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दुनिया भर में आर्थिक-राजनीतिक संकट

पृथक् बटोही
दुनिया भर में राजनितिक व्यवस्थाओं में तेजी से बदलाव हो रहा है जिनके मर्म में खराब आर्थिक हालात व् डेमोग्राफिक बदलाव है। सीरिया में जहाँ चल रहे युद्ध में शिया सुन्नी आबादी संघर्षरत है तो वहीँ यूरोप के देश अपने यहाँ आने वाले आप्रवासियों से जूझ रहे हैं। हाल ही में स्विट्जरलैंड ने अपने यहाँ इमीग्रेशन में कोटा के पक्ष में वोट करके यूरोपियन यूनियन से स्चेंजेंन व् अन्य समझौतों से अपने कदम पीछे खींच लिये। स्विट्जरलैंड में डायरेक्ट डेमोक्रेसी है जैसा अपने यहाँ केजरीवाल सीधे जनता से फैसले करने की बात करते हैं उसमें जनता सीधे वोट करके कोई पॉलिसी लागू करती है। स्विट्जरलैंड की जनता ने अपने इसी अधिकार का कल इस्तेमाल करते हुये इमीग्रेशन में कोटा के पक्ष में कल 50.3% वोट डाले, जिससे स्विस में अब बसना और काम करना बेहद मुश्किल हो गया है।
मारग्रेट थैचर और बुश की उदारीकरण की बाज़ार अर्थव्यवस्था की पॉलिसी पर बने अमरीका- ब्रिटेन के आर्थिक व् सामरिक गठजोड़ ने नाटो जैसी स्ट्रेटजिक संस्था बना कर मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना शुरू किया, एक बार यह वैश्वीकरण शुरू हुआ तो इसने पीछे मुड़ कर नहीं देखा गया। इसको बराबर टक्कर देने के लिये पश्चिमी यूरोप के राष्ट्रों ने यूरोपियन यूनियन का फ्री ट्रेड जो बनाया वो धीरे-धीरे कस्टम यूनियन फिर कॉमन मार्केट फिर इकॉनॉमिक यूनियन बन कर स्ट्रॉसबर्ग में स्थापित हो गया था। यह इकॉमिक यूनियन अपनी आखरी मंजिल पॉलिटिकल यूनियन की तरफ बढ़ ही रहा था कि आर्थिक मंदी का दौर आ गया, इस मंदी में ग्रीस, पुर्तगाल व स्पेन को उबारते-उबारते सबसे बड़े सहयोगी जर्मनी की हालत पस्त हो गयी है। वैसे जर्मनी से ज्यादा अस्त-व्यस्त इसके धनी पर छोटे देश बेल्जियम नीदरलैंड हुये हैं जिनको यूनियन के अन्य इमिग्रैंट लोगों से खतरा महसूस होने लगा है। स्विट्जरलैंड जो यूरोपियन यूनियन का हिस्सा नहीं है उसने जब यूरोपियन यूनियन से पींगें बढ़ानी शुरू कीं तो उसे अपने यहाँ सबसे पहले यूरोप भर से फ्री लेबर मूवमेंट की इजाजत देनी पड़ी जिसके कारण पिछले साल भर में स्विट्जरलैंड में अस्सी हजार लोग पहुँच गये, अब अस्सी लाख के देश के लिये एक साल में इतने लोग बहुत बड़ी संख्या है और यह भी तब जब वे सिर्फ आंशिक रूप से यूरोपियन यूनियन से जुड़े तो ऐसे में बेल्जियम नीदरलैंड की चिंताएं वाजिब हैं।
इस वाकये के साथ साथ एक समस्या से यूरोपियन यूनियन और जूझ रहा है।  यूरोप के दो बड़े देशों रूस और उक्रेन में से यूरोपियन यूनियन, उक्रेन को अपने में मिलाना चाहता था पर उक्रेन के राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच जो राजनितिक व् सामरिक रूप से रूस पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। उनकी सरकार ने अमरीका और यूरोपियन यूनियन के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। इस फैसले का नतीजा यह हुआ है कि युक्रेन भर में भारी विरोध प्रदर्शन हुये पर सरकार का रुख रूस से दोस्ती की तरफ ही बना हुआ है। इस सारे विवाद में एक और मजेदार किस्सा हुआ अमरीका के विदेश विभाग की सहायक विक्टोरिया न्यूलैंड ने इन दंगे प्रदर्शनों के ऊपर सहयोगी अमेरिका के युक्रेन में भेजे गये राजदूत ज्याफ्री पायट से बात करते हुये कह दिया की ‘फ़# द ईयु’  उनकी यह बातचीत रुसी खुफिया विभाग ने रिकार्ड कर यु ट्यूब पर डाल दिया। यूरोपियन यूनियन की तरफ से जर्मन राष्ट्रपति अंजेला मर्कल ने काफी कड़ा रुख अपनाया और अशोभनीय टिप्पणी की निंदा की, जिस पर अब अमरीकी इस मसले पर जवाब देते फिर रहे हैं, यानी कहाँ तो रूस पर दबाव बनाकर उक्रेन को धमकाने चले थे और कहाँ खुद सफाई दे रहे हैं।
इन झटकों के बाद कई और राष्ट्रों के विघटन की बातें सामने आ रही हैं। इसाई बहुल ‘साउथ सूडान’ के सूडान से अलग होने के बाद सुनने में आया है कि वहाँ अस्थिरता पसर गयी है पर उसके बाद भी अलगाव के लिये लोग हतोत्साहित नहीं है। 1990 में एक हुये साउथ यमन और नार्थ यमन फिर से अलग होना चाह रहे हैं। मजेदार बात यह है कि संयुक्त यमन के राष्ट्राध्यक्ष अब्द रबुबह मंसूर हादी खुद साउथ यमन से हैं जहाँ से ऐसी माँगें उठ रही हैं। एकीकृत यमन के पूर्व राष्ट्रपति सलीम अल बिध ने 2011 में शुरू हुये ‘यमन बसंत’ में अपनी पकड़ को दक्षिण यमन में मजबूत कर लिया वे इस एकीकरण से असंतुष्ट हैं और उनके नेतृत्व में वहाँ अलगाव की आंधी तेज हो गयी है।
 इस साल 18 सितम्बर 2014 को यूनाइटेड किंगडम से स्कॉटलैंड अलग होने के रेफरेंडम में हिस्सा लेगा। यह किसी से छुपा नहीं है कि ब्रिटेन – स्काटलैंड – उत्तरी आयरलैंड – ओसियाना मिलकर यूनाईटेड किंगडम बनाते हैं, जिसमें से स्कॉटलैंड और आयरलैंड अलग राष्ट्रीयता हैं। अब देखना है कि इसका फैसला क्या होगा। वैसे ऐसा इंतेखाब एक बार अच्छे वक़्त में फ्रेंच स्पीकिंग क्यूबेक प्रांत के अंग्रेजी बोलने वाले कनाडा से अलग होने पर हुआ था, जिसमें क्यूबेक ने अलग होने से मना कर दिया था। पिछले पाँच साल के बसंत आन्दोलनों के बाद यह विघटन की माँगें विश्व के गम्भीर आर्थिक राजनीतिक संकट का द्योतक है।

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पृथक् बटोही, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व हैं।

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