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देशभक्त और देशद्रोही-कानून की परिभाषा बदल दी गयी है

देशभक्त बनाम देशद्रोही
आनंद स्वरूप वर्मा
एक भयावह माहौल निर्मित किया गया है। समूचे देश को दो खानों में बांटने की साजिश चल रही है- देशभक्त और देशद्रोही। बीच की कोई जगह नहीं है। कानून की परिभाषा बदल दी गयी है। अब तक यह होता था कि जब तक आप दोषी न साबित कर दिए जाएं, निर्दोष हैं। लेकिन अभी दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बस्सी ने एक नयी बात कही कि आपको पकड़ लिया गया है, अब आप साबित करें कि निर्दोष हैं। 15 फरवरी को पटियाला कोर्ट हाउस में जिन वकीलों और वकीलों की पोशाक में जिन गुंडों ने छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया को पुलिस की मौजूदगी में अदालत परिसर के अंदर पीटा उन्होंने कैमरे पर दावा किया कि हमने उसे मजबूर कर दिया कि वह भारत माता की जय बोले। अगले दिन ‘देशभक्तों’ के एक प्रदर्शन के दौरान एक टेलीविजन न्यूज की पत्रकार को प्रदर्शन का नेतृत्व करने वालों ने पूछे गए सवाल का जवाब देने की बजाय पकड़ लिया और कहा कि भारत माता की जय बोलो। अगर आप देशद्रोही नहीं हैं तो आपको साबित करना पड़ेगा और सबूत के तौर पर भारत माता की जय या वंदे मातरम बोलना पड़ेगा। 23 फरवरी को लातूर (महाराष्ट्र) में एक पुलिस सबइंस्पेक्टर को इसलिए बुरी तरह पीटा गया क्योंकि उसने भगवा झंडा फहराने से इनकार किया और उसे प्रदर्शनकारियों ने तभी छोड़ा जब उसने भगवा झंडा फहरा दिया। आए दिन इस तरह की घटनाएं हो रही हैं और यह सारा कुछ सरकार और पुलिस प्रशासन की नाक के नीचे हो रहा है। असहमति का दायरा इस हद तक सिकुड़ गया है कि आपको यह घोषित करना पड़ेगा कि आप सत्ता के साथ हैं या सत्ता के खिलाफ हैं। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।
 दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कुछ समाज विरोधी तत्वों ने भारत के खिलाफ और पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाए। प्रदर्शन के वीडियो देखने से साफ पता चलता है कि कपड़ों से अपने चेहरे को ढके हुए तकरीबन आठ नौ लोग ये नारे लगा रहे थे लेकिन देशद्रोह का आरोप लगाकर वहां के छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया को गिरफ्तार किया गया, जो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जेल में पड़ा है। सरकार के इशारे पर काम कर रहे कुछ चैनलों ने एक फर्जी वीडियो जारी किया जिसके आधार पर पुलिस ने सारा मामला तैयार किया। पूरे देश में इन चैनलों ने और खास तौर पर ज़ी-न्यूज ने एक ऐसा उत्तेजक माहौल बनाया जिससे जनेवि के छात्रों को खलनायक के रूप में चित्रित किया जा सके। निश्चय ही विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने अफजल गुरु की फांसी की तीसरी बरसी पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया था लेकिन अफजल गुरु की फांसी पर सवाल उठाना उचित है या गैर कानूनी, इस पर हम आगे विचार करेंगे। मुख्य सवाल यह है कि जब यह बात सामने आ गयी कि कन्हैया के कथित नारे वाला वीडियो फर्जी था और असली वीडियो में कन्हैया बिल्कुल अलग नारे लगा रहा है, इसके बाद भी उसे जेल में क्यों रखा गया। इतना ही नहीं सारी स्थितियां साफ हो जाने के बावजूद भाजपा और आरएसएस के नेता बार-बार इस