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‘‘थी खबर गर्म कि गालिब के उड़ेंगे पुर्जे………….’’

कभी जनवादी और प्रगतिशील विचारधारा के झंडाबरदार रहे हिंदी के शीर्ष कथाकार, क्रांतिकारी सम्पादक राजेन्द्र यादव की कथनी और करनी में कितना फर्क हो गया है, इसका अहसास हाल ही में हंसाक्षर ट्रस्ट के वार्षिक आयोजन में हुआ। इस मर्तबा संगोष्ठी का विषय ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ था और विषय पर बोलने वाले वक्ता थे जानी-मानी लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती राय, वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, वामपंथी चिंतक, कवि वरवर राव, अपने लेखन से समूचे एशिया में विवादित लेखिका तस्लीमा नसरीन और संघ परिवार से संबंद्ध केएन गोविंदाचार्य।

जाहिर है कि लोगों को सबसे ज्यादा आश्चर्य गोविंदाचार्य के नाम पर ही था। संगोष्ठी के विषय और वक्ताओं के नाम ने राजधानी दिल्ली समेत दूरदराज से आए साहित्यकारों, लेखक-पत्रकारों, बुद्धिजीवियों में एक उत्सुकता पैदा कर दी थी कि ‘देखें इस बार क्या हंगामाखेज होता है’ ? पर आखिर में सभी के हाथ निराशा ही आई। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया, वह भी मरी हुई।

कार्यक्रम की शुरूआत में ही लोगों को यह खबर मिल गई कि गोविंदाचार्य के साथ मंच साझा करने से नाराज अरुंधती राय और वरवरा राव ने कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया है और तस्लीमा नसरीन को सुरक्षा कारणों से कार्यक्रम में आने की इजाजत नहीं मिली है। बाद में सुनने में यह आया कि अरुंधती राय से इस कार्यक्रम के लिए उनकी सहमति भी नहीं ली गई थी। वहीं वरवरा राव को भी आखिर तक यह नहीं बतलाया गया कि कार्यक्रम में कौन-कौन आने वाला है ? आयोजकों ने वरवरा राव को पूरी तरह से अंधेरे में रखकर उनसे उनकी सहमति ली।

जाहिर है, जब दिल्ली आने पर वामपंथी कवि को यह बात मालूम चली, तो उन्होंने इस कार्यक्रम से किनारा करना ही उचित समझा।

अरुंधती राय और वरवरा राव के न आने से कार्यक्रम की जो भद्द पिटी तो पिटी, रही सही कसर संघ के भूतपूर्व प्रचारक गोविंदाचार्य के वक्तव्य ने भी पूरी कर दी। ओपनर के तौर पर उतरे गोविंदाचार्य, माइक पर सिर्फ पांच मिनिट ही टिक पाए। वे जो कुछ बोले, उसका तआल्लुक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से तो कतई नहीं था।

गोविंदाचार्य के मुख्तसर से वक्तव्य के बाद आयोजकों के सामने अजब स्थिति पैदा हो गई कि अब क्या करें ? मंच पर अब सिर्फ कवि अशोक वाजपेयी बचे थे, जिनका जिम्मा कार्यक्रम की अध्यक्षता का था। मजबूरन संचालक महोदय ने अशोक वाजपेयी साहब को आमंत्रित किया कि वे अपना अध्यक्षीय वक्तव्य श्रोताओं के सामने रखें।

वाजपेयी साहब ने उम्मीद के मुताबिक कभी आक्रामक होकर, तो कभी चुटकी लेते हुए अपनी बात पूरी की। अशोक वाजपेयी के वक्तव्य के बाद एक बार फिर कार्यक्रम के आयोजकों ने श्रोताओं को दिलासा दी कि जल्द ही तस्लीमा नसरीन आपसे रु-ब-रु होंगी। लेकिन आधे घंटे से ज्यादा इंतजार के बाद भी तस्लीमा कार्यक्रम में हाजिर नहीं हो पाईं। जब इंतजार लंबा हो गया, तो श्रोताओं ने कार्यक्रम से उठने में ही अपनी भलाई समझी। इस नाटकीय पसमंजर पर चचा गालिब का एक शैर क्या खूब मौजू़ बैठा है। आप भी लुत्फ फरमाईए-‘‘थी खबर गर्म कि गालिब के उड़ेंगे पुर्जे, देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ।’’

जाहिद खान

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