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दादरी मामले में साम्प्रदायिक रंग पहले से ही है माठारा सिंह जी

दादरी मामले में राजनाथ सिंह व महेश शर्मा के बयान जो मामले को साम्प्रदायिक रंग देने को मना करने के हैं वो हास्यास्पद व खीझ पैदा करने वाले लगते हैं। जिस तरह से खबरों में बार-बार आ रहा है, उस तरह से तो ये बात साफ़ है कि मामले को साम्प्रदायिक रंग दिया नहीं जा रहा, बल्कि इसकी बुनियाद ही सांप्रदायिक रंग पर टिकी है। और सच्चाई क्या है शायद ये आगे पता चले पर एक बात तो ये तय है कि किसी की भीड़ द्वारा जान लेने पर भाजपा के संगीत सोम को उतना क्रोध नहीं आ रहा, जितना गाय काटने की खबर का वो हवाला दे रहे हैं।
अभी कुछ दिन पहले कानपुर के पास ही एक खेत में घुसने पर खेत के मालिकों ने एक गाय और उसके बछड़े को लाठियों से पीट कर मार डाला था। कितनी ही गायें शहरों में ठंड में ठिठुरकर या कचरे खाते हुए मर खप जाती हैं, मगर ताज्जुब है तब ना कोई गोरक्षा समिति सामने आती है और ना इस गाय-बछड़े के खेत में मारे जाने पर आई और ना ही उस वक्त संगीत सोम जैसे नेताओं को गाय के मरने पर कोई दिक्कत हुई।
कारण स्पष्ट है वहाँ ध्रुवीकरण की राजनीति जो नहीं होनी थी जबकि अब इसके बहुत मौके हैं। और आश्चर्य की बात तो यह है कि राजनाथ सिंह जी इसे साम्प्रदायिक रंग ना देने की बात कर रहे हैं और महेश शर्मा (भाजपा सांसद) का कहना है कि इसे एक दुर्घटना की तरह लिया जाए।
बात ठीक है, जांच होने के बाद बातें करनी चाहिए, लेकिन क्या फिर संगीत सोम, जो उनकी ही पार्टी के हैं, उनका ऐसी संवेदनशील जगह पर जाना और एक पक्ष को उकसाना ठीक है?
अगर अखिलेश सरकार को सोम एक पक्ष को समर्थन देने की बात कर रहे हैं तो वे खुद क्या कर रहे हैं? असल बात तो यह है कि भाजपा खुद भी उसी विचारधारा को समर्थित है और यही हाल पार्टी के आला नेताओं का भी है। बस एक ही बात है कि थोड़ा सहज तरीके से वे उस विचारधारा पर कोई प्रतिक्रिया करने से बच जाते हैं और उनके ही दल के लोग उलटे कांग्रेस व सपा पर ही सिर्फ़ साम्प्रदायिकता करने का आरोप लगाते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि भाजपा की पूरी बुनियाद ही एक समुदाय के ध्रुवीकरण पर टिकी हुई है। आखिर वह देश की एक मुख्य बड़ी पार्टी के रूप में भी तो राम मंदिर आन्दोलन के बाद ही आई थी।
दादरी में भाजपा के नेता संगीत सोम को उन अभियुक्तों की चिंता है तो उन्हें उस मृत व्यक्ति इखलाक की भी होनी चाहिए थी मगर द हिन्दू की खबर के अनुसार तब तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जांच होने देने की बात कर दी।
(देखें यह लिंक  http://www.thehindu.com/news/national/other-states/muzaffarnagar-riots-accused-sangeet-som-visits-dadri/article7722943.ece)
सरकार या राजनाथ सिंह जी अगर साम्प्रदायिक रंग से इतने ही बचना चाहते हैं तो खान-पान की स्वतन्त्रता पर खुलकर सरकार का कोई बयान क्यों नहीं आता?
डार्विन के अनुसार अगर देखें तो विकासवाद में इंसान भी अन्य जानवरों की तरह विकसित हुआ है, आज भी विज्ञान में मानव भी अन्य जानवरों के साथ एनिमेलिया (Animalia) नामक किंगडम में रखा गया है, क्योंकि इंसान भी उसी तरह evolve या जैविक रूप से विकसित हुआ है और इसी तरह स्तनधारी समूह में यानि मैमेल्स में हम कुत्ते बिल्ली आदि कई जीवों के साथ वर्गीकृत हैं।
ये बातें करने का तर्क सिर्फ़ यही है कि इंसान पहले से ही मांसाहारी व शाकाहारी दोनों तरह की पृवृत्ति का था और ये धर्म, सम्प्रदाय ये सब बहुत बाद की बातें हैं, जिनसे ये आधार बने कि किसको क्या खाना चाहिए किसको क्या नहीं, वरना इतिहास तो बताता ही है कि मानव की शुरुआत ही शिकारी व संग्राहक के रूप में जानी जाती है। और फिर सवाल आता है कि फिर बकरे, भैंस, सूअर या मुर्गे पर दिक्कत नहीं है और सिर्फ़ गाय पर ही है तो ऐसा क्यों है? सिर्फ़ इसलिए कि गाय को हिन्दू धर्म ने पवित्र माना है और उससे भी अधिक कुछ राजनैतिक ताकतें अपनी राजनीति सीधी करने के लिए मांस या गौ-मांस खाने वाले उन सम्प्रदायों के खिलाफ इन बातों पर भड़काने का काम करती हैं।
देहरादून में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (या राष्ट्रीय मुस्लिम मंच) नामक संगठन ने भी गौ-मांस का विरोध किया था, जबकि उसके आयोजकों में अधिकतर मुस्लिम ही थे और उनके पर्चों पर लिखा था “गाय का दूध शिफ़ा है, इसका मक्खन मुफ़ीद है, अलबत्ता इसका गोश्त बीमारी है” और लोगों से उसे छोड़ने की अपील भी की गई थी (आज भी देहरादून में दून अस्पताल के पास दीवारों पर ये पोस्टर देखे जा सकते हैं।)
तो सवाल फिर वही आता है कि ये मसला खुद की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर निर्भर करता है जैसे इस संगठन के मुस्लिमों ने भी गौ-मांस का विरोध किया तो दूसरी ओर बहुत से हिन्दू व दलित या आदिवासी भी गाय का मांस खाते हैं या होंगे।
भारत जैसे एक लोकतान्त्रिक देश में सभी को अपनी संस्कृति, पहनावे व खान पान की स्वतन्त्रता है और होनी भी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति या समुदाय अपनी मर्ज़ी से किसी जीव को नहीं खाना चाहता तो यह उसकी अपनी स्वतन्त्रता है और ठीक उसी तरह उनकी भी स्वतन्त्रता है, जो उसमें परेशानी नहीं महसूस करते। ना ही शाकाहारी या गौ-मांस से परहेज़ करने वाले को गौ-मांस खाने वालों को ज़बरदस्ती छोड़ने पर मजबूर या राजनैतिक दबाव बनाना चाहिए और ना ही मांसाहारी या गौ-मांस ग्रहण करने वालों को न ग्रहण करने वालों को ग्रहण करने पर मजबूर करना चाहिए। सबकी स्वतन्त्रता का सम्मान ही असली लोकतंत्र है ना कि जो बहुसंख्यकों को पसंद है उसे ज़बरदस्ती अन्य समूहों पर थोपा जाए।
लेखक हारून सिद्दीकी ने अपनी पुस्तक बीइंग मुस्लिम में लिखा है कि उनके अनुसार तालिबान के ज़बरदस्ती बुरका पहनने के फरमान और फ्रेंच सरकार के सबके हिजाब या धार्मिक चिह्न हटाने या उतरने के फरमान में कोई अंतर नहीं है क्योंकि दोनों ही सूरत में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता व स्वायत्ता का हनन होता है। शायद इसी तर्ज़ पर हमें गौ-मांस की राजनीति को भी देखना होगा। उम्मीद है कि भाजपा नेताओं को बाकी दलों की साम्प्रदायिकता के साथ ज़रा अपने दल की साम्प्रदायिकता भी दिखाई दे और वे असल में साम्प्रदायिक ताकतों पर लगाम करें वरना हम जानते हैं कि विकास शांति के बिना अधूरा है।
मोहम्मद ज़फ़र,

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मोहम्मद ज़फ़र, ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत

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