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दुनिया बनी दोस्तों का नो एंट्री जोन

22 May – Bio Diversity Day Mantra
अरुण तिवारी
औरों को क्या कहूं, पहले मैं दिल्ली के जिस मकान में रहता था, वह मकान छोटा था, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। क्योंकि वह मकान नहीं, घर था। उसमें चींटी से लेकर चिड़िया तक सभी के रहने की जगह थी। अब मकान थोड़ा बड़ा हो गया है। धरती से हटकर आसमां हो गया है। लेकिन इसमें अब इंसान के अलावा किसी के लिए और कोई जगह नहीं है। मंजिलें बढ़ी हैं; लेकिन साथ-साथ रोशनदानों पर बंदिशें भी। मेरी बेटी गौरैया का घोसला देखने को तरस गई है। कबूतर की बीट से नीचे वालों को घिन आती है। चूहे, तिलचट्टे, मच्छर और दीमक जरूर कभी-कभी अनाधिकार घुसपैठ कर बैठते हैं। उनका खात्मा करने का आइडिया ’हिट’ हो गया है। हमने ऐसे तमाम हालात पैदा करने शुरु कर दिए हैं कि यह दुनिया.. दुनिया के दोस्तों के लिए ही नो एंट्री जोन में तब्दील हो जाये। ऐसे में जैव विविधता बचे, तो बचे कैसे ?

गौरतलब है कि अब इंसानों की गिनती, दुनिया की दूसरी कृतियों के दुश्मनों में होने लगी है। खल्क खुदा का ! जैव विविधता इंसानी शिकंजे में !! यह सब बावजूद इस कमजोरी के है कि आज इंसान शारीरिक रूप से सबसे कमजोर जीवों में से एक है। दुनिया में और कोई दूसरा ऐसा कमजोर जीव नहीं, अपने आपको ठीक रखने के लिए जिसे कपड़ा, मकान, पका हुआ भोजन और रात में देखने के लिए अतिरिक्त रोशनी चाहिए हो। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमने अपनी जरूरतें बढाकर इस प्रकृति के दोस्त कम किए हैं और अपनी सेहत के दुश्मनों की संख्या बढ़ा ली है।

यह तो दुनिया शहर की। देहात के दरवाजे इतने नहीं, पर कुछ संकीर्ण तो जरूर ही हुए हैं। मैं पूरब का हूं। हमारे पूरबी देहात में जहां झाड़ियां थी, वहां शौच जाने को ’झाड़े’, जहां जंगल थे, वहां ’जंगल’ और जहां खेत या खुले मैदान ही चारा थे, वहां आज भी ’खेत-मैदान’ कहा जाता है। झाड़ियां और जंगल गये; साथ-साथ संबोधन भी जा रहा है। जहां सरकार की निर्मल ग्राम योजना पहुंच गई है, वहां शौचालय भले ही बकरी बांधने के काम आ रहे हों, लेकिन शौच संबोधन… ’लेट्रिन’ हो गया है। इसका जैवविविधता कनेक्शन है। ताजा बंद दीवार शौचालयों ने गांवों मे झाड़ व जंगलों में निपटने की रही-सही जरूरत को ही निपटाना शुरु कर दिया है। जरूरत नहीं रहने से हमारे ग्रामीण भाई ही आसपास के झाड़ और जंगलों को निपटाने में संकोच नहीं कर रहे।

नतीजा यह है कि जंगल के घोषित सफाई कर्मचारी – सियार अपनी डयूटी निपटाने की बजाय खुद ही निपट रहे हैं। भेड़-बकरियों के चारागाह हम चर गये हैं। नेवला, साही, गोहटा के झुरमुट झाड़ू लगाकर साफ कर दिए हैं। हंसों को हमने कौवा बना दिया है। नीलगायों के ठिकानों को ठिकाने लगा दिया है। इधर बैसाख-जेठ में तालाबों के चटकते धब्बे और छोटी स्थानीय नदियों की सूखी लकीरें उन्हें डराने लगी हैं और उधर इंसान की हांक व खेतों में खड़े इंसानी पुतले। हमने ही उनसे उनके ठिकाने छीने। अब हम ही उन पर पत्थर फेंकते हैं, कहीं-कहीं तो गोलियां भी। वन्य जीव संरक्षण कानून आड़े न आये, तो हम उन्हे दिन-दहाड़े ही खा जायें। बाघों का भोजन हम ही चबा जायें। उनके पीने लायक पानी के प्रकृति प्रदत स्रोतों को हमने जहरीला बना दिया है। नदी किनारे आकर भी कोई जीव प्यासा वापस लौटने को विवश हो, तो कोई ताज्जुब नहीं। उत्तर प्रदेश की सई नदी की पैदल यात्रा करते हुए जिला प्रतापगढ़ में यह चित्र मैने खुद देखा। ऐसे में वे भोजन और पानी की तलाश में आखिर वे हमारे खेतों और टयुबवैल की हौदियों के पास न आयें, तो जायें, तो जायें कहां ?

