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देश व्यापी है सलवा जुड़ुम और इसे अब घर वापसी कहा जाने लगा है

इरोम शंबूकनी की जान आफत में
मसलन अपनी प्रियतम लौहमानवी इरोम शर्मिला है, जिन्हें आत्महत्या का अधिकार मिल जाने की वजह से जबरन फीडिंग और जीवन रक्षक प्रणाली पर रखने का राजकाज खत्म है।

अब उनकी भलाई इसी में है कि अपना चौदह साल का आमरन अनशन तोड़ दें। आफसा वापस नहीं होना है।

सैन्य शासन में आफसा जोन का सारा कारोबार, उद्योग व्यापार प्रशासन के हवाले नहीं, सैन्यतंत्र के हवाले है।

तो सेना को सुरक्षा के तर्क गढ़ने में दक्षता जो है, हर स्तर पर इस सैन्यशासन के भागीदारों के मतलब भी वही है।

जाहिर है कि सशस्त्र सैन्यबल विशेष अधिकार कानून अब खत्म होने के आसार नहीं है।

किसी इरोम शर्मिला से न इस देश को कोई मतलब है और न इस देश की सेहत पर कोई असर होना है, वे चाहे जियें या मरें।

अब तो आत्महत्या का अधिकार है।

रोजी रोटी जिनको हो न नसीब, वे खुदकशी कर लें, कोई नहीं रोकने वाला। नाकाम भी हुए तो कोई नहीं पूछने वाला।

बड़की क्रांति हुई गयो रे।

अब किसानों, कारोबरियों, आंदोलन नहीं कर सकते तो सामूहिक खुदकशी की तैयारी कर लो।

अब हर तरह का जनांदोलन असंभव बनाकर निरंकुश है हिंदू साम्राज्यवाद। भागवत और तोगड़िया का आशय यही है।

चौदह साल का वनवास पारकर मर्यादा पुरुषोत्तम का राजकाज शुरु हो चुका है और किसी शंबूकनी को तपस्या की इजाजत नहीं है।

इंद्रासन डोलें तो नारद बोले और असुरों का सफाया फिर शुरु है।

गांधी वगैरह का अनशन का फंडा और अनशन पर अंडा और झंडा, कुछो नहीं चलेगा।

बाकी जो सड़क पर या जल जंगल जमीन या पहाड़ या मरुस्थल या रण या समुंदर या डूब में चीखेगा चिल्लायेगा, उसकी आवाज हमेशा-हमेशा के लिए बंद करने का पुरकश इंतजाम सलवा जुड़ुम देश व्यापी है और इसे अब घर वापसी कहा जाने लगा है।

या तो अल्हा उदल गाओ वरना मारे जाओगे।

समझो, कि ग्लोबीकरण से प्रकृति के सारे संसाधन बिकने हैं।

समझो कि विनिवेश विनियंत्रण विनमयमन अब राजकाज है।

समझो कि राजकाज अब कारपोरेट प्रोजेक्ट है।

समझो कि बिलियनर मिलियनर सांसदों मंत्रियों विधायकों से लेकर गांव पधानों तक कोई तुम्हारा कुछो नहीं लगता।
हम आपके कौन हैं गाओगे तो बेमौत मारे जाओगे।
क्योंकि नूरा कुश्ती का सबसे बड़ा अखाड़ा अब भारतीय लोकतंत्र है।
जहां हर चेहरे पर रंग बिरंगे मुखौटे हैं और मरने मारने का जो नाटक है, वह अभिनय के सिवाय कुच्छ भी नहीं है।

असली एजंडा वही है जो भागवत और तोगड़िया का जयघोष और युद्द घोषणाएं हैं।

समझो कि जलवायु बदल गया है कि प्रकृति से रोजे बलात्कार हो रहा है जैसे स्त्री देह की रोजे नीलामी है वैसे इस देश की भी रोजे नीलामी है और उस नीलामी का नाम फ्रीसेक्स सेनसेक्स है और जिस पर तमाम विदेशी निवेशकों के दांव है।

समझों कि मौसम चक्र बदल रहा है।

समझो कि भार हिमपात का समय है यह और सारे रास्ते बंद हैं।

ऊपर भी जाना मुश्किल है तो नीचे भी उतरना मुश्किल है।जो जहां फंसा है,मनुस्मृति अनुशासन में वहीं बना रहे, वरना पेशावर के आयात में देरी कोई नहीं है और सेना हिल स्टेशनों,तीर्थ स्थलों में हानीमून मनाते जोड़ों के बचाव के लिए बर्फ नहीं काटने वाली है।

