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दुनियाभर की साम्राज्यवादी फौजें हमारे लोगों के हक हकूक छीनने पर आमादा हैं

आज वीरेनदा (वीरेन डंगवाल) से फिर लंबी बातचीत हुई फोन पर। अब मुझे लगा कि मैं गलत था। वीरेनदा को दरअसल कोई कैंसर वैंसर नहीं है, जो रोग है, उसके शिकार हम हैं और हमारी मानसिकता है।
आज महसूस हुआ कि अपने वीरेनदा से लगातार संवाद की जरुरत है क्योंकि वे हमारे मोर्चे के बेहतरीन सिपाहसालार हैं और हम उनकी सक्रियता के बिना कोई मोर्चा दरअसल बचा ही नहीं सकते।
वीरेनदा, हमारी लड़ाई दरअसल दसों दिशाओं में उग रहे सीमेंट के जंगल और नस्ली पूंजी वर्चस्व के एकाधिकारवादी आक्रमण से अपने खेत, खलिहान, आजीविका, रोजगार और नागरिकता, प्रकृति और पर्यावरण के साथ अपने गांव, अपनी तराई और अपने पहाड़ को बचाने की लड़ाई है। अपने देश दुनिया को बचाने के सरोकार हमारे हैं।
वीरेनदा, हमारी लड़ाई दरअसल बसंतीपुर के वजूद, उसके हकूक की हिफाजत और उसके वास्ते इस कायनात को बचाने के खातिर इंसानियत के खिलाफ खड़े आदमखोर मुक्त बाजार के खिलाफ इंसानियत को लामबंद करने की लड़ाई है।
वीरेनदा, हम कोई रचनाकर्म नहीं कर रहे हैं।
वीरेनदा, हम कोई राष्ट्रीयनेता भी नहीं हैं और न पेज थ्री आईकन या नोबेलपिपासु समाजकर्मी हैं। हम तो अपने ही लोगों के रोजमर्रे के जद्दोजहद जिंदगी बदस्तूर कायम रखने के वास्ते जो हर सांस के साथ जारी है, उसीमें लहूलुहान हैं।
वीरेनदा, हमारे दिलोदिमाग से बह निकलने वाली खून की नदियों से बूंद-बूंद खून जोड़कर हम तो अपने गांव की हिफाजत के खातिर किलेबंदी कर रहे हैं।
वीरेनदा, हम कोई विदेशी हमलावर नहीं हैं और इस देश की सरजमीं की धूल हैं हम, जो आंधी बनने की कोशिश में है इसलिए क्योंकि दुनियाभर की साम्राज्यवादी फौजें हमारे लोगों के हक हकूक छीनने पर आमादा हैं।
और हम लिखने के सिवाय कुछ भी नहीं कर सकते, वीरेनदा।
वीरेनदा, कक्षा दो तक पढ़े हमारे पिता और उनके आंदोलन, उनके जीवन संघर्ष के साथियों और पुरखों के हजारों साल की अश्वेत अस्पृश्य विरासत बसंतीपुर से दरअसल हमारा वजूद किसी भी स्तर पर अलग नहीं हैं।
दरअसल हम वीरेनदा, ऊंचाइयों से बेहद डरते हैं कि कहीं कोई ऊंचाई हमें हमारे गांव से, हमारे लोगों से, हमारे स्वजनों से हमें अलहदा नहीं कर दें।
हम इसीलिए वीरेनदा कामयाबी से बेहद डरते हैं और नाकामियों से बेहद प्यार करते हैं, जो मुझे भूलने नहीं देतीं कि मैं आखिरकार सरस्वतीपुत्र नहीं हूँ कोई सारस्वत। हम तो वीरेनदा, अपने खेत खलिहान में मरने खपने के लिए पैदा हुए थे, सिर्फ बसंतीपुर की वजह से जो मैं आज हो गया हूँ, वह मैं हूँ।
बसंतीपुर को घेरे हुई जो दुनिया रोज बदलती है और मुक्त बाजार बनने से साफ इंकार करती है, उसमें बसे लोगों, जिनमें आप भी हैं वीरेनदा, के बेइंतहा प्यार ही मेरे वजूद की दास्तां हैं। जो तराई है, जो पहाड़ हैं, वहां की हवाओं में धूल में जो बेइंतहा मुहब्बत की खुशबू है, वहीं मेरे वजूद की दास्तां हैं।
इसीलिए वीरेनदा, विधाओं, माध्यमों को जीतकर इतिहास में दर्ज होने के बजाय मेरी लड़ाई जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता प्रकृति और पर्यावरण, नागरिक अधिकार और मानवाधिकार के हक में नस्ली वर्चस्व के खिलाफ लगातार चीखें पैदा करने की और उसकी गूंज अनुगूंज के जरिये जनसंहारी शासकों के खिलाफ, नस्ली शासक वर्ग के खिलाफ, अबाध पूंजी के खिलाफ सुनामी रचने की लड़ाई है।
आज आप जो बोले कि मुझे बसंतीपुर पर और लिखना चाहिए और अपने मनोजगत पर लिखना चाहिए, लेकिन आप ही तो कहते थे कि मैं कविताएं लिख नहीं सकता और मुझे कविताएं लिखने की गरज है भी नहीं है क्योंकि मैं तो कविता में ही हूँ और मेरे लिए कविता वही है जिसमें बसंतीपुर की आवाज बाबुलंद दर्ज हो, वीरेनदा।
वीरेनदा, मेरे लिए अभिधान, व्याकरण, सौंदर्यबोध और प्रतिमान गैरप्रासंगिक हैं और हमारे हिसाब से हमारी हर पंक्ति कविता है, जिन्हें बूझना हो वे बूझें, जो बूझे नहीं, उनकी हमें कतई परवाह नहीं है।
वीरेनदा, मैं तो इस देश में, इस पूरे एशिया महाद्वीप में और अश्वेतों के समूचे भूगोल में, अनंत अस्पृश्यता और नस्ली भेदभाव की सभ्यता में अपने गांव बसंतीपुर के सिवाय किसी को नहीं देखता और मेरे लिए स्त्री पुरुष धर्म जाति नस्ल निर्विशेष मेहनतकश इंसानियत का हर चेहरा दरअसल बसंतीपुर है।
वीरेनदा, इसलिए वर्षों बसंतीपुर से बाहर रहने के बावजूद मैं पल दर पल अपनी मां की तरह बसंतीपुर में ही रहता हूँ और बाकायदा एक वाचटावर बतौर अपनी आंखें खुली रखता हूँ, हमलावर फौजों की टोह में और उनकी हर हरकत के खिलाफ अपनी तरफ से मोर्चबंदी करने की जुगत ही मेरा रचना कर्म है, जिसपर किसी नामवर की किसी मुहर की जरुरत है ही नहीं।
वीरेनदा मैं तो परवाह करता हूँ आप जैसे चुनिंदा लोगों की जो मेरी समझ से बसंतीपुर के ही वाशिंदे हैं।
पाश जैसा मैं हू नहीं और न मैं मुक्तिबोध हूँ, लेकिन हमारा पक्ष साफ है।
हम वीरेनदा, यकीनन आखिरी सांस तक इस फिजां को कयामत बनाने वाले माफिया सत्ता के खिलाफ, उनकी हर साजिस के किलाफ लड़ेंगे और मोर्चा नहीं छोड़ेंगे।
मेरे घर में, मेरे गांव में, मेरे खेतों में, खलिहानों में जहरील नाग अब भी बहुत हैं पक्के घर बन जाने के बावजूद। हम तो कभी भी सर्पदंश को नियतिबद्ध रहे हैं और दरअसल सर्पदंश के शिकार किसी प्राणहीन देह की तरह मैं इस भारत की सूखती हुई नदियों की गोद में संजीवनी बूटी की तलाश में ही भटक रहा हूँ और मैं जानता हूँ कि मेरी यात्रा अनंत है और इसका कोई सिरा बसंतीपुर में कभी खत्म होगा कि नहीं, नहीं जानता।
कल रात ही आनंद तेलतुंबड़े से बात हुई जो कह रहे थे कि सत्ता तबका इतना शातिर है कि संविधान का कोमा, फुलस्टाप बदले बिना जनसंहारी संस्कृति में निरंकुश बेलगाम है वह। हम तो अजब गजब के मूरख हैं कि हम अपना घर भी देख नहीं रहे हैं कि कहां कहां सर्पदंश की आशंका है। बंगाल और महाराष्ट्र के लोग तो मेले में बिछुड़े भाई हैं जिनका सारा कारोबार भावनाओं में बह जाना है। यही हाल तमिलनाडु का है।
वीरेनदा, बाकी देश के तमाम भारतीय भी इन्हीं भावनाओं के शिकार हैं और किसी लिए रंगबिरंगे सपनों के सौदागर, नाना किस्म के वंशी वादक, जादूगर, बाजीगर हमारी भावनाओं से खेलते हुए हमारी रोज रोज ऐसी की तैसी करते रहते हैं और हम नशे में मदहोश समझ भी नहीं पाते।
वीरेनदा, यही दरअसल हमारी मुक्तबाजारी धर्मान्ध राष्ट्रीयता है जो रंग बिरंगी अस्मिताओं के खंड खंड द्वीप में हमें कैद किये हुए है और हम एक दूसरे कि खिलाफ लड़ने के सिवाय अपने दुशमनों के खिलाफ किसी मोर्चाबंदी की सोच भी नहीं पाते।
ताजा खबर यह है कि देशभर के बैंक कर्मचारियों ने वेतन वृद्धि की मांग को लेकर 2 दिसंबर से 5 दिसंबर तक क्षेत्रवार हड़ताल पर जाने की घोषणा की है।
जिनलोगों को मोदी सरकार से रातोरात भारी परिवर्तन की उम्मीद थी उनको इसके लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। मोदी सरकार एकाएक नहीं बल्कि धीरे-धीरे आर्थिक सुधार को रफ्तार देना चाहती है। शनिवार को ईटी की ओर से आयोजित कॉर्पोरेट एक्सेलेंस अवार्ड समारोह में दिग्गज कॉर्पोरेट हस्तियों को धैर्य रखने के लिए कहा गया।
उनको बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री आर्थिक सुधार धीरे-धीरे आगे बढ़ाएंगे और इसका प्रभाव दीर्घावधि होगा।
समारोह में मौजूद मोदी सरकार के टॉप मिनिस्टरों ने बताया कि यह सरकार छोटे कदम उठाएगी लेकिन अहम कानून बनाएगी और उन रेग्युलेटरी अड़चनों को दूर करेगी जो बिजनस के लिए मुश्किल खड़ी करती हैं। उनका प्रभाव ऐसा होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ प्रॉजेक्ट नारा नहीं रहेगा बल्कि हकीकत का रूप ले लेगा।
जिन कॉर्पोरेट दिग्गजों को यह चिंता सता रही थी कि अब तक कोई भारी सुधार नहीं हुआ है और सरकार हर चीज में राष्ट्रवाद को अधिक जगह दे रही है। उनको आश्वासन दिय गया कि राष्ट्रीय हित आवश्यक रूप से व्यापार और उद्योग विरोधी हो ऐसा नहीं है।
समझ लीजिये कि अरबपति करोड़पति कारपोरेट फंडिंग के जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताएं और सरोकार क्या-क्या है।
गौरतलब है कि जी-20 समूह की शिखर बैठक में प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि आर्थिक सुधारों का विरोध होना अपरिहार्य है। ‘मेक इन इंडिया’ तब तक साकार नहीं होगा जब तक इस विरोध पर काबू नहीं पा लिया जाता। प्रधानमंत्री को विदेशों में जो निवेश का आश्वासन मिलता है, वह भारत में व्यवसाय अनुकूल वातावरण बनने पर ही साकार होगा। यदि सरकार स्मार्ट शहरों सहित आधारभूत ढांचे पर अधिक खर्च करना चाहती है, तो अधिक भारतीयों को कर चुकाने के लिए राजी करना होगा। फिलहाल आबादी का सिर्फ 5 फीसदी तबका आयकर चुकाता है।
याद करें संसद सत्र शुरु होने के मौके पर कारपोरेट वकील वित्तमंत्री का वक्तव्यः “बीमा विधेयक जैसे आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने वाले कानून पारित कराने में विपक्षी दलों के कड़े रूख से विचलित हुए बिना सरकार ने आज कहा कि वह सोमवार से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में विधेयकों को आगे बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध है। हालांकि, उन्होंने इन सवालों को टाल दिया कि कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों के साथ सहमति नहीं बन पाने की स्थिति में कुछ विधेयकों को पारित कराने के लिए क्या सरकार संसद का संयुक्त सत्र बुलाएगी। वित्त मंत्री अरुण जेतली ने संवाददाताओं के साथ एक विशेष बातचीत में कहा, ”हम आगे बढ़ने को लेकर प्रतिबद्ध हैं।“
आज के इकानामिक टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया को जरा गौर से पढ़ लीजिये।
चूंकि अंग्रेजी सत्तावर्ग की भाषा है, उस भाषा से हमारी मेहनतकश आबादी का कोई वास्ता है नहीं। वहां जो सूचनाएं होती हैं, भारतीय भाषाओं में वे सूचनाएं होती नहीं है। अब समझता हूँ कि हमारे गुरुजी ने क्यों कहा था कि हिंदी तो घर पर बैठे पढ़ लिख लोगे, लेकिन बसंतीपुर के हक हूक की लड़ाई लड़नी है तो अंग्रेजी जरूर सीखना है।
वीरेन दा, मेरे गुरुजी ने ही मुझे बसंतीपुर के लिए लड़ते रहने का गुरु मंत्र दिया हुआ है और वह आज भी मेरी आस्था का बीजमंत्र है।
टाइम्ससमूह के दोनों अंग्रेजी अखबारों में वित्तमंत्री अरुण जेटली समेत संघ परिवार के तमाम मंत्रियों और सिपाहसालारों के हवाले से अच्छे दिन की घोषणाएं जनसंहारी सुधारों को लागू करने के संकल्प के साथ कर दी गयी है और कारपोरेट जगत से लेकर वैश्विक पूंजी को इशारा कर दिया गया है कि भारत की बिजनेस प्रेडली सरकार कैसा बिजनेस करना चाहती है और इसके लिए वह किस हद तक जा सकती है।
O-    पलाश विश्वास

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