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दंगों की भयावहता में वृद्धि, चुनाव नज़दीक हैं न!

क्या सांप्रदायिक हिंसा 2013
(भाग-1)
इरफान इंजीनियर
केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और आईबी के निदेशक सैय्यद आसिफ इब्राहिम ने हाल में आयोजित राज्यों के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुये इस तरह की प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया जिससे साम्प्रदायिक दंगों को शुरू होने से पहले ही रोका जा सके। दुःख की बात यह है कि पुलिस अक्सर दंगे भड़कने का पूर्वानुमान लगाने में असफल रहती है और इस सम्बंध में संकेतों को नजरअंदाज करती है। साम्प्रदायिक हिंसा की दृष्टि से वर्ष 2013, उसके पिछले साल से और खराब गुजरा। राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में गृह मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, सन् 2013 में देश के विभिन्न भागों में हुयी साम्प्रदायिक हिंसा में 107 लोग मारे गये, जिनमें 66 मुसलमान थे और 41 हिन्दू। वर्ष में साम्प्रदायिक हिंसा की कुल 479 घटनाएं हुयीं, जिनमें 107 मौतों के अलावा 1697 लोग घायल हुये, जिनमें से 794 हिन्दू थे, 703 मुसलमान और 200 पुलिसकर्मी। बिहार में साम्प्रदायिक गड़बड़ी की 40 घटनाएं हुयीं और अन्य 25 मौकों पर साम्प्रदायिक तनाव उपजा। बिहार में 9 मौतें हुयीं। मृतकों में से 5 हिन्दू थे और 4 मुसलमान, जबकि घायलों में 123 हिन्दू थे, 66 मुसलमान और 19 पुलिसकर्मी।
गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा की कुल 64 वारदातों में 6 मौतें (3 मुसलमान व 3 हिन्दू) हुयीं और 147 लोग घायल हुये (85 हिन्दू, 57 मुसलमान व 5 पुलिसकर्मी)। पिछले साल राज्य में 5 मौतें हुयीं थीं और 500 व्यक्ति घायल हुये थे। घटनाओं की संख्या की दृष्टि से गुजरात, उत्तरप्रदेश के बाद दूसरे नम्बर पर है परंतु बिहार में मृतकों की संख्या गुजरात से अधिक है।
उत्तरप्रदेश में साम्प्रदायिक हिंसा में सबसे ज्यादा मौतें हुयीं। अक्टूबर 2013 तक वहां 62 लोग मारे जा चुके थे। दिनांक 18 अक्टूबर के इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार मुजफ्फरनगर दंगों में 62 लोग मारे गये जिनमें से 46 मुसलमान थे और 16 हिन्दू।
सन् 2012 में देश में साम्प्रदायिक हिंसा की 640 घटनाएं हुयीं थीं जिनमें 93 व्यक्ति-48 मुसलमान, 44 हिन्दू और एक पुलिसकर्मी-मारे गये थे और 2067 व्यक्ति घायल हुये थे, जिनमें 1010 हिन्दू थे, 787 मुसलमान, 222 पुलिसकर्मी और 48 अन्य। यद्यपि 2013 में साम्प्रादायिक हिंसा की घटनाओं में 2012 की तुलना में कमी आई तथापि इन घटनाओं में मौतों की संख्या 93 से बढ़कर 107 हो गई। सन् 2012 में भी उत्तरप्रदेश में सबसे अधिक 117 घटनाएं हुयीं थीं जिनमें 39 लोग मारे गये थे। इनमें से 20 हिन्दू थे और 19 मुसलमान।
सन् 2013 में दंगों की भयावहता में वृद्धि का एक कारण लोकसभा चुनावों का नजदीक आना है। इसके लिये मतदाताओं को जातिगत और सांप्रदायिक आधारों पर ध्रुवीकृत किया जा रहा है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने अपने विश्वासपात्र सिपहसालार अमित शाह को उत्तरप्रदेश राज्य का प्रभारी नियुक्त किया है। अमित शाह उस स्थल पर पहुँचे जहाँ कभी बाबरी मस्जिद हुआ करती थी और रामजन्मभूमि मंदिर के निर्माण के लिये प्रार्थना की। इसके बाद संघ परिवार ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के लिये अयोध्या में 84 कोसी परिक्रमा का आयोजन किया। ज्ञातव्य है कि इस तरह की यात्रा की कोई परम्परा नहीं थी। संघ परिवार ने मुसलमान लड़कों और हिन्दू लड़कियों के बीच प्रेम को ‘लव जिहाद’ की संज्ञा दी।
‘बांग्लादेश से गैरकानूनी घुसपैठ’ को एक बड़ा मुद्दा बनाया गया और असम, दिल्ली, मुंबई व अन्य राज्यों में रहने वाले बांग्लाभाषी मुसलमानों को ‘अवैध घुसपैठिया’ घोषित कर दिया गया। ऑल असम स्टूडेन्टस यूनियन के अतिरिक्त बोडोलैण्ड के बोडो नेता भी अब अपने उन पड़ोसियों को अवैध घुसपैठिये बता रहे हैं जो उनके मोहल्लों में पीढ़ियों से रह रहे हैं। गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और कुछ हद तक महाराष्ट्र में गौवध निषेध अभियान चलाये गये। इस अभियान के अन्तर्गत पुलिस के सहयोग से संघ परिवार के स्वनियुक्त धर्मरक्षक ऐसी गाडि़यों को रोकते हैं जिनमें मवेशियों को ढोया जा रहा हो। अगर वाहन का मालिक या ड्रायवर मुसलमान हो तो उनसे भारी रिश्वत की माँग की जाती है। अगर वे रिश्वत नहीं देते तो पुलिस को बुलाकर उनका वाहन और मवेशियों को इस आधार पर जब्त करा दिया जाता है कि वे गायों को वध के लिये बेचने ले जा रहे थे। अक्सर मुसलमान मालिक या ड्रायवर की जमकर पिटाई भी की जाती है। इन नए मुद्दों के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं है कि संघ परिवार ने अपने पुराने मुद्दे त्याग दिये हैं। जो दुष्प्रचार संघ परिवार वर्षों से करता आ रहा है वह 2013 में भी जारी रहा। इसमें शामिल है ‘सभी मुसलमान आतंकवादी होते हैं’, ‘मुसलमान पाकिस्तान के प्रति वफादार होते हैं’, ‘बहुपत्नि प्रथा के कारण मुस्लिम आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है और जल्दी ही वे देश में बहुसंख्यक बन जाएंगे’ आदि। इन मुद्दों पर अनवरत दुष्प्रचार और इनके जरिए समर्थन जुटाने की कोशिशों के कारण ही साम्प्रदायिक दंगों में मृतकों की संख्या में इजाफा हुआ। सन् 2012 की तुलना में सन् 2013 में दंगायी तुलनात्मक दृष्टि से अधिक खतरनाक हथियारों से लैस थे और दंगों की योजना भी बेहतर ढंग से बनायी गयी थी। संघ परिवार की दंगों में संलिप्तता इस तथ्य से जाहिर है कि बिहार में आरजेडी-भाजपा गठबंधन टूटने के चार हफ्तों के भीतर साम्प्रदायिक हिंसा की 17 घटनाएं हुयीं। छःह सप्ताह बाद यह आँकड़ा 24 पर पहुँच गया।
सन् 2013 में संघ परिवार ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिये बड़े स्तर पर हिंसा तो करवाई ही, लम्बे समय तक चलने वाली छुटपुट हिंसा का इस्तेमाल भी किया। जहाँ मुजफ्फरनगर और किश्तवार, बड़े पैमाने पर किन्तु सीमित समय के लिये दंगे करवाने के उदाहरण हैं वहीं मध्यप्रदेश और गुजरात सहित कई अन्य राज्यों में हिंसा की आग को धीमे-धीमे सुलगाये रखा गया। अफवाहों के अलावा दंगाईयों को इकट्ठा करने के लिये सोशल मीडिया का भी जमकर इस्तेमाल हुआ। भाजपा विधायक संगीत सोम को एक नकली एमएमएस प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इस एसएमएस को मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के इलाकों में इस दावे के साथ प्रसारित किया गया कि उसमें दिखाए गये दृश्य सचिन और गौरव नामक दो हिन्दू लड़कों की मुसलमानों द्वारा पिटाई के हैं। इन दोनों लड़कों की बाद