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दलितों के सबलीकरण को खत्म करने की खुलकर वकालत की जा रही है

दलित उत्पीड़न के ख़िलाफ़ प्रस्ताव
आज के दो दशक पहले उदारीकरण की अनुदार संरचना में धकेले जा रहे भारत की सुहानी तस्वीर एकध्रुवीय वैश्वीकरण के समर्थकों ने पेश की थी। सम्मोहन की उस अवस्था में लगा था कि इस संरचना में षामिल होने भर से देश की तमाम समस्याएं हल जो जाएंगी। सामाजिक प्रश्नों के संदर्भ में भी यह उम्मीद तारी हुई थी। लेकिन पिछले एक दशक में ही घटी घटनाओं को ध्यान में रखें तो पता चलेगा कि भारतीय समाज की वीभत्स सचाई, जातिवादी मनोरचना एक स्तर पर पहले से अधिक क्रूर, हिंसक और हमलावर हुई है। हाल फि़लहाल में दलितों पर हुए हिंसक हमलों की सूची बनायी जाये तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा हो जाता है। वर्ष 2005 में हरियाणा के गोहाना क़स्बे में वाल्मीकि बस्ती पर हमला करके लगभग सत्तर घर लूटे और जलाये गये। यहीं 2007 में सालवन में दलितों के 300 घर आग के हवाले कर दिये गये। 2010 में हरियाणा के ही हिसार जि़ले के मिर्चपुर गांव में दलितों के दो दर्जन से अधिक घर जला दिये गये और बारहवीं कक्षा की प्रतिभाशाली छात्रा सुमन (पोलियोग्रस्त) को पिता (ताराचंद वाल्मीकि) समेत जला दिया गया। जनवरी 2012 में ओडिशा के बोलंगीर जि़ले के लाठोर क़स्बे में दलित बस्ती पर हमला करके चालीस मकानों को तबाह कर दिया गया। लूट के बाद उनमें आग लगा दी गयी। नवंबर 2012 में तमिलनाडु के धर्मपुरी जि़ले में दलित-बहुल नायकनकोट्टाई गांव में दलितों की तीन बस्तियों पर धावा बोला गया और चार सौ से अधिक मकानों को लूटने के बाद आग के हवाले कर दिया गया।
जनवादी लेखक संघ का यह राष्ट्रीय सम्मेलन ऐसे दलितविरोधी जातिवादी हिंसा की पुरज़ोर निंदा करता है और सरकार से इस संबंध में कड़ी कार्रवाई की मांग करता है। भारतीय संविधान और संसद द्वारा उनकी सुरक्षा, सबलीकरण और विकास के लिए जो भी क़दम उठाये गये हैं, उन्हें ख़त्म करने की जिस तरह से खुल कर वक़ालत की जा रही है, हम उसकी भी निंदा करते हैं।
प्रस्ताव: बजरंग बिहारी तिवारी    अनुमोदन: संजीव कुमार
जनवादी लेखक संघ के आठवें राष्ट्रीय सम्मेलन (14-15 फरवरी, इलाहाबाद) में पारित प्रस्ताव

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