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दोराहे पर वामपंथ- दरअसल सीपीएम अभी तक बंगाल सिंड्रोम से बाहर निकल ही नहीं पायी

बीजेपी की पूरी कोशिश है कि भारतीय राजनीति को दो पार्टियों तक सीमित कर दिया जाए। क्षेत्रीय और वामपंथी दलों को वह इतिहास का विषय बना देना चाहती है। तब सीपीएम का नया रुख उसके लिए किसी मुंहमागे तोहफे से कम नहीं है।
महेंद्र मिश्रा
भारतीय वामपंथ को तीन दिनों के भीतर दो बड़े झटके लगे हैं। चरित्र और प्रभाव के लिहाज से दोनों राष्ट्रीय हैं। एक तो वस्तुतः शारीरिक मौत है जबकि दूसरी वैचारिक और सैद्धांतिक। इस बात में कोई शक नहीं कि दोनों बहुत दूरगामी प्रभाव रखते हैं। पहला झटका वामपंथी आंदोलन के आकाश के ध्रुव ए बी बर्धन के तौर पर सामने आया है। 2 जनवरी को 92 साल की आयु में उनका दिल्ली मे निधन हो गया। बर्धन कम्युनिस्ट आंदोलन की पुरानी पीढ़ी की आखिरी विरासत थे। उनके जाने से वाम आंदोलन का एक युग समाप्त हो गया। महाराष्ट्र में एक स्थानीय कम्युनिस्ट कार्यकर्ता से राजनीतिक जीवन की शुरुआत कर उन्होंने पार्टी में महासचिव पद तक का सफर तय किया। देश के मजदूर आंदोलन को नई ऊंचाई देने में इस तपेतपाए कम्युनिस्ट की भूमिका को हमेशा याद किया जाएगा। सीपीआई भले ही देश में कोई नई दिशा और नया मुकाम न बना पायी हो। लेकिन एक बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि बर्धन की शख्सियत पूरी पार्टी पर भारी थी।
दूसरा झटका बर्धन जैसे कम्युनिस्टों के सपनों पर चोट करता है। इसलिए ज्यादा बड़ा और ज्यादा गंभीर हो जाता है। वह सीपीएम के कोलकाता में प्लेनम में राजनीतिक और वैचारिक लाइन को लेकर लिया गया नया फैसला है। प्रयोग करने वाले गल्तियां करते हैं, हालांकि उन गल्तियों से वो सीखते भी हैं। लेकिन गल्तियां करके नहीं सीखने वाले को शायद भारतीय वामपंथ कहा जाता है। 1942 हो या कि 1962 या फिर रामो-वामो का दौर या न्यूक्लियर डील पर यूपीए से समर्थन वापसी। घटनाओं का एक लंबा इतिहास है। इन सबसे आगे भारतीय समाज और उसमें होने वाले बदलावों को पकड़ने की समझ और दृष्टि। सभी मौकों पर वामपंथ चूकता रहा है। भारत में वामपंथ पैदा हुआ 1920 में लेकिन अपने पैर पर आज तक नहीं खड़ा हो सका। कभी रूस, तो कभी नेहरू, कभी कांग्रेस, तो कभी मध्यमार्गी दलों की बैसाखी ही उसका सहारा रही। एक बार फिर जब देश में वामपंथ के लिए नई संभावना और जमीन बनती दिख रही है। तो उसे कांग्रेस के चरणों में समर्पित करने की सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है। कोलकाता में 31 दिसंबर को संपन्न सीपीएम के प्लेनम से इसी बात के संकेत मिले हैं। पांच दिनों तक चले इस मंथन के नतीजे बेहद चिंताजनक हैं। 38 साल बाद हुए इस प्लेनम में पार्टी ने मध्यमार्गी दलों के साथ गठबंधन का प्रस्ताव पारित कर दिया है। ऐसा होने के साथ ही अब कांग्रेस से लेकर दूसरे दलों की सरकारों में पार्टी के शामिल होने का रास्ता साफ हो जाएगा। इतिहास गवाह है जब-जब वामपंथी दलों ने समझौता किया। पाया कम गंवाया ज्यादा। मोर्चे से फायदा लेने के मामले में बीजेपी और वामपंथ में उतना ही अंतर रहा है जितना दोनों के विचारों में है। बीजेपी लगातार आगे बढ़ती गई और वामपंथ अपनी जड़ों से उखड़ता गया। यूपी-बिहार में लालू यादव और मुलायम सिंह उसी जमीन की पैदाइश हैं।
ऐसे दौर में जबकि देश में एक निरंकुश और अधिनायकवादी सरकार है। जो शासन और हालात के मामले में इमरजेंसी को भी बौना साबित कