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देश का पहला ऐसा चुनाव, जो मीडिया लड़ रहा

मीडिया-: राजनैतिक दलों की इकाई के तौर पर कर रहा प्रचार
अंशु शरण
मतदान से पूर्व मनोवैज्ञानिक रूप से मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए जिस तरह के बौद्धिक हमले मीडिया द्वारा किये जा रहे हैं उससे लगता है कि यह देश का पहला ऐसा चुनाव है जो मीडिया लड़ रहा है| राजनैतिक दलों के पक्ष में खड़ा मीडिया राजनैतिक दल की इकाई के तौर पर प्रचार कर रहा है।
इस आम चुनावों में फेसबुक ट्विटर और ढेर सारे टी वी चैनल के माध्यम से होता प्रचार निशिचित तौर पर सूचना और प्रोद्योगिकी में हुए क्रांतिकारी परिवर्तन का ही नतीजा है। सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भले ही  एक आई टी रिवॉल्यूशन की पैदाइश हो लेकिन दोनों में जमीं आसमान का अंतर है। जहाँ एक और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस चुनावों में लोकतान्त्रिक विचारों के नियंत्रण के काम में लगा है और हमें सीमित दायरे में सोचने पर मजबूर कर रहा है वहीँ सोशल मीडिया जहाँ विचारों की अभिव्यक्ति पर पूरी आज़ादी है और इसी वजह से सोशल मीडिया पर स्वतंत्र एवं अराजक विचारों की बहुतायत है।
सोशल मीडिया इस सदी की एक बेहतरीन उपलब्धि है जो युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय है। सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आज़ादी को दिशा देना किन्हीं और तरीकों से आसान है और यही वजह है कि जब हमारे देश की राजनीति निराशावादी दौर से गुजर रही हो तो उस समय विकास के एक नकली मॉडल और सरकार के प्रति असंतोष पैदा कर युवाओं को राष्ट्रवाद की ओर आकर्षित करने का एक मंच सोशल मीडिया भी  बन रहा है। लेकिन फ़ासीवादियों द्वारा सोशल मीडिया में विकास के मुद्दे के अलावा धार्मिक उन्माद पैदा कर देने वाली तस्वीरों के सहारे ध्रुवीकरण की कोशिश की जा रही है।
हिटलर ने आत्मविज्ञापन के लिए गोयबेल्स को प्रोपेगंडा मंत्री बनाया था लेकिन सोशल मीडिया के इस युग में फ़ासीवादियों ने गोब्बेल्स की एक सेना खड़ी कर दी है।
सोशल मीडिया से उलट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संगठित रूप से पक्षपातपूर्ण प्रचार कर रहे हैं या कह सकते हैं की केवल दो बड़ी राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के ऊपर भविष्य में होने वाले लाभ के ऐवज में दांव खेल रहे हैं।
प्रायोजित कवरेज पेड न्यूज़ और नफरत भरे बयानों का प्रसारण ध्रुवीकरण को मजबूत कर रहा है जो कहीं न कहीं आगे आने वाले समय में राजनीति में विकल्पहीनता को मजबूत करेगी जिसका सीधा फायदा कॉरपोरेट मीडिया को मिलेगा।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने विकास, गवर्नेंस और पिछली सरकार से उत्पन्न असंतोष के दम पर राष्ट्रवादियों के पक्ष में भावनात्मक बहाव बना दिया जिसे सोशल मीडिया पर मौजूद चरमपंथी अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में लगातार तेज कर रहें हैं और मीडिया का ये मेल भावनाओं पर सवार फ़ासीवादियों को सत्ता तलक ले जा सकता है।
जरूरी है कि हम युवा समय रहते इस अफवाहों के चक्रव्यूह से बाहर निकलें और अपने विवेक, ज्ञान और मानवीय मूल्यों पर आधारित फैसले लें क्योंकि बकौल राहत इंदौरी साहब-

          एक अखबार हूँ औकात ही क्या मेरी मगर
           शहर में आग लगाने के लिए काफी हूँ

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अंशु शरण, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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