समझो कि फिर फिर आने वाला है भूकंप।

समझों कि फिर फिर डूब में शामिल हो जाना है।

समझो कि सिर्फ उत्तराखंड ऊर्जा प्रदेश नहीं है।

बाकी सारे प्रदेश भी उर्जी परमाणु उर्जा खंड खंड रेडियोएक्टिव और भोपाल गैस त्रासदियां हैं,गुजरात नरसंहार का आयोजन सर्वत्र है अब और सिखों का नरसंहार फिर दोहराया जाना वाला है।

अब इस देश में हर कहीं बाबरी विध्वंस होने वाला है।

समझो कि पल चिन पल छिन भूस्खलन जारी है महानगरों के उन्मुक्त राजपथ से लेकर तमाम हाईवे एक्सप्रेसवे बुलेट चतुर्भुज गलियारा सेज मेंं पुणे का हाल है या पहाड़ों का।

समझो कि ग्लेशियर और घाटियों और झीलों और नदियों की मृत्यु का समय है यह।

समझो आसण्ण जलसंकट को।

समझो आसण्ण अन्न  संकट को।

समझो की नौकिरिया जैसे खत्म है, वैसे ही बिजनेस इंडस्ट्री का काम तमाम है। आजीविका निषिद्ध है।

समझो कि फिर फिर आने को है सुनामियां।

सुंदरवन खत्म है समझो।

पश्चिम घाट वैसे ही नंगे हैं जैसे विंध्य,अरावली,सतपुड़ा और हिमालय।समझो कि सारे अभयारण्य अब कारपोरेट हवाले हैं।

पूरा देश अब सीमेंट का जंगल है।

पूरा देश अब प्रोमोटर बिल्डर राज बाधित विदेशी पूंजी की लाखों करोड़ों की परियोजनाएं है,जिन्हें अबाध बनाने के लिए सर्वदलीय शीतकालीन सहमति सत्र दानछत्र है।

समझ लो भइये कि मातृभाषाओं के मरने का सही समय है यह।

सूंघो कि यह दमघोंटू सडांध कहां से किस माध्यम, किस विधा और किस लोक से है।

समझो कि विज्ञापनी जिंगल के सनी जिंगल मैनफोर्स समय में बार बार करने की प्रबल इच्छा दरअसल लोक और गीतों के लिए मृत्यु पदचाप है।

समझो कि साधु संत मौसम चक्र बदल जाने के कारण हिमालय में तपस्या के बदले राजकाज में जबरन अड़ंगा डाल रहे हैं।

हिमालय में भारी हिमपात है।

जहां सेना का नियंत्रण है, वहां तो जवान अपनी आवाजाही के लिए मसलन जैसे सिक्किम और लद्दाख लेह में बर्फ काट रहे हैं। लेकिन मैदान से सिर्फ कुछ ही किमी ऊपर बसे नैनीताल में भी भारी बर्फबारी से सैलानी फंसे हुए हैं हनीमून उत्सव में।

जाहिर है कि साधू संतों का हनीमून से कोई नाता नहीं है। हालांकि कैलाश मानसरोवर से लेकर केदार बदरी तक अब हनीमून स्पाट ही हैं।

वे सारे साधू संत वशिष्ठ या विश्वमित्र या जमादग्नि की तरह उधम मचा नहीं पा रहे हैं।

क्योंकि न लाखों घोड़े किसी क्षत्रिय राजे के पास हैं और न उनके अंदरमहल में हजारों रानियां और राजकुमारिया हैं।

उनमें कुछ बाबा बनकर सत्ययुग की वापसी जरूर करने में लगे हैं।

सतजुग को पुष्यमित्र शुंग के राजकाज में बदलने की कवायद चल रही है।

इसी सिलसिले में एक अति शूद्र कोई एच एल दुसाध ने कल एक प्रलयंकारी आलेख हस्तक्षेप में डाल दिया है जिससे हिंदू साम्राज्यवादियों के विजयअभियान में खलल पड़ भी सकती है। दुसाध भाया वैसे तो उम्मीद कर रहे थे कि समरसता सिद्धांत के तहत केसरिया कारपोरेट राज में डायवर्सिटी लागू हो जाने से यानी शक्ति स्रोतों के समान आवंटन कोयला ब्लाकों के आवंटन के माफिक समान तौर पर सध जाने से जाति उन्मूलन के विष्णु अवतार बाबासाहेब अंबेडकर का एजंडा पूरा हो जायेगा और जाति व्यवस्था का सिरे से विनाश हो जायेगा क्योंकि नये बंदोबस्त में शूद्र महाराज कल्कि ही राजा हैं तो बामणों और राजपूतों के वर्चस्व के दिन खत्म हुए तो दलितों अतिदलितों और विधर्मी अल्पसंख्यकों के दिन बहुरेंगे।