में मृत्यु हो गयी। जो वीडियो क्लिप इस्तेमाल की गयी, दरअसल, वह पाकिस्तान में हुयी किसी घटना की थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि वीडियो क्लिप ने जाट महापंचायत में भारी भीड़ इकट्ठा करने में मदद की। मुजफ्फरनगर में हुयी क्रूर हिंसा और महिलाओं का शीलभंग करने की बड़े पैमाने पर कोशिशों के लिये भी यह एमएमएस काफी हद तक जिम्मेदार था। एक महिला के शव के दो टुकड़े कर दिये गये और एक 10 वर्ष के बच्चे का सिर फोड़ दिया गया। जिन 53 शवों का शवपरीक्षण किया गया उनमें से 13 को इस बुरी तरह से मारा गया था कि उन्हें पहचानना बहुत मुश्किल था।
मुजफ्फरनगर घटना का एक चिंताजनक पहलू यह है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का वाईरस ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैल गया है। इस इलाके के जाट और मुसलमान-जिनमें से अधिकांश पिछड़ी जातियों के हैं, की एक ही संस्कृति है और वे एक ही बोली बोलते हैं। वे सदियों से मिलजुल कर रह रहे हैं और उन्होंने सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में कंधे से कंधा मिलाकर हिस्सेदारी की थी। लव जिहाद के दुष्प्रचार और ‘बहू-बेटी बचाओ अभियान’ के जरिए जाटों-जो अपनी महिलाओं पर बहुत कड़ा नियंत्रण रखते हैं-को यह विश्वास दिला दिया गया कि उनकी बहू-बेटियों को आदमखोर मुसलमानों से खतरा है। इन दंगों का चार जिलों के ग्रामीण इलाकों में फैल जाना चिंताजनक है। अपने घरों से बेघर कर दिये गये मुसलमान अब भी अपने गांव वापस नहीं जा पाए हैं।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र में सन् 2013 में साम्प्रदायिक हिंसा की 64 घटनाएं हुयीं जिनमें 11 लोग मारे गये और 271 घायल हुये। मृतकों में से 11 अल्पसंख्यक समुदाय से थे। घायलों में 101 हिन्दू थे, 106 मुसलमान और 64 पुलिसकर्मी।
सन् 2013 में राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा की शुरूआत धुले से हुयी। एक मुसलमान ऑटो ड्रायवर की शहर के केन्द्र में स्थित माधवपुर में एक रेस्टोरेंट के मालिक किशोर वाघ से 30 रूपए के बिल को लेकर विवाद हुआ। वाघ ने ऑटो ड्रायवर के चेहरे पर करछुल से वार किया। ड्रायवर जल्दी ही करीब एक दर्जन युवकों के साथ वापस पहुंचा। इस बीच रेस्टोरेंट में भी लोग इकट्ठा हो गये थे। मुस्लिम दंगाईयों ने पास में स्थित पुलिस चौकी का फर्नीचर और दस्तावेज बाहर निकाले और सड़क पर रखकर उनमें आग लगा दी। इसके बाद बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी वहां पहुंचे और उन्होंने हिंसक भीड़ पर गोलियां चलाईं। गोलीचालन में छह मुसलमान मारे गये और 229 घायल हुये। घटना में 113 पुलिसकर्मियों को भी चोटे आईं।
यह घटना 6 जनवरी 2013 की है। बाद में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा घटना की जांच में यह पाया गया कि पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया था और सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया। इसके बाद, 8 फरवरी को 6 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया जिनमें से दो को इस आधार पर निलंबित कर दिया गया कि उन्होंने इलाके में लूटपाट की।
दिनांक 5 फरवरी 2013 को बुलढ़ाना जिले के लोमार कस्बे में साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न हुआ। बहुसंख्यक समुदाय का एक सदस्य अस्पताल में इलाज के दौरान मर गया। पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया। भारी पुलिस बल की तैनाती और तलाशी अभियान के कारण दंगे फैल नहीं सके।
