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दक्षिण के गाँधीवादी संत शोभाकांत दास

चेन्नई, अगस्त (अंबरीश कुमार)। शुक्रवार की शाम चेन्नई के गोपालपुरम में जयप्रकाश नारायण के साथी शोभाकांत दास जी के यहाँ जब पहुँचा तो वे चरखा से सूत कात कर रहे थे। करीब तीस साल से अपना शोभाकांत जी से सम्बन्ध है जिसकी शुरुआत अस्सी के दशक में तब के मद्रास से एक अखबार निकालने को लेकर हुयी थी और तब मैं लखनऊ से पहली बार वाहिनी की साथी किरण और विजय के साथ मद्रास सेंट्रल के ठीक बगल में 59 गोविन्दप्पा नायकन स्ट्रीट पहुँचा था और बगल में ठहरने का इंतजाम था। बहुत ही अलग अनुभव था। उनका जड़ी बूटियों का बड़ा कारोबार स्थापित हो चुका था।

शोभाकांत जी के पुत्र तब तमिलनाडु छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के संयोजक भी थे और उनसे मित्रता हो गयी, क्योंकि वे अपनी उम्र के आस-पास के ही थे।

पत्रिका की योजना बनने से पहले ही विजय बिहार चले गये। हफ्ते भर बाद शोभाकांत जी का निर्देश हुआ कि मैं पत्रिका शुरू करने से पहले तमिलनाडु को समझूँ। उन्होंने अपने दफ्तर को कहा कि पांडिचेरी में अरविंदो आश्रम के गेस्ट हाउस में हम लोगों के रहने और आने-जाने का इंतजाम कर दिया जाये और खर्च के लिये नकद भी दे दिया जाये।

उस दौर में बिहार से रोजाना बहुत से लोग उनके यहाँ आते थे और सबका खाना भी साथ नीचे बैठकर ही होता था। शोभाकांत जी की पत्नी मैथिल बोलती थीं और उनका आतिथ्य कभी भूल नहीं सकता।

अमूमन इडली वड़ा, साम्भर आदि का नाश्ता तो पास के होटल से आ जाता था पर दोपहर और रात का खाना वे खुद बनाकर खिलाती थीं चाहे कितने ही लोग न हो। खाना उत्तर भारतीय होता था, बिहार का उसपर प्रभाव भी दिखता था।

तब बिहार के सभी वरिष्ठ नेता जो मद्रास आते थे शोभाकांत जी के ही मेहमान होते थे।

एम् करूणानिधि समेत तमिलनाडु के शीर्ष राजनीतिक भी उनके मित्र ही थे।

जयप्रकाश नारायण को शोभाकांत जी ने जो बादामी रंग की फिएट दी थी बाद में उससे हमने भी कई यात्रा कीं। पास में ही उनके मित्र और मीडिया के सबसे बड़े और कद्दावर व्यक्तित्व रामनाथ गोयनका का घर था।

कल बाद में दिल्ली से साथ आये वर्ल्ड सोशल फोरम के विजय प्रताप, भुवन पाठक और मुदगल जी से शोभाकांत जी की रात के भोजन पर मुलाक़ात हुयी तो उन्होंने विजय प्रताप से उलाहना देने के अंदाज में कहा – अंबरीश जी को तो मद्रास से अखबार निकालने के लिये बुलाया था पर जब इनका मन उत्तर भारत छोड़ने का नहीं हुआ तो रामनाथ गोयनका के पास भेज दिया। तब से आज तक वह अखबार नहीं निकल पाया।

खैर विजय प्रताप से गाँधी, जेपी, सुभाष चंद्र बोस से लेकर धर्मपाल और राजीव गाँधी तक के कई संस्मरण उन्होंने सुनाये। तेरह साल की उम्र में वे आजादी की लड़ाई से जुड़ गये थे और जवान होते-होते आंदोलन और जेल के बहुत से अनुभव हो चुके थे।

हजारीबाग जेल में जेपी को क्रांतिकारियों का पत्र पहुँचाते और उनका सन्देश बाहर लेकर आते। बाद में सरगुजा जेल में खुद रहना पड़ा।

जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी के नाम उन्होंने गुडवंचारी में आश्रम बनवाया जिसके ट्रस्ट में तमिलनाडु के सभी महत्वपूर्ण लोग शामिल थे और आस-पास के तीस गाँवों में इसका काम फैला हुआ था।

बिहार से बहुत से लोग मद्रास के वेलूर अस्पताल में इलाज करने आते तो वे शोभाकांत जी के घर या बादे में राजेंद्र भवन में रुकते जो उन्होंने मद्रास शहर के बीच बनवाया हुआ है।

कई साल पहले वाहिनी के सम्मेलन में ही शोभाकांत जी ने जनादेश वेबसाईट की शुरुआत की थी और मुलाक़ात होने पर उसकी भी चर्चा की।

अनुपम मिश्र की पुस्तक “आज भी खरे हैं तालाब” देख कर बोले- तमिल में इसे छपवा देता हूँ अगर वे इजाजत दे दें।

जयप्रकाश नारायण की कई पुतकों को वे तमिल भाषा में प्रकाशित करवा चुके हैं। बाद में तय हुआ पर्यावरण और परम्परागत चिकित्सा पद्धति पर तमिलनाडु में पहल की जाये और इसकी पहली बैठक बुलाने की जिम्मेदारी प्रदीप कुमार ने स्वीकार कर ली साथ ही तमिल में लोगों से संवाद की भी।

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