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देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक कर सत्ता हासिल करने की कोशिश

भाजपा धार्मिक मुद्दों को आधार बनाकर ही लड़ेगी लोकसभा चुनाव

राजनीति के जानकारों का दावा है कि भाजपा ने तय कर लिया है कि इस बार लोकसभा का चुनाव धार्मिक मुद्दों को आधार बनाकर ही लड़ा जायेगा। नरेंद्र मोदी को पार्टी का सारा कारोबार थमा कर आरएसएस ने अपनी मंशा का ऐलान कर दिया है। नरेंद्र मोदी को फाइनल करने के पहले आरएसएस को पार्टी के अपेक्षाकृत लिबरल तबके से भारी विरोध का सामना करना पड़ा। लिबरल बनने की कोशिश कर रहे लाल कृष्ण अडवाणी और उनके गुट ने लोकतांत्रिक तरीकों को अपनाने के प्रयास भी किये लेकिन भाजपा के मालिकों ने साफ़ बता दिया कि भाजपा में वही होगा जो नागपुर वाले तय करेंगें।

The effort of the RSS is that this time the election be fought purely by making religious polarization an issue.

आरएसएस की कोशिश है कि इस बार का चुनाव शुद्ध रूप से धार्मिक ध्रुवीकरण को मुद्दा बनाकर लड़ा जाये। शायद इसीलिये सबसे ज़्यादा लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में किसी सीट से नरेंद्र मोदी को उम्मीदवार बनाने की बात शुरू कर दी गयी है। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार को मुसलमानों का समर्थन 2012 के विधान सभा चुनावों में मिला था। राज्य सरकार के ऊपर भाजपा वाले बहुत आसानी से मुस्लिम तुष्टीकरण (Muslim appeasement) का आरोप चस्पा कर देंगे। और मुसलमानों के खिलाफ नरेंद्र मोदी की इमेज का फायदा उठाकर हिंदुओं को एकजुट कर लेगें। राज्य में कुछ इलाकों में समाजविरोधी तत्वों ने साम्प्रदायिक तनाव के हालात पैदा कर दिये हैं और कानून व्यवस्था के सामने खासी मुसीबत पेश कर रखी हैं। इन समाज विरोधी तत्वों में अगर कोई मुसलमान हुआ तो आरएसएस के सहयोग वाले मुकामी अखबार उसको भारी मुद्दा बना देते हैं  और मुसलमानों को राष्ट्र के दुश्मन की तरह पेश करके यह सन्देश देने की कोशिश करते हैं कि अगर मोदी की तरह की राजनीति उत्तर प्रदेश में भी चल गयी तो मुसलमान बहुत कमज़ोर हो जायेंगे और उनका वही हाल होगा जो 2002 में गुजरात के मुसलमानों का हुआ था।

इस तर्कपद्धति में केवल एक दोष यह है कि आरएसएस और उसके सहयोगी मीडिया की पूरी कोशिश के बावजूद मुसलमानों से साफ़ बता दिया है कि अब चुनाव वास्तविक मुद्दों पर ही लड़ा जायेगा, धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश करने से कोई लाभ नहीं होने वाला है।

लेकिन भाजपा ने मोदी को औपचारिक रूप से आला उम्मीदवार बनाने के पहले ही उनकी राजनीति को लागू करना शुरू कर दिया है। जानकार बता रहे हैं कि जिन इलाकों में मुसलमानों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा है वहाँ मोदी ज़्यादा ध्यान देंगे।

पार्टी की कोशिश है मुस्लिम बहुल इलाकों में होने वाली मामूली अशांति को भी बहुत हाईलाईट कर दिया जाये और बाकी देश में यह सन्देश दिया जाये जहाँ मुसलमान अधिक हैं वहाँ हिंदुओं का जीवन मुश्किल है। किश्तवाड़ में हुए दुर्भाग्यपूर्ण दंगे को इस सन्दर्भ में पेश करने की कोशिश की गयी।

मुस्लिम बहुत हैदराबाद शहर में हुए नरेंद्र मोदी के भाषण को जिस तरह से आरएसएस समर्थक मीडिया ने महत्व दिया वह भी इसी तरफ  इशारा करता  है।

2014 के लोकसभा चुनाव के लिये मुद्दों की तलाश में आरएसएस में भारी द्वन्द्व था। इस सिलसिले में इसी साल 12 फरवरी के दिन दिल्ली में आरएसएस के बड़े नेता और भाजपा अध्यक्ष समेत कई लोग इकट्ठा हुए और और करीब चार घंटे तक चर्चा की। आरएसएस और भाजपा से सहानुभूति रखने वाले टी वी चैनलों ने मीटिंग की खबर को दिन भर इस तर्ज़ में पेश किया कि जैसे उस मीटिंग के बाद देश का इतिहास बदल जायेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मीटिंग में शामिल लोगों ने बताया कि भाजपा में आडवानी गुट के नेता सावरकरवादी हिंदुत्व के एजेण्डे को 2014 के चुनावी एजेण्डा के रूप में पेश करने से बच रहे हैं। इस बैठक में शामिल भाजपा नेताओं ने कहा कि जब कांग्रेस शुद्ध रूप से राजनीतिक मुद्दों पर चुनाव के मैदान में जा रही है और भाजपा को ऐलानियाँ एक साम्प्रदायिक पार्टी की छवि में लपेट रही है तो सावरकरवादी हिंदुत्व को राजनीतिक आधार बनाकर चुनाव में जाने की गलती नहीं की जानी चाहिए।