लेकिन घर वापसी के नाम पर मुसलमानों और ईसाइयों के सफाये के भागवती रणहुंकार जो उनके घर कोलकाता के असुर देश में हुआ और सारे असुर मारे डर के दुबके हैं कि कोई दुर्गा या काली उनका फिर वध कार्यक्रम शुरु न कर दें,तो भारतदेशे वैश्विक धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र का नजारा देख दुसाध डायवर्सिटी को कल्कि राज की असलियत का अहसास हो गया और उनने लिख मारा हैः

याद करें भूमिहार, उपाध्याय, आचार्य, महापात्र, दुबे, तिवारी, चौबे वगैरह की नम्बुदरीपाद, वाजपेयी, मिश्र इत्यादि ब्राह्मणों के समक्ष सामाजिक मर्यादा। क्या इनकी तुलनात्मक सामाजिक मर्यादा हिन्दू धर्म से मुक्त होने के लिए प्रेरित नहीं करती? इसी तरह हिन्दू समाज में सिंहों की भांति विचरण करने वाले क्षत्रियों से हिन्दू धर्म यह कहता है कि सत्तर वर्ष के क्षत्रिय को चाहिए कि वह दस वर्ष के ब्राह्मण बालक को पिता जैसा मानते हुए प्रणाम करे, और बड़ी-बड़ी मूंछे फहराए क्षत्रिय ऐसा करते भी हैं। क्या यह शास्त्रादेश क्षत्रियों को हिन्दू-धर्म से मोहमुक्त होने के लिए प्रेरित नहीं करता ? और हिन्दू धर्म में वैश्य मात्र वित्तवान होने के अधिकार से समृद्ध हैं, पर ब्राह्मण और क्षत्रियों के समक्ष उनकी हीनतर स्थिति क्या हिन्दू धर्म के परित्याग का आधार नहीं बनाती? आत्मसम्मान के अतिरिक्त हिन्दू-धर्म अर्थात वर्ण-धर्म के मात्र आंशिक अनुपालन से उपजी विवेकदंश की समस्या तो इनके साथ है ही, पर आत्मसम्मान और विवेक विसर्जित कर भी सवर्णों के हिन्दू धर्म में रहने की कुछ हद तक युक्ति है क्योंकि इसके विनिमय में उन्हें हजारों साल से शक्ति के स्रोतों में पर्याप्त हिस्सेदारी मिली है। पर, आत्मसम्मान व विवेक से समृद्ध सवर्ण नारियां व शुद्रातिशुद्रों से कैसे कोई प्रत्याशा कर सकता है कि वे हिन्दू धर्म में बने रहेंगे?

हस्तक्षेप पर अब दुसाध को पढ़ लीजियेगा।

फिर सोचें कि कहां-कहां किसे रोक लीजियेगा।

दुसाध बाबू लिखते बहुतै बढ़िया हैं और सच दिल खोलकर लिख डालते हैं सिर्फ कल्कि अवतार की उनकी आस्था प्रबल है बाकी वे भी कोई हनुमान कम नहीं हैं।

पूंछ में उनकी आग ऐसी है कि ससुरे लंका को जलना ही है। लेकिन संघ परिवार के आसरे डायवर्सिटी लागू करने के बारे में उनका जो मोहभंग हुआ है, वैसा मोहभंग भारत के चरम उपभोक्तावादी, परम भोगी, नकद नारायण के उपासक कर्मकांडी हिंदुओं का हो रहा होगा, ऐसी कोई आशंका नहीं है।

कि सिंहद्वार पर दस्तक बहुत तेज है।

अभी हमारे पास आनंद तेलतुंबड़े जैसे लोग हैं। अपना अभिषेकवा है। अमलेंदु हैं। रियाज है और अभी जिंदा हैं वीरेन डंगवाल, पंकज बिष्ट और आनंदस्वरुप वर्मा की जमात।