झूठ को ही क्यों दुहरा रहे हैं कि जेएनयू के छात्रों ने राष्ट्र विरोधी नारे लगाए। आखिर क्या वजह है कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के दलित शोध छात्र रोहित वेमुला की (आत्म) हत्या के बाद देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में और खास तौर से जेएनयू में एक उथल-पुथल का माहौल बना? रोहित वेमुला प्रकरण ने न केवल केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी और एक अन्य केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय को कटघरे में खड़ा कर दिया बल्कि भाजपा और संघ नेतृत्व की ब्राह्मणवादी सोच से भी नकाब हटा दिया। इन दोनों मंत्रियों ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर पर इतना दबाव डाला कि उन्होंने रोहित की न केवल फेलोशिप बंद कर दी बल्कि उसे निलंबित भी कर दिया। हर तरह से अपना पक्ष रखने के बाद निराशा हाथ लगने पर रोहित ने आत्महत्या का रास्ता चुना। जेएनयू के छात्रों की भावनाओं को स्वर देते हुए कन्हैया ने अपने भाषण में रोहित का जिक्र करते हुए जोरदार शब्दों में कहा था कि हम नहीं चाहते कि जेएनयू में भी कोई दूसरा रोहित आत्महत्या के लिए मजबूर हो। यहां एक बात और ध्यान देने योग्य है कि 10 लड़कों के जिस समूह ने अफजल गुरु से संबंधित आयोजन किया था उसमें कन्हैया शामिल नहीं था। सारे तथ्यों से स्पष्ट हो जा रहा है कि कन्हैया को सत्ता द्वारा बलि का बकरा बनाया जा रहा है ताकि जेएनयू के खिलाफ मोदी सरकार अपनी योजनाओं को लागू कर सके। ऐसा कहने का आधार यह है कि अफजल गुरु से संबंधित घटना 9 पफरवरी 2016 की है लेकिन 8 नवंबर 2015 को प्रकाशित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हिंदी मुखपत्र ‘पांचजन्य’ की आवरण कथा देखी जानी चाहिए जिसका शीर्षक थाः ‘जेएनयूः दरार का गढ़’। इस रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि किस तरह ‘जेएनयू नक्सलियों और राष्ट्र विरोधी तत्वों’ का अड्डा बनता जा रहा है। लेख में एक जगह कहा गया है कि ‘जेएनयू को वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है। भारतीय संस्कृति को तोड़-मरोड़ कर गलत तथ्यों के साथ प्रस्तुत करना यहां आम बात है…यहां के लोग तमाम तरह की देश विरोधी बातों की वकालत करते हैं। यहां के ‘बु़द्धि के हिमालयों’ को सिर्फ एक ही बात समझाई और घुट्टी में पिलाई जाती है कि कैसे भारतीय संस्कृति से द्रोह व द्वेष, भारतीय मूल्यों का विरोध, हिंदू विरोध, देश विरोधी कार्य, समाज विरोधी कार्य करना है।’ कहने का मतलब यह है कि अफजल गुरु वाली घटना नहीं हुई होती तो भी देर-सबेर जेएनयू के खिलाफ सरकार को कोई न कोई कदम उठाना ही था क्योंकि यह साजिश लंबे समय से चल रही थी। अफजल गुरु के बहाने देशद्रोह का जो आख्यान तैयार किया गया है उस संदर्भ में अगर कन्हैया की स्थिति पर विचार करें तो एक अजीब विडंबना दिखायी देती है। कन्हैया कुमार आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन का सदस्य है जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से संबद्ध छात्र संगठन है। इस पार्टी की घोषित नीति है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इस पार्टी के वरिष्ठ नेता दिवंगत इंद्रजीत गुप्ता 1996 में देवगौड़ा की सरकार में देश के गृहमंत्री पद पर दो वर्ष तक रह चुके हैं। ऐसे