उस बैठक में आरएसएस वालों ने भाजपा नेताओं को साफ़ हिदायत दी कि उनको हिंदुओं की पक्षधर पार्टी के रूप में चुनाव मैदान में जाने की ज़रूरत है। जबकि भाजपा के अपेक्षाकृत लिबरल गुट का कहना है कि सरस्वती शिशु मंदिर से पढकर आये कुछ पत्रकारों के अलावा कोई भी सावरकरवादी हिंदुत्व को गम्भीरता से नहीं लेता। भाजपा में मोदी विरोधी ताकतों का आग्रह है कि ऐसे मुद्दे आने चाहिए जिसमें उनकी पार्टी देश के नौजवानों की समस्याओं को सम्बोधित कर सके।

12 फरवरी की बैठक में आतंकवादी घटनाओं में शामिल आरएसएस वालों के भविष्य के बारे में चर्चा विस्तार से हुयी थी।

आरएसएस को डर है कि अगर एनआईए ने प्रज्ञा ठाकुर, असीमानंद आदि को आतंकवाद के आरोपों में सज़ा करवा दी तो मुसलमानों को आतंकवादी साबित करने की भाजपा की सारी योजना पर पानी फिर जायेगा। जब तक आरएसएस से सम्बंधित लोगों को कई आतंकवादी घटनाओं के सिलसिले में पकड़ा नहीं गया था तब तक भाजपा वाले कहते पाये जाते थे कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान होता है। जब आरएसएस के बड़े नेता इन्द्रेश कुमार सहित बहुत सारे अन्य लोगों एक खिलाफ भी आतंकवाद में शामिल होने की जाँच शुरू हो गयी तो भाजपा वालों के सामने मुश्किल आ गयी।

कांग्रेस में साम्प्रदायिकता विरोधी राजनीति के मुख्य रणनीतिकार दिग्विजय सिंह ने भी भाजपा की मुश्किले  बढ़ा दीं जब उन्होंने संघी आतंकवाद को बाकी हर तरह के आतंकवाद की तरह का ही साबित कर दिया। भाजपा को एक डर और भी है कि अगर 2014 के लोकसभा के चुनाव के पहले समझौता एक्सप्रेस, मक्का मसजिद, अजमेर धमाके आदि के अभियुक्त आरएसएस वालों को सज़ा हो गयी तो मुसलमानों को आतंकवाद का समानार्थी साबित करने की आरएसएस की कोशिश हमेशा के लिये दफन हो जायेगी।

आरएसएस मानता है कि इतिहास के किसी मुकाम पर हिंदू-मुस्लिम विवाद रहा हो तो माहौल गरम हो जायेगा। अयोध्या की बाबरी मसजिद को राम जन्म भूमि बताना इसी रणनीति का हिस्सा था। बहुत ही भावनात्मक मुद्दे के नाम पर आरएसएस ने काम किया और जो भाजपा 1984 के चुनावों में दो सीटों वाली पार्टी बन गयी थी, उसकी संख्या इतनी बढ़ गयी कि वह जोड़- तोड़ कर सरकार बनाने के मुकाम पर पहुँच गयी। आरएसएस वालों की यही सोच है कि अगर चुनाव धार्मिक और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को मुद्दा बनाकर लड़ा गया तो बहुत फायदा होगा। अफजल गुरू के मामले में भी भाजपा को यह उम्मीद थी कि देश के मुसलमान तोड़- फोड़ करना शुरू कर देगें और उसको हाईलाईट किया जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आज की राजनीतिक सच्चाई यह है कि उत्तर प्रदेश में तो मुसलमान, अभी भी समाजवादी पार्टी की सरकार को अपना शुभचिन्तक मनाता है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों का भरोसा कांग्रेस में पूरी तरह से हो गया है। बाकी देश में भी मुसलमान कांग्रेस के झुक रहा है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को कांग्रेस ही रोक सकती है। प्रधानमंत्री के पन्द्रह सूत्री कार्यक्रम, सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्टों पर केन्द्र सरकार का पूरा ध्यान है। और लगता है कि मुसलमानों को केन्द्र सरकार की नीयत पर शक नहीं है।

ऐसी हालत में देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक कर सत्ता हासिल करने की कोशिश शुरू हो चुकी है। बिहार, उत्तर प्रदेश और उन राज्यों में जहाँ भाजपा की सरकारें नहीं हैं साम्प्रदायिक तनाव का माहौल बन रहा है।

आरएसएस और भाजपा की कोशिश है कि जिस तरह से 1986 से लेकर 2002 तक साम्प्रदायिक राजनीति के सहारे देश में ध्रुवीकरण किया गया था अगर वह एक बार फिर सम्भव हो गया तो सत्ता फिर हाथ आ सकती है। लेकिन अब देश के लोग ज्यादा परिपक्व हो गये हैं। अब न तो बहुसंख्यक हिन्दुओं को नक़ली मुद्दों में फँसाया जा सकता है और न ही  अधिकतर मुसलमानों को। ऐसी स्थिति में अगर साम्प्रदायिक संघर्ष की स्थिति पैदा करने की सावरकरवादी हिंदुत्व की समर्थक राजनीतिक ताक़तों की कोशिश को लगाम लगाई जा सकी तो देश की भलाई होगी और राष्ट्रीय एकता की ताक़तों को ताक़त मिलेगी।

शेष नारायण सिंह

About शेष नारायण सिंह

शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं।

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