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दुनिया भर में देशद्रोह का समानार्थी है नार्वे में हिटलर का एजेंट क्विजलिन

शेष नारायण सिंह
 

 नार्वे के चुनाव कवरेज के दौरान वहाँ के इतिहास के बहुत सारे पक्ष समझ में आये। बहुत लोगों से दोस्ती हुयी, नेताओं को करें से देखने का मौक़ा मिला और ऐसे लोगों से मुलाक़ात हुयी जो जिंदादिली को प्रेरित करते हैं। ऐसी ही एक मित्र हैं इल्जा मेरी ढल। पेशे से आर्किटेक्ट हैं। वे जब पैदा हुयीं तो जर्मन कब्जा खतम हो चुका था। जर्मन कब्जा शुरू होने पर उनके पिता अमरीका में आराम की ज़िंदगी बिता रहे थे लेकिन जब उन्होंने सुना कि उनके मुल्क नार्वे पर जर्मन सेना ने कब्जा कर रखा है तो वे अपने देश आ गये। सिविल इंजीनियर के रूप में अमरीका में काम करते थे लेकिन ओस्लो वापस आकर जर्मन कब्जे के खिलाफ आंदोलन में शामिल हो गये। बहुत यातनाएं झेलीं और उसी संघर्ष एक दौरान एक बहादुर साथी से शादी की। वह उम्र में उनसे बहुत छोटी थीं लेकिन लड़ाई में साथ-साथ थीं। जब जर्मन सेना चली गयी तो हिटलर को तबाह करने के लिये जुटे हुये नार्वेजियन लोगों को किले के पास समुद्र के किनारे अस्थायी बैरक बना कर बसाया गया। नार्वे के मौसम को जो लोग जानते हैं उनको मालूम है कि कि बिना सही हीटिंग वाले घर में रहना कितना मुश्किल होता है लेकिन अपने देश को तानाशाही से आज़ाद कराने वालों का हौसला इतना ज़बरदस्त था कि इन्होंने कभी परवाह नहीं की। कुछ वर्षों के अन्दर ही तहस नहस कर दिये गये ओस्लो शहर में फिर से ज़िंदगी आ गयी और शहर बस गया।

इल्जा बताती हैं कि शुरू में जिस घर में यह लोग रहते थे उसमें ज़रा सा भी पानी तुरन्त बर्फ बन जाता था। नार्वे पर यह मुसीबात हिटलर ने डाली थी लेकिन उसका एजेंट विद्कुन क्विजलिन था। इस अधम को नार्वे क्या पूरी दुनिया का सभ्य समाज कभी भी माफ नहीं करेगा।

विद्कुन क्विजलिन नाजी इतिहासका एक ऐसा सितारा है जिसका नाम किसी को गाली देने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। नाजी तानाशाह हिटलर ने उसको पाल रखा था और नार्वे के लोगों को उसकी मार्फ़त ही नाजी आतंकवाद का सबक सिखाया था। जब हिटलर ने नार्वे पर कब्जा किया तो उसने इसी विद्कुन क्विजलिन को वहाँ का शासक बना दिया था। विद्कुन क्विजलिन नार्वे की राजनीति में सक्रिय बहुत ही महत्वाकाँक्षी राजनेता था लेकिन हिटलर के एजेंट के रूप में उसने अपने लोगों पर तरह तरह के अत्याचार किये और हिटलर

की मनमानी का वाहक बना। यह भी सच है कि नाजियों की मनमानी को नार्वे की अवाम ने कभी स्वीकार नहीं किया लेकिन नार्वे की जनता के संघर्ष और विद्कुन क्विजलिन की तबाही एक ऐसा उदाहरण है जिसको बाद की दुनिया में इस बात का संकेत देने के लिये इस्तेमाल किया जायेगा कि अपने देश की तबाही के लिये किसी फासिस्ट तानाशाह का साथ नहीं देना चाहिए।

विद्कुन क्विजलिन की कमीनगी ओस्लो शहर के हर कोने में नज़र आती है लेकिन आम तौर पर उसका ज़िक्र नहीं किया जाता। उसका घर आज होलोकास्ट म्यूज़ियम है और लोग उसके नाम पार थूकते हैं

इसी सितम्बर 2013 में ओस्लो की यात्रा के दौरान नार्वे के लोगों की जिंदादिली और उनकी इंसानियत के बहुत सारे किस्से मैं बयान करता रहा हूँ लेकिन जब किसी कौम पर हिटलर नाजिल होता है, और उसी कौम के किसी महत्वाकाँक्षी नेता को पकड़कर गद्दार बनाता है और इंसानी ज़िंदगी को अँधेरे से भर देने की कोशिश करता है तो सभ्य लोगों की नार्वेजी कौम किस तरह से मुकाबला करती है, उसको समझने के लिये विद्कुन क्विजलिन के कैरेक्टर को समझना ज़रूरी है।