जलगांव जिले की रावेर तहसील के सौदा गांव में 13 जून को दो समुदायों की भीड़ के बीच हिंसा के बाद कर्फ्यू लगाया गया। इस हिंसा में कई मकानों और दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। सात लोग घायल हुये और बीस को गिरफ्तार किया गया।
मुंबई के अगरीपाड़ा इलाके में 18 अगस्त को साम्प्रदायिक झड़प हुयी। शिवसैनिक एक मुस्लिम दुकानदार से गणेशोत्सव के लिये एक खास राशि चंदे के रूप में मांग रहे थे। व्यापारी ने कहा कि उसका धंधा बहुत अच्छा नहीं चल रहा है और वह उतनी राशि देने में असमर्थ है। इसके बाद हिंसा भड़क उठी। स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश में दो पुलिसकर्मी घायल हुये।
 राजस्थान
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के मुस्लिम बहुल सावा गांव में 28 जून को एक सड़क दुर्घटना के बाद हिंसा भड़क उठी। एक व्यक्ति को डंपर द्वारा कुचल दिये जाने के बाद गुस्साई भीड़ ने डंपर में आग लगा दी और मुआवजे की मांग की। खदान मालिकों ने अपने गुंडों की फौज गांव भेजी, जिसने कई दुकानों में आग लगा दी। कुल मिलाकर 34 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से गांव के सरपंच सहित 22 अल्पसंख्यक समुदाय के थे और 12 बहुसंख्यक समुदाय के। पुलिस के गोलीचालन में एक व्यक्ति घायल हुआ।
प्रदेश के टोंक शहर में 11 जुलाई को जिस समय मुसलमान छावनी जामा मस्जिद में मगरिब की नमाज अदा कर रहे थे, उसी समय निकट के कीर हिन्दू इलाके से एक बारात मस्जिद के सामने से गुजरी। बारात में तेज आवाज में बज रहा डीजे शामिल था। जब बारात कुछ ज्यादा ही देर तक मस्जिद के दरवाजे के सामने रूकी रही तब कुछ लोगों ने यह अनुरोध किया कि वहां डीजे न बजाया जाये। इसके बाद गर्मागर्मी हुयी और दोनों तरफ से पत्थरबाजी शुरू हो गयी। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित किया। इसके अगले दिन 12 जुलाई को जब मुसलमान उसी मस्जिद में जुमे की नमाज अदा करने इकट्ठा हुये तब वहां भारी पुलिस बल तैनात था। नमाज खत्म होने के बाद लोग शांतिपूर्वक मस्जिद से बाहर निकलने लगे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सब कुछ शांतिपूर्वक हो रहा था और स्थिति नियंत्रण में थी। लोग अपने घरों की ओर जा रहे थे। तभी अचानक, बिना किसी कारण के, लगभग 150 पुलिसकर्मी बगल में स्थित मदरसे से मस्जिद के पिछले दरवाजे को तोड़कर अंदर घुस आये और वहां इकट्ठा लोगों पर अश्रु गैस के गोले छोड़ने लगे। एक गोला नासिर नाम के युवक के चेहरे पर लगा और उसकी वहीं मौत हो गई। एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया। उसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया और बुजुर्गों सहित सभी लोगों की जमकर पिटाई की। लगभग 80 लोग घायल हुये और दो की मृत्यु हो गयी।
(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)
(अगले अंक में जारी)

About the author

इरफान इंजीनियर, लेखक इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज़ एण्ड कंफ्लिक्ट रिसॉल्यूशन (Institute for Peace Studies & Conflict Resolution) के निदेशक हैं

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