी पैदा नहीं होते बनाए जाते हैं।” पैदा होने और बनने की इस प्रक्रिया में एक तीसरा जेंडर भी है। जिसके लिए कहना लाजमी है कि “वे भी पैदा नहीं होते बनाए जाते हैं।“ इस संदंर्भ में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला सराहनीय है। जिसके तहत थर्ड जेंडर को समाज में पहचान व शिक्षा व रोजगार में आरक्षण का आदेश दिया गया। फैसले की महत्ता उसके ‘बनाए जाने की’ प्रक्रिया में दखंलंदाज़ी है। उधार की आइडेंटिटी के साथ जिंदगी जी रहे बड़े समूह को लंबे वक्त के बाद उनका ख़ुद का अस्तिव मिल रहा है। शिक्षा व रोजगार के अवसर मिलना उनकी विकास प्रक्रिया की तरफ एक बड़ा कदम है। लेकिन क्या समाज उन्हें पुरुषत्व व स्त्रीत्व के काले व सफेद घेरे से परे थर्ड जेंडर के तौर पर देखना सीख पाएगा?

सामाजीकरण की प्रक्रिया में एक पुरुष को मर्दाना व स्त्री को जनाना के तौर पर विकसित किया जाता है। जबकि थर्ड जेंडर को समाज से अलग-थलग कर एक जबरदस्ती के स्त्री किरदार में जिंदगी निभानी पड़ती है। इसकी वज़ह स्त्रीत्व (फेमिनिटी) को कमजोर, उदासीन व अधूरे के तौर पर देखना है। इसके उलट मर्दाना वो है जो मजबूत, रचनात्मक व पूरा है। वो जीवन की जिस अवस्था में भी है संपूर्ण है। थर्ड जेंडर का मतलब मैस्कुलिन हरगिज़ नहीं हैं। इसीलिए वो पूरा नहीं है। यही वज़ह है कि थर्ड जेंडर समाज में स्त्रीत्व के नज़दीक देखा जाता हैं। जन्म लेते ही अपने परिवार, समुदाय व समाज से दूर अपने ही जैसे लोगों के बीच ये एक बेहद अलग आइडेंटिटी के साथ जिंदगी जीना सीखते हैं। इनका ये अस्तित्व तय सामाजिक मापदंडों में सम्मानीय नही, बल्कि एक गाली के तौर पर देखा जाता है। जिसे ये जीवन भर ढोते हैं।

थर्ड जेंडर एक आइडेंटिटी के तौर पर इसलिए भी उपयोगी नहीं माना जाता क्योंकि इनकी पुनुर्त्पादन में कोई भूमिका नहीं। इस लिहाज़ से पितृसत्तात्मक समाज में जहां स्त्री जीवन की सबसे बड़ी उपल्ब्धि बच्चा पैदा करना माना जाता है वहां थर्ड जेंडर को एक बेवज़ह के वजूद के तौर पर देखा जाता है। जिनके लिए मुख्यधारा के समाज में कोई जगह नहीं। इनकी पूरी जिंदगी शादी-ब्याह में नांचते-गाते, बलाएं लेते, तालियां पीटते गुजरती है। मानों ये पैदा ही इसके लिए हुए हो। कहते हैं इनकी दुआओं बहुत लगती हैं। लेकिन सिर्फ मर्द या औरत को। क्यों नहीं इनका कुनबा इनकी दुआओं का हक़दार बनता। दरअसल इन्हें सामाजिक जेंडर व्यवस्था का डस्टबिन समझा जाता है, जिसमें जो चाहे चार पैसे फेंककर अपनी बलाएं डाल दे और बदले में दुआए ले ले। सवाल बलाओं या दुआओं से हटकर इनके जीवन का है। इनके हिस्से में कोई खुशी नहीं, इनके लिए शर्म-हया का कोई बंधन नहीं, कोई घर नहीं, परिवार नहीं यहां तक कि समाज भी नहीं। इनके बढ़ने और गढ़ने का समाजशास्त्र बेहद गूढ़ है, क्योंकि ये तय पैमानों में साधारण नहीं। इसलिए उपयोगी नहीं और इनके हिस्से में कुछ भी नहीं।

प्रचलित मानदंडों के अनुसार समाज काले-सफेद व अच्छे-बुरे के पैमाने पर ही चीजों को देखता व परखता है। इस लिहाज़ से इसके बीच के सभी रंग, अस्तित्व और सच अस्वीकार्य है। इस स्थिति में थर्ड जेंडर इस तरह की सोच के बीच एक सवाल है। इनके होने के सच और न होने के भ्रम के बीच ही इनका एक झूठा अस्तित्व तैयार होता है। जिसका आधार बेमानी है। यही वज़ह है कि इस तीसरी आबादी का भविष्य गुमनाम है। अपने खोखले अस्तित्व के साथ समाजीकरण की प्रक्रिया के तहत ये एक असाधारण व्यक्तित्व के तौर पर गढ़े जाते हैं। जाहिर तौर पर इस स्थिति में न ही इनका सम्मान इन्हें मिलता है, न ही ज़ायज हक़।

इन हालात में सुप्रीम कोर्ट का आदेश तीसरी आबादी के अस्तित्व की नींव है। लेकिन सवाल फैसले की सामाजिक स्वीकार्यता का है। ये आदेश भी कहीं दूसरे कानूनों की तरह तो बनकर नहीं रह जाएगा जो सिर्फ कागज़ों पर लिखे और पालन किए जाते है? दरअसल मसला अब समाजीकरण की प्रक्रिया में मज़बूत दखंलदाजी का है। जिसेक तहत एक व्यक्ति को मर्द, औरत या तीसरे जेंडर से हटकर एक व्यक्ति के तौर पोसा जाए। उसे उसके हक़ पूरे सम्मान के साथ मिले। बराबरी से पढ़ने, सीखने और आगे बढ़ने के मौके मिलें। एक साधारण जिंदगी जीने का अवसर मिले। काले-सफेद दीवारों से परे उन्हें उनका आसमान मिले। जहां उनके पास शिक्षा हो, नौकरी हो, उनका अपना अस्तित्व हो और एक साधारण जिंदगी भी।

इस फैसले की सार्थकता इसकी समाजिक स्वीकार्यता में हैं। सामाजिक स्थलों पर झूठी मुस्कान के साथ सिर हिलाते हुए देश की इस तीसरी आबादी को सहानुभूति का टुकड़ा फेंकने के बजाय अगर हम उन्हें परानूभुति के साथ उनके अस्तित्व को समझ और अपना पाए तो शायद यह फैसला भविष्य में मानव जाति के विकास में एक नींव का पत्थर साबित होगा। वक्त जेंडर को मैस्कुलिनिटी, फैमिनिटी व थर्ड जेंडर के दायरे से परे इन्डीविडुएलिटी के फ्रेम में देखने का है। समाजीकरण की प्रक्रिया को पुनर्परिभाषित कर एक जेंडर इक्वेल माहौल तैयार करने का है। जिसके बिना इस या ऐसे ही दूसरे आदेशों का वजूद सिर्फ कागज़ों पर होगा हक़ीकत में नहीं।

About the author

अपर्णा दीक्षित, रिसर्च असिस्टेंट, सरोजिनी नायडू सेंटर फॉर वीमेन्स स्टडीज़, जामिया मिलिया इस्लामिया- नई दिल्ली

 

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