बाकीर देश भर की तमाम भाषाओं और तमाम जनपदों के लोग बाग ऊधमिये भी हैं।

16 मई के बाद कविता है तो प्रतिरोध का सिनेमा भी है।

हर शहर से हर गांव से अब उठने वाला है तूफान।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर जनपद बोलेगा।

हम हस्तक्षेप में जनपदों की व्यथा कथा ही दर्ज कर रहे हैं।

जो हवाओं में, पानियों में जहर घोल रहे हैं, उनके मुकाबले हम खड़े हैं और हम अकेले भी नहीं हैं।

दम है तो हाथ में रखो हाथ।

कि सिंहद्वार पर दस्तक बहुत तेज है।

बिंदास लिखो बिंदास बोलो।

अपनी भाषा में, अपनी बोली में बोलो, लिखो, हम हर आवाज को दर्ज करेंगे और मरते दम मोर्चा न छोड़ेंगे।

गीता उपदेश हमारे विरुद्धे जो हैं, उस गीता महोत्सव का आंखों देखा हाल आप जानना चाहें तो दिव्यचक्षु हमारे पास भी हैं।

वैसे सारे साधु संत हिंदुत्व के झंडेवरदार मुंह में वंदेमातरम कहकर छुरिया शान दे रहे हैं कि किस किसका न जाने गला काटना हो इस हिंदू साम्राज्य के पुनरूत्थान और मनुस्मृति के अनंत आदिगंत बंदोबस्त में दुसाध जैसे इक्के दुक्के शंबूकों की तपस्या भंग कर दिया जाये या फिर उनका शुद्धिकरण करके उन्हें कल्कि फौज में शामिल कर लिया जाये।

बाकीर मुरगियों और बकरियों की पंचायत लग रही हैं कि उनकी गर्दन रेंती जायें या एकमुश्त हलाल कर दिया जाये उन्हें, ऐसा तय करने की आजादी उन्हें मिल जाये।

गनीमत है कि इस कल्कि अवतार से बहुत पहले कोई बाबासाहेब नाम के शंबूक भी हुआ करते थे और मनुस्मृति बंदोबस्त में विदेशी अंग्रेजन के राज में उनके संरक्षण में शूद्रों को जो हथियार उठाने और शिक्षा का अधिकार मिल जाने से मनुस्मृति अनुशासन भंग हुआ और राम जी अंतर्धान रहे तो बाबा साहेब विलायत के कैंब्रिज आक्सफोर्ड वगैरह-वगैरह जीतकर आ गये।

और उनने अर्थ शास्त्र साधकर मनुस्मृति के अर्थशास्त्र को भरसक बदलने की कोशिश की, रुपै की समस्या उजागर कर दी और रिजर्व बैंक की स्थापना से लेकर गोल्ड स्टैंडर्ज और श्रम कानून ट्रेड यूनियन के हक हकूक से लेकर मैटरनिटी लिव तक के बंदोबस्त तक कर दीन्ही ।

तो तब कोई बूढ़बाबा गांधी महाराजो भी थे जो जात से बनिया थे और बनियाराज लाने के खातिर रामराज की बात किया करते थे।

बाबासाहेब के जाति उन्मूलन एजंडा को उनने ममता बनर्जी के शब्दों में बिना छिला बांस कर दिया आमरण अनशन की धमकी देकर कि उनके प्राण बचाने बाबासाहेब ने झटपट पुणे करार पर दस्तखत करके आरक्षण कोटा बंदोबस्त मान लिया और इसी तरह बूढ़बाबा गांधी महाराज ने शूद्र राजकाज का बंदोबस्त करके बहाल मनुस्मृति में सौ फीसदी बनियाराज का चाकचौबंद इंतजाम कर दिया।

इस कारण हजारों बरस बने भारत को वे नये सिरे से पैदा कर गये और बापू कहलाये।

उनके अनुयायियों ने फिर धूम धड़ाके से बजरिये भारत विभाजन के अंग्रेजों को खदेड़ बाहर किया तो देश अखंड रखकर समानता और न्याय के आधार पर जो आजाद भारत के लिए शहादत देते रहे, उनके किये धरे पर माटी गोबर डालने का काम करते रहे उनके तमाम अनुयायी, जो बाद में संघ परिवार के छाते में चले गये।

बाकीर राजकाज स्वतंत्रता सेनानी ही चलाते रहे, ऐसा मनाने वाले बुरबकौ हैं।
O- पलाश विश्वास

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