हो सकता है कि जब कभी हम जैव विविधता के मुबाहिसों में मशगूल हों; मेरे मीडिया दोस्त स्पेशल स्टोरी दिखा रहे हों….. मेरे गांव के सियार प्यास से बिलबिला रहे हों और पत्थर के निशाने पर आकर कोई बेबस नीलगाय चोट से कराह रही हो। ..तो क्या बाघ, गिद्ध, घडि़याल, डॉल्फिन आदि के बाद अब सियार, नीलगाय, गौरैया वगैरह के लिए भी कोई अभ्यारण्य या आरक्षित क्षेत्र बनाया जाये ? किसी संस्था ने पढ़ लिया तो शायद वह यही मांग कर बैठे। …क्योंकि हमारी रुचि बीमारी के इलाज के लिए तंत्र बढाने और संसाधन जुटाने में ज्यादा है। रोकथाम में तो कदापि नहीं। पूर्व पर्यावरण मंत्री श्रीमती जयंती नटराजन ने बाघ अभ्यारण्यों को बढाने की घोषणा की थी। मगर हम आंकड़ों की हकीकत को कैसे झुठला सकते हैं ! सच यह है कि देश में अभ्यारण्य बढ़े हैं और बाघ घटे हैं। जीडीपी बढ़ाने के इस तेज रफ्तार सदी में दुनिया के दोस्तों की घटती संख्या का यह सिलसिला रोकने की फुर्सत किसे है ? शायद किसी को नहीं।

आंकड़े कह रहे हैं कि हमने पिछले 40 सालों में प्रकृति के एक-तिहाई दोस्त खो दिए हैं। एशियाई बाघों की संख्या मे 70 फीसदी गिरावट आई है। मीठे पानी पर रहने वाले पशु व पक्षी भी 70 फीसदी तक घटे हैं। भागलपुर की गंगा में डॉलफिन रिजर्व बना है; फिर भी डॉलफिन के अस्तित्व पर ही खतरे मंडराने की खबरें मंडरा रही हैं। क्यों ? उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कई प्रजातियों की संख्या 60 फीसदी तक घट गई है। यह आंकड़ों की दुनिया है। हकीकत इससे भी बुरी हो सकती है। जैव विविधता के मामले में दुनिया की सबसे समृद्ध गंगा घाटी का हाल किसी से छिपा नहीं है। हकीकत यही है कि प्रकृति की कोई रचना निष्प्रयोजन नहीं है। हर रचना के नष्ट होने का मतलब है कि कुदरत की गाड़ी से एक पेच या पार्ट हटा देना। यही हाल रहा, तो एक दिन यह जीव चक्र इतना बिगड़ जायेगा कि इंसान वहीं पहुंच जायेगा, जहां था। शायद उससे भी बदतर हालत में। पुनः मूषकः भव !!

दरअसल हमने अपने लालच इतने बढ़ा लिए हैं कि हर चीज कम पड़ गई है सिवाय गेहूं और कपड़ों के! इस बार मराठा सूखे में पानी का टोटा रहा, लेकिन रोटी की कोई कमी आज भी नहीं है। ’’कभी रोटियां कम पड़ जाती थीं, पेट भरने के लिए। अब बोरे कम पड़ गये हैं अनाज भरने के लिए। कभी कपड़े कम पड़ जाते थे, तन ढंकने के लिए। अब कपड़े हैं, पर हम तन ढंकना नहीं चाहते।’’ दिलचस्प है कि कीमतें फिर भी कम नहीं होती। खैर ! यह काल्पनिक बात नहीं कि धरती, पानी, हवा, जंगल, बारिश, खनिज, मांस, मवेशी… कुदरत की सारी नियामतें अब इंसानों को कम पड़ने लगी हैं। इंसानों ने भी तय कर लिया है कि कुदरत की सारी नियामतें सिर्फ और सिर्फ इंसानों के लिए हैं। वह भी सबसे पहले मेरे लिए। इसीलिए ये सारी लूट है; विवाद हैं; रसहीन होते रिश्ते हैं। यही रफ्तार जारी रही, तो एक दिन यह पृथ्वी कम पड़ जायेगी, इंसानी लालच के लिए और आंसू कम पड़ जायेंगे अपनी गलतियों पर रोने के लिए। प्रकृति अपना संतुलन खुद करती ही है। एक दिन वह करेगी ही। यह तय है। अब तय तो सिर्फ हमे करना है कि सादगी को शान बनायें, प्रकृति व उसकी दूसरी कृतियों को उनका हक लौटायें, ’’जियो और जीने दो’’ का सिद्धांत अपनायें, जैव विविधता बचायें या गायें, छटपटायें – आ ढूंढ लें ग्रह और कोई …

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अरुण तिवारी, लेखक प्रकृति एवम् लोकतांत्रिक मसलों से संबद्ध वरिष्ठ पत्रकार एवम् सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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