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देवालय, शौचालय और संघ की राजनीति

हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा में ओतप्रोत स्वयंसेवक,
राज्यतंत्र में भी घुसपैठ कर रहे हैं
राम पुनियानी

एक लम्बे अभियान के बाद, संघ परिवार, 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाने में सफल हुआ। यद्यपि इस अभियान का नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी कर रहे थे परन्तु इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को अंजाम देने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनमें से एक थे नरेन्द्र मोदी, जो कि अब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। मंदिर-मस्जिद के पहचान से जुड़े इस मुद्दे को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया और आमजनों के दैनिक जीवन से जुड़ी मूल समस्याओं को दरकिनार कर दिया गया। उस समय कई पत्रिकाओं ने यह जानने के लिए सर्वेक्षण किये थे कि आमजन, बाबरी मस्जिद के स्थान पर क्या बना देखना चाहते हैं। कई लोगों का यह मत था कि उस स्थान पर या तो कोई शैक्षणिक संस्थान अथवा अस्पताल बनाया जाना चाहिए।

बहुजन समाज पार्टी के तत्कालीन नेता कांशीराम ने जोर देकर कहा था कि उस स्थान पर एक शौचालय बनना चाहिए। इसी तर्ज पर, कुछ साल पहले, केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि देश के लिए मंदिरों से ज्यादा जरूरी शौचालय हैं। नरेन्द्र मोदी ने भी हाल (अक्टूबर 2013) में कहा कि ‘‘पहले शौचालय, फिर देवालय’’। जब जयराम रमेष ने शौचालयों को मंदिरों से अधिक महत्वपूर्ण बताया था तब संघ के कार्यकर्ताओं ने पंक्ति बनाकर उनके घर के सामने मूत्र विसर्जन किया था। उनके घर के दरवाजे पर मूत्र से भरी बोतलें भी रखी गईं थीं। भाजपा प्रवक्ताओं ने रमेश पर देशवासियों की आस्था और उनकी धार्मिक भावना को चोट पहुँचाने का आरोप लगाया था। परन्तु अब मोदी द्वारा वही बात कहने पर भाजपा के प्रवक्ताओं का मुँह नहीं खुल रहा है। हाँ, प्रवीण तोगड़िया ने जरूर मोदी की निन्दा की है। कई समीक्षकों ने मोदी के वक्तव्य का समर्थन करते हुये कहा कि यह ‘सॉफ्ट हिन्दुत्व’ है और यही भाजपा को चुनाव में उसकी ताकत बढ़ाने में मदद करेगा। जयराम रमेश ने एक बार फिर यही दोहराया है कि आगामी चुनावों में कांग्रेस को भाजपा नहीं वरन् आरएसएस से मुकाबला करना है।

जो समीक्षक यह कह रहे हैं कि यह हिन्दुत्व का ‘सॉफ्ट’ अर्थात नरमपंथी या उदारवादी संस्करण है, उन्हें यह साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि चुनाव कैसे और किन आधारों पर लड़े जाएं, यह भाजपा नहीं बल्कि आरएसएस तय करता है। आरएसएस और उसके परिवार के अन्य सदस्य, एकजुट होकर वह सब कुछ करते हैं, जिससे भाजपा को चुनावों में फायदा हो। बाबरी ध्वंस के 20 साल बाद, मोदी यह कह रहे हैं कि उनके लिए शौचालय अधिक महत्वपूर्ण हैं, देवालय कम। यह निश्चित तौर पर एक कुटिल रणनीतिक चाल है। आरएसएस कई स्तरों पर काम करता है और उसके अनेक मुखौटे हैं। संघ परिवार के विभिन्न सदस्यों को अलग-अलग कार्य सौंपे गये हैं। विहिप, राममंदिर मुद्दे को जिंदा रखे हुये है तो अन्य सदस्य साम्प्रदायिक दंगे भड़काकर समाज को ध्रुवीकृत करने के काम में हैं। इसी के समानान्तर, कुछ संगठन गोएबेल्स के अंदाज में, मोदी की छवि एक ऐसे नेता के रूप में गढ़ने में व्यस्त हैं जो विकास के प्रति प्रतिबद्ध है, कार्यकुशल है, बेहतरीन प्रशासक है और ना जाने क्या-क्या है।

अगले चुनाव में आरएसएस कई रणनीतियाँ अपनायेगा। एक ओर दंगे भड़का कर और राममंदिर मुद्दे को हवा देकर समाज का ध्रुवीकरण किया जायेगा। दूसरी ओर, मोदी का जबरदस्त महिमामण्डन होगा। उनके विकास के ‘गुजरात मॉडल’ की तारीफों के पुल बाँधे जायेंगे। उन्हें सर्वगुण सम्पन्न नेता बताया जायेगा, एक ऐसा नेता जो निर्णय लेने और उन्हें लागू करने में तनिक भी देरी नहीं करता। इसी उद्देश्य से मोदी अब विकास और शौचालयों की बात कर रहे हैं। यह भी एक धूर्ततापूर्ण चाल है। मोदी के राजनैतिक कैरियर का आधार है गुजरात के समाज का ध्रुवीकरण, जिसे उन्होंने गोधरा के बाद हुये हत्याकांड के जरिए बनाया था। इतने सालों तक वे हिन्दुत्व के झंडाबरदार बने रहे। उन्होंने अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिये पर धकेलने की हर संभव कोशिश की। गुजरात में अल्पसंख्यकों की बदहाली सबके सामने है। समाज के ध्रुवीकरण का काम पूरा करने के बाद, अब उन्होंने नया राग अलापना शुरू कर दिया है। वे अब विकास के प्रणेता बन गये हैं। उनके तथाकथित विकास के दावों की हवा, विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त आंकड़ों से समय-समय पर निकलती रही है। इस सिलसिले में सबसे ताजा आंकड़े यह हैं कि गुजरात में हर तीसरा बच्चा कुपोषित है। यह सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है। कई अन्य आंकड़ों ने भी गुजरात के विकास के उनके मिथक का सच दुनिया के सामने ला दिया है।

जयराम रमेश का यह कहना कि कांग्रेस को अगले चुनाव में भाजपा नहीं वरन् आरएसएस से मुकाबला करना है, बिल्कुल सही है। उनके अनुसार, कांग्रेस का असली मुकाबला आरएसएस से इसलिए होगा क्योंकि आरएसएस ही भाजपा को नियंत्रित करती है। यह इससे स्पष्ट है कि संघ ने हाल में अपनी पसंद के व्यक्ति को भाजपा के अध्यक्ष और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में थोपा। परन्तु यह पूरी कहानी का एक हिस्सा मात्र है। अनुभवी और वरिष्ठ राजनेता होने के नाते, रमेष को यह पता होगा कि भाजपा का मूल नेतृत्व संघ के स्वयंसेवकों के हाथ में है। अमरीका के स्टेटैन आइलैण्ड में बोलते हुये अटल बिहारी वाजपेयी ने ठीक ही कहा था कि वे पहले स्वयंसेवक हैं और उसके बाद कुछ और। आरएसएस की कार्यशैली यह है कि वह स्वयंसेवकों को हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा का प्रशिक्षण देता है और उसके बाद, ये प्रशिक्षित स्वयंसेवक, हिन्दू राष्ट्र के संघ के एजेण्डे को पूरा करने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अपना-अपना काम करते हैं। संघ से जुड़े जितने भी संगठन हैं, उन सब का असली नेतृत्व संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवकों के हाथ में रहता है। और इन स्वयंसेवकों के बीच समन्वय का काम आरएसएस करता है। इस प्रकार, मोदी शौचालय की बात कर सकते हैं, तोगडि़या मंदिर का राग अलाप सकते हैं। नीचे के स्तर का कोई कार्यकर्ता इंटरनेट पर वीडियो अपलोड कर दंगे भड़का सकता है। कोई पाठ्यपुस्तकों के भगवाकरण के काम में जुट सकता है तो कोई दूसरा ‘जाणता राजा’ नामक शिवाजी पर आधारित नाटक का प्रदर्शन कर सकता है-एक ऐसे नाटक का, जो इतिहास का सांप्रदायिकीकरण करता है। हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा में ओतप्रोत स्वयंसेवक, राज्यतंत्र में भी घुसपैठ कर रहे हैं। हम केवल आशा कर सकते हैं कि देश के सबसे बड़े राजनैतिक दल, जिसे बहुवाद का परचम लहराना चाहिए, वह आरएसएस को अच्छी तरह से जानता और पहचानता है। इस दल को यह भी पता होना चाहिए कि आरएसएस, राजनीति पर नियंत्रण और समन्वय के लिए सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं करता। वह अन्य कई रास्तों से अपनी मंजिल तक पहुंचने के उद्यम में लगा रहता है।

वनवासी कल्याण आश्रम या सामाजिक समरसता मंच, दूरदराज के इलाकों में सोशल इंजीनियरिंग के जरिए संघ के एजेण्डे की नींव तैयार करते हैं। बल्कि, संघ ने हमारे सामाजिक और राजनैतिक जीवन के हर पक्ष में इतनी जबरदस्त घुसपैठ बना ली है कि एक अर्थ में हम यह भी कह सकते हैं कि चुनावी राजनीति, उसके कार्याकलापों का एक छोटा हिस्सा भर रह गई है। आरएसएस का हिंदू राष्ट्र या हिन्दू पाकिस्तान का एजेण्डा, भारत की विविधवर्णी संस्कृति के विरूद्ध है। यह व्यवस्था ऐसे समाज के लिए उपयुक्त है, जहां एकाधिकारीवादी शासन व्यवस्था हो और समाज पर श्रेष्ठिवर्ग का दबदबा बना रहे। दरअसल, हिंदू हित की बात करने वाला संघ, हिंदुओं के एक तबके के प्रभुत्व के लिए काम कर रहा है।

आरएसएस की गतिविधियों में पिछले तीन दशकों में जबरदस्त तेजी आई है और राज्यों और केन्द्र में सत्ता में आने के बाद से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उसके स्वयंसेवकों की घुसपैठ में आशातीत बढ़ोत्तरी हुयी है। जब भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए सन् 1998 से लेकर 2004 तक देष पर शासन कर रहा था तब यही हुआ था और यही भाजपा-शासित प्रदेशों में इस समय हो रहा है। अच्छा होगा कि जयराम रमेश और उनके जैसे अन्य इस कटु और डरावने सच से वाकिफ हों। जो लोग आरएसएस की राजनीति को नजदीक से देख रहे हैं वे इस परिद्रश्य को अच्छी तरह से समझते हैं। राजनीति में सक्रिय वे लोग जो प्रजातंत्र, बहुवाद और भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें केवल चुनाव के वक्त धार्मिक राष्ट्रवाद से मुकाबला करने की बात नहीं सोचनी चाहिए। यह एक ऐसी लड़ाई है जिसे अनवरत और हर क्षेत्र में लड़ा जाना होगा-फिर चाहे वह राजनीति हो, संस्कृति हो, साहित्य हो या कला या कोई भी अन्य क्षेत्र। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

 

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