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दक्षिणपंथ ही है केजरीवाल का न दक्षिण न वाम

डॉ. गिरीश
आपातकाल के दिनों में स्व. संजय गाँधी ने नारा दिया था- न वामपंथ न दक्षिणपंथ। तब हम वामपंथियों ने दो टूक कहा था कि जो वामपंथी नहीं है वह दक्षिणपंथी ही है। संजय गाँधी की इस लाइन का सार्वजनिक रूप से विरोध करने पर इन पंक्तियों के लेखक समेत कईयों को तत्कालीन शासन ने आपातकाल विरोधी घोषित कर दिया था, अतएव हमें भूमिगत होना पड़ा था।
ऐसे ही नायाब विचार अब आम आदमी पार्टी(आप) के नेता अरविन्द केजरीवाल ने व्यक्त किये हैं। दिल्ली में कन्फेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज (सीआइआइ) की बैठक में केजरीवाल ने कहा कि वे न तो पूँजीवाद के खिलाफ हैं न निजीकरण के। कारोबार में सरकार का कोई काम नहीं है। यह सब निजी क्षेत्र के लिये छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्होंने इंस्पेक्टर राज एवम् लाइसेंस राज के खिलाफ होने की घोषणा भी की। इससे पहले वे यह भी कह चुके हैं कि हम न तो पूँजीवादी हैं न समाजवादी या वामपंथी। हम तो बस आम आदमी हैं और किसी खास विचारधारा से जुड़े हुये नहीं हैं। अपनी समस्याएं हल करने के लिये चाहे दक्षिण हो या वाम, हम किसी भी विचारधारा से विचार उधार ले सकते हैं।
केजरीवाल और उनके समर्थकों को यह बताया जाना जरूरी है कि पूँजीवाद का अस्तित्व और विकास आम आदमी के शोषण पर टिका है। आम आदमी का विकास और उत्थान समाजवादी व्यवस्था में ही सम्भव है। और समाजवादी व्यवस्था का आधार सार्वजनिक क्षेत्र है निजीकरण नहीं। फिर पूँजीवाद और निजीकरण की वकालत करके केजरीवाल किस आम आदमी की बात कर रहे हैं? वैसे तो वे आम आदमी की परिभाषा भी गढ़ चुके हैं- “ग्रेटर कैलाश (दिल्ली के धनाढ्य लोगों की आबादी) से लेकर झुग्गी- झोपड़ियों तक जो भी भ्रष्टाचार के खिलाफ है वह आम आदमी है”। वे शेर और बकरी को एक घाट पर पानी पिलाना चाहते हैं। यह पूँजीवाद का ही कानून है।
केजरीवाल का यह कथन कि सरकार का कारोबार में कोई काम नहीं और तमाम कारोबार निजी क्षेत्र के लिये छोड़ दिया जाना चाहिए, उनके उस नवउदारवादी द्रष्टिकोण का ही परिचायक है जिसकी वकालत हू-ब-हू इन्हीं तर्कों के साथ काँग्रेस और भाजपा दशकों से करती आ रही हैं। इस नजरिये का तो सीधा अर्थ है कि सभी आर्थिक गतिविधियाँ और उनके सभी क्षेत्र बाजार से संचालित होने चाहिये। यहाँ तक कि बिजली पानी की आपूर्ति और सार्वजनिक परिवहन जैसी बुनियादी सेवायें भी।
केजरीवाल ने कहा है कि इस बात की जरूरत है कि सरकार ऐसी अच्छी नियामक व्यवस्था कायम करे कि कारोबार और उद्यम खेल के नियमों के हिसाब से चलें। यह उनकी एक अच्छी कपोल-कल्पना है। अब तक के अनुभव तो यही बताते हैं कि कारोबारी और उद्यमी सरकारों की सदाशयता हासिल कर अपने मुनाफे और पूँजी का आकार बढ़ाते हैं और केजरीवाल जैसे दार्शनिक उनके फायदे के लिये वैचारिक प्रष्ठभूमि बनाने में जुटे रहते है। वैसे भी यह नव-उदारीकरण के मॉडल का ही हिस्सा है, जिसके तहत बड़ी पूँजी के हितों को आगे बढ़ाया जाता है। केजरीवाल ने दिल्ली की बिजली और पानी के निजीकरण के अपने विरोध को भी भुला दिया है। आखिर क्यों?
केजरीवाल ने यह भी कहा कि वह केवल दरबारी पूँजीवाद के खिलाफ हैं, पूँजीवाद के खिलाफ नहीं। उन्होंने दिल्ली में अंबानी सन्चालित बिजली आपूर्ति कम्पनियों के खिलाफ और रिलायंस गैस मूल्य निर्धारण के मुद्दे पर अपनी लड़ाई को दरबारी पूँजीवाद के खिलाफ बताया। वे इस बात पर अनजान बने हुये हैं कि बड़े पैमाने पर दरबारी पूँजीवाद का पनपना नव-उदारवादी व्यवस्था की ही देन है, जो प्राकृतिक संसाधनों की लूट को आसान बनाती है और पूरी तरह बड़े पूँजीपतियों के लिये मुनाफा बटोरने का रास्ता बनाती है।
यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि केजरीवाल को एनआरआई, निर्यातकों तथा उद्योग घरानों से जो चंदा मिलता है वह यह जान कर ही मिलता है कि वे वामपंथी नहीं हैं। वे ही लोग वामपंथियों को फूटी आँखों नहीं देखना नहीं चाहते।
अतएव आप भले ही न वामपंथ, न दक्षिणपंथ कह कर अपने को तटस्थ और भोला साबित करने की कोशिश करे। अब तक के उसके बयान एवम् कारगुजारियाँ उसे पूँजीवाद और आज के नव-उदारवाद के हितैषी के रूप में ही पेश करती हैं।

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डॉ. गिरीश, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के सचिव हैं।

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