में कन्हैया पर यह आरोप लगाना कि वह अफजल गुरु के बहाने देश के टुकड़े करने की साजिश में लगा था और पाकिस्तान की मदद कर रहा था यह बात किसी के गले नहीं उतरती। इससे ज्यादा हास्यास्पद बात क्या होगी कि गृहमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे राजनाथ सिंह ने एक फर्जी ट्वीट के हवाले से सार्वजनिक रूप से कह दिया कि जेएनयू प्रकरण में पाकिस्तानी आतंकवादी हाफिज सईद के समर्थन की भी खबर मिली है। इससे बेशक सरकार की किरकिरी हुई लेकिन माहौल को जहरीला बनाने में राजनाथ सिंह के इस वक्तव्य ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
बताया जाता है कि इस प्रकरण में पकड़े गए दो अन्य छात्र उमर खालिद और अनिर्वण डेमोक्रेटिक स्टूडेंट आर्गेनाजेइशन नामक उस छात्र संगठन से जुडे़ हैं जिनका संबंध भारत के माओवादियों की पार्टी से है। इस पार्टी की राय कन्हैया की पार्टी से भिन्न है और यह मानती है कि कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है और कश्मीर की जनता को आत्मनिर्णय का अधिकार मिलना चाहिए। बावजूद इसके देश विरोधी नारे लगाने में इन छात्रों या इनके संगठन की कोई भूमिका नहीं थी और इनका भी कहना है कि जिन लोगों ने नारे लगाए वे बाहर के घुसपैठिए थे और उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए। कुछ ऐसे वीडियो भी सामने आए हैं जिनसे पता चलता है कि इस तरह के नारे लगाने वालों में भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोग भी थे जो चाहते थे कि इस नारे की आड़ में उनके प्रतिद्वंद्वियों को फंसा दिया जाए। स्मरणीय है कि कन्हैया ने अपने जिस प्रतिद्वंद्वी को विश्वविद्यालय के चुनाव में हराया था वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का था। यहां यह भी याद रखा जाना चाहिए कि पिछले वर्ष जब जनेवि के वाइस चांसलर पद के लिए भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का नाम उछाला गया तो छात्रों के एक बहुत बड़े वर्ग ने इसका विरोध किया था।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के समय से ही वाम राजनीति का केंद्र माना जाता है। यहां का अकादमिक माहौल काफी खुला और जनतांत्रिक है और देश के लगभग सभी हिस्सों से आने वाले छात्रों के बीच परस्पर विरोधी विचारों के संवाद का भी दायरा काफी बड़ा है। अफजल गुरु की फांसी के सवाल पर यह कोई पहली मीटिंग नहीं थी-इससे पहले भी ऐसे संवेदनशील और विवादित मुद्दों पर यहां चर्चाएं होती रही हैं। अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस ए.पी.शाह, जस्टिस मारकंडे काटजू सहित देश के अनेक विद्वानों ने इस फांसी पर सवाल उठाए हैं और जम्मू कश्मीर की ‘पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी’ (पीडीपी) ने तो बाकायदा इसे ‘न्याय का मजाक’ कहा है जिसके साथ भाजपा ने कुछ महीने तक सरकार चलायी और अभी फिर सरकार बनाने की कोशिश में लगी हुई है। न केवल जेएनयू बल्कि देश के अंदर एक ऐसा जनतांत्रिक माहौल रहा है जिसमें अलग-अलग विचारधाराओं और निष्ठाओं के लोग अपनी बात कहते रहे हैं, खुली बहसें होती रही हैं और असहमतियों के बीच विमर्श जारी रहे हैं। किसी को इसके लिए देशद्रोही नहीं कहा गया और न उसे यह कहा गया कि देशभक्ति साबित करने के लिए भारत माता की जय कहो। इस विविधता भरे देश में अगर नाथूराम गोडसे को गांधी का हत्यारा मानने वाले हैं तो एक तबका ऐसा भी है जो गोडसे को शहीद मानता है, भिंडरावाले को