विद्कुन क्विजलिन को तबाह करने और हिटलर का मुकाबला करने के लिये नार्वेजियन अवाम ने अपना सब कुछ दावँ पर लगा दिया था। उस संघर्ष ने इतिहास में नार्वेजी अवाम की बहादुरी को एक संगमील के रूप में स्थापित कर दिया है। जब नाजी जर्मन सेना ने नार्वे पर हमला किया तो यह क्विजलिन हिटलर से जा मिला और तख्ता पलट करके नार्वे की सत्ता हथिया ली। क्विजलिन वहाँ हिटलर के एजेंट के रूप में ही काम करता रहा। उसने सत्ता तो जर्मन सेना के आगमन के साथ ही 1940 में हथिया लिया था लेकिन हिटलर ने उसे बाकायदा मिनिस्टर प्रेसीडेंट बनाकार 1942 में स्थापित किया। विद्कुन क्विजलिन ने हिटलर के कुख्यात फाइनल सालुशन को लागू किया। हिटलर की तबाही के बाद विद्कुन क्विजलिन पर मुकदमा चला और वह देशद्रोह का दोषी पाया गया। ओस्लो के एकरहुस किले में उसको फायरिंग स्क्वाड के सामने खड़ा करके गोली मारकर सज़ा दी गयी।

विद्कुन क्विजलिन कोई मामूली आदमी नहीं था। वह बहादुर था और नार्वे की सेना का भरोसेमंद अफसर था। अपनी सरकार की ओर से वह रूस भी गया था और नार्वे के हेलसिंकी दूतावास में भी उच्च पद पर काम कर चुका था। नार्वेजी समाज में उसकी इज्ज़त थी। एक बार तो नार्वे के सबसे सम्मानित व्यक्ति फ्रिदोफ़ नानसेन ने ही उसको सम्मान देकर यूक्रेन की राजधानी भेजा था। नानसेन वह व्यक्ति हैं जो नार्वे के सबसे प्रिय खेल, स्कीइंग के बहुत बड़े नाम हैं और जिनको 1922 का नोबेल शान्ति पुरस्कार मिल चुका है और जो आधुनिक नार्वे के संस्थापकों में माने जाते हैं। नानसेन की दोस्ती का विद्कुन क्विजलिन ने बहुत जगहों पर फायदा उठाया। मई 1930 में नानसेन की मृत्यु के बाद उसने अखबारों में नानसेन के बाद की राजनीति की रूपरेखा लिखी और नार्वे के लोगों को बताने की कोशिश की कि किस तरह से नानसेन के सपनों का नार्वे बनाया जा सकता है। लेकिन जब उनको अग्रेरियन सरकार में रक्षा मंत्री बनने का मौका लगा तो नानसेन की विचारधारा को भूलकर वहाँ जा लगे। हर फासिस्ट तानाशाह की तरह विद्कुन क्विजलिन भी कम्युनिस्टों से नफरत करते थे। उसने कम्युनिस्टों से नफरत के कारण ही 1933 में एक पार्टी बनायी और उसी राष्ट्रवादी पार्टी के साथियों को हिटलर की नार्वे योजना का हिस्सा बना दिया। उसकी नई पार्टी का नाम नैशनल समलिंग था और इसका नारा राष्ट्रीय एकता था। उसने प्रधानमंत्री पर सीधा हमला किया और नार्वे के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में पहचान बनायी। पूरे नार्वे में जहाँ भी वह जाता था उसकी जयजयकार होती थी क्योंकि एक अलोकप्रिय प्रधानमंत्री को हटाने की बात को वह बहुत ही प्रभावशाली तरीके से कह रहा था। क्विजलिन की पार्टी भी जर्मनी की नाजी पार्टी की तरह एक व्यक्ति की अथारिटी को स्थापित करने की बात करती थी। उसने नारा दिया कि राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर एक नेता को समर्थन दिया जाए। ओस्लो के संभ्रांत वर्ग का समर्थन क्विजलिन को ज़बरदस्त तरीके से मिल रहा था और यह शक जताया का रहा था कि पूँजीपति वर्ग उसे बड़े पैमाने पर समर्थन दे रहे हैं क्योंकि उसके प्रचार में भारी धन खर्च होता साफ़ नज़र आ रहा था।

चुनाव के बाद साफ़ हो गया कि जितना प्रचार था क्विजलिन की पार्टी उतनी लोकप्रिय नहीं थी और उसके बाद उसने अपने तरीके के राष्ट्रीय समाजवाद की स्थापना के लिये काम शुरू किया। चुनाव में मिली असफलता के बाद क्विजलिन बहुत गुस्से में रहता था। उसने अपने आपको विदेशी फासिस्ट पार्टियों के दोस्त के रूप में पेश करना शुरू किया। दिसंबर 1934 में वह अंतर्राष्ट्रीय फासिस्ट सम्मेलन में भी गया। वहाँ उसकी मुलाक़ात जर्मनी की नाजी पार्टी के नेताओं से हुयी। 1936 के चुनाव में उसको नार्वे के हिटलर के रूप में पहचान मिल चुकी थी। यही वह समय है जब हिटलर को पूरी दुनिया के राष्ट्रवादी लोग सम्मान की दृष्टि से देखते थे। भारत में भी राष्ट्रवादी विचारधारा वाले हिटलर की तारीफ़ में किताबें उसी दौर में लिखते पाये गये थे।

1936 के चुनाव में भी क्विजलिन की पार्टी बुरी तरह से हार गयी, खिसियाकर उसने चुनाव के खिलाफ राजनीतिक बयान देना शुरू कर दिया। इस बीच 1939 तक यूरोप में युद्ध की दस्तक सुनायी पड़ने लगी थी। उसने नारा दिया कि बोल्शेविज़्म और यहूदी राज से बचने के लिये नार्वे को हिटलर का साथ देना चाहिए। हिटलर ने क्विजलिन की पार्टी को खूब धन दिया और नार्वे में उसको अपने प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने की कोशिश शुरू कर दी। जर्मनी से धन मिलने के बाद क्विजलिन को भरोसा हो गया कि आने वाले समय में वही देश का नेतृत्व करेगा। जब उसको बताया जाता कि उसकी पार्टी के पास तो कोई एम पी नहीं है, वह हँस कर टाल जाता।

14 दिसंबर 1939 को क्विजलिन ने जर्मनी जाकर हिटलर से मुलाक़ात की। हिटलर ने क्विजलिन की योजनाओं को गम्भीरता से नहीं लिया लिये लेकिन उसको लगा कि आदमी काम का है। 18 दिसंबर को फिर दोनों मिले और क्विजलिन को हिटलर के सहयोगी के रूप में भर्ती कर लिया गया। उसके बाद पूरे यूरोप में राजनीतिक गतिविधियाँ हिटलर के पक्ष या विपक्ष में घूमती रहीं। 9 अप्रैल 1940 के दिन सुबह नार्वे के ऊपर जर्मन हमला हुआ, नार्वे के राजा और प्रधानमंत्री ने शहर छोड़ दिया था। उसी दिन क्विजलिन ने नार्वे की एक नई सरकार बनायी और 9 अप्रैल को उसी सरकार ने जर्मन सेना का स्वागत भी कर लिया। लेकिन हिटलर ने देखा कि क्विजलिन के खिलाफ लगभग सारा नार्वे है तो उसने उसे धोखा दे दिया और अपनी फौज के अधिकारियों के हाथ में सत्ता दे दी। क्विजलिन को बेईज्ज़त भी किया गया लेकिन बाद में उसको साथ लेकर जर्मन सेना ने काम शूरू किया। नार्वे के राजा ने हिटलर का कोई सहयोग नहीं किया। और उन्होंने अपनी प्रजा का आवाहन किया कि वह जर्मन कब्जे के खिलाफ संघर्ष करे।

इस बीच 1 फरवरी 1942 के दिन क्विजलिन को जर्मनी ने मिनिस्टर प्रेसीडेंट बना दिया और नार्वे की सत्ता उसको सौंप दी। लेकिन नार्वे की जनता ने उसको कभी स्वीकार नहीं किया उसका विरोध होता रहा। जर्मन सेना भी उसे कठपुतली की तरह नचाती रही और जब 1945 में जर्मन सेना नार्वे छोड़कर भागी तो क्विजलिन तबाह हो चुका था, उसको गिरफ्तार किया गया, उसके ऊपर मुकादमा चला और सुप्रीम कोर्ट तक अपील की गयी। उसे दोषी पाया गया और समुद्र के किनारे स्थिति एकरहुस किले में फायरिंग स्क्वाड के सामने खड़े करके भून दिया गया। उसकी पत्नी मारिया जीवित रहीं, 1980 में उनकी मृत्यु प्राकृतिक रूप से हुयी। क्विजलिन को राष्ट्रद्रोह के पर्याय के रूप में उसे इतिहास याद रखेगा। नार्वे के सहनशील समाज ने उसकी सकारात्मक व्याख्या करने की कोशिश भी की है लेकिन उसने नार्वे पर जो मुसीबत बरपा की थी और जिस तरह से नार्वे के लोगों ने उससे मुकाबला किया वह संघर्ष के इतिहास में अमर रहेगा।

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