आतंकवादी मानने वाले भी हैं और उसे संत कहने वालों की संख्या भी कम नहीं है, कश्मीर में जेकेएलएफ के नेता मकबूल बट को आतंकवादी बताकर 1984 में दिल्ली के तिहाड़ जेल में फांसी पर लटका दिया गया लेकिन कश्मीर में उन्हें शहीद का दर्जा प्राप्त है। जो लोग आज सत्ता में हैं और कश्मीर से कन्या कुमारी तक एक ही रंग, एक ही खानपान और एक ही पताका फहराते देखना चाहते हैं वे शायद भूल रहे हैं कि भारत संभवतः दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां सभी धर्मों के लोग रहते हैं। ऐसे में न तो आप किसी पर अपनी आदतें और न खानपान थोप सकते हैं न इनके बीच संवाद की प्रक्रिया को रोक सकते हैं। क्या यह याद दिलाना जरूरी होगा कि 1983 में पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की पार्टी अकाली दल ने संसद भवन के पास गुरुद्वारा रकाब गंज में भारतीय संविधान की प्रतियां जलायी थीं। उसी अकाली दल के साथ आज भाजपा की मिलीजुली सरकार काम कर रही है। अब से महज 10 दिन पूर्व निवर्तमान पुलिस कमिश्नर बस्सी ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में कहा कि संविधान के खिलाफ बात करना, ‘ईश निंदा’ (ब्लासफेमी) जैसा अपराध है। क्या बस्सी जैसे पुलिस अधिकारी को यह बताना होगा कि ऐसे में संविधान जलाने की सजा क्या होनी चाहिए! बस्सी साहब जेएनयू के संदर्भ में यह इंटरव्यू दे रहे थे।
एक बात और बहुत महत्वपूर्ण है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उत्तर भारत हो या कश्मीर या उत्तर पूर्व के सातों राज्य-सबकी समस्याएं अकल्पनीय रूप से भिन्न हैं और केंद्र सरकार के प्रति इन राज्यों में रहने वाले लोगों के नजरिए में भिन्नता होना लाजिमी है। जिम्मेदार कोई भी हो, लेकिन यह एक सच्चाई है कि कश्मीर पिछले 60 साल से अशांत है। वहां आतंकवाद भी है और आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर्स ऐक्ट (आफ्सपा) की वजह से जबर्दस्त दमन भी है। सरकारी और गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार 8 से 10 हजार ऐसे लोगों की सूची है जो लापता हैं। वहां ‘अर्द्धविधवा’ नाम से हजारों महिलाओं का एक ऐसा तबका है जिनको यह पता नहीं है कि उनके पति, जिन्हें पुलिस या सेना घर से उठाकर ले गयी, वे जीवित हैं या मार दिए गए हैं। इस तरह के परिवार निरंतर दहशत में जिंदगी गुजारते हैं। मणिपुर में आफ्सपा हटाए जाने की मांग को लेकर इरोम शर्मिला 15 वर्षों से भूख हड़ताल पर हैं। अब से कुछ वर्ष पूर्व सेना के जवानों ने मनोरमा नामक युवती का बलात्कार किया और फिर हत्या कर दी। इस घटना के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने राजधानी इंफाल में सेना मुख्यालय से सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया और उनके हाथ में जो बैनर था उस पर लिखा था ‘भारतीय सेना आओ हमारा बलात्कार करो।’
अब कल्पना करिए कि अगर इन इलाकों का कोई नौजवान जेएनयू में आकर शिक्षा प्राप्त कर रहा हो तो भारत सरकार के प्रति उसका नजरिया किसी भी हालत में वह नहीं हो सकता जो यूपी, बिहार या मध्य प्रदेश के किसी छात्र का होगा। ऐसे में क्या हम उसे खुलकर अपनी बात रखने या संवाद का वातावरण बनाए रखने की कोशिश नहीं करेंगे?

आखिर विश्वविद्यालय होते किसलिए हैं!
जेएनयू अपने उन्मुक्त वातावरण के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है और इसलिए भी जाना जाता है कि यहां के मेधावी छात्र तीखी बहसों और विचार-विमर्शों से गुजरने के बाद वह परिपक्वता हासिल कर सके हैं कि वे आज देश के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर भी कुशलता के साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में केवल अफजल गुरु या मकबूल बट की फांसी के मुद्दे पर विचार-विमर्श करने की सजा के तौर पर देशद्रोह का मुकदमा चलाना और फिर यह कहना कि कुछ निहित स्वार्थी तत्व असहिष्णुता का नाम लेकर सरकार को बदनाम कर रहे हैं क्या अजीब नहीं लगता। 2003 में संसद पर हमले के एक अन्य अभियुक्त एस.ए.आर गिलानी की रिहाई की मांग करते हुए जो अखिल भारतीय कमेटी बनी थी उसकी अध्यक्षता भारत के मशहूर राजनीतिक चिंतक प्रो. रजनी कोठारी कर रहे थे। इस समिति के अन्य सदस्य थे प्रभाष जोशी, सुरेंद्र मोहन, अरुणा राय, नंदिता हक्सर, संजय काक, अरुंधति राय आदि। इस डिफेंस कमेटी ने जो मोबाइल पोस्टर प्रदर्शनी की थी उसका उद्घाटन पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था। यह उस व्यक्ति के लिए जो संसद पर हमले का अभियुक्त था। क्या कल्पना कर सकते हैं कि मौजूदा सरकार इसे बर्दाश्त कर पाती। क्या जिन नामों का उल्लेख किया गया है उनको देशद्रोही मान लिया जाय?

एक खतरनाक प्रवृत्ति, जिसके नतीजे कितने भयंकर होंगे, कल्पना करना मुश्किल
सवाल फिर वही है कि आखिर इस मुद्दे पर सरकार ने इतनी असंवेदनशीलता क्यों दिखायी? क्यों इसने इस मुद्दे को लेकर पूरे देश में राष्ट्रवाद का एक ऐसा उन्माद फैलाया कि लोग एक दूसरे की जान के दुश्मन नजर आने लगे। क्यों इस उन्माद को फैलाने में उसने अपने समर्थक मीडिया को इतनी बेशर्मी के साथ लगा दिया? ये सवाल आज के ज्वलंत सवाल हैं। दरअसल नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को यह दिखायी देने लगा था कि 2025 तक उसका भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना पूरा हो जाएगा। लेकिन सब कुछ अब एक उल्टी दिशा में जाता हुआ दिखायी दे रहा है। भारत में फासीवाद का स्वरूप वह नहीं हो सकता जो यूरोप में था। यहां हिंदुत्ववादी शक्तियां जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा देकर ध्रुवीकरण के प्रयास में लगी थीं उस पर उस समय ब्रेक लग गया जब परिस्थितियों ने दलितों तथा वाम जनतांत्रिक शक्तियों को एक दूसरे के करीब ला दिया। भारत में मनुवादी वर्ण व्यवस्था निश्चित रूप से सबसे बड़ा अभिशाप है लेकिन आज यह वर्ण व्यवस्था ही फासीवाद को रोकने का काम करने जा रही है। इस वर्ण व्यवस्था ने ही दलितों को उस स्थिति तक पहुंचा दिया कि वे अपनी अस्मिता के प्रति सजग होते गए और उन्हें यह महसूस होने लगा कि उनकी मित्र शक्तियां कौन हो सकती हैं। भारत का वाम आंदोलन इसे पहचानने में ऐतिहासिक भूल करता रहा है जिसका खामियाजा भी वह भुगत रहा है। रोहित वेमुला प्रकरण के बाद इस एकता की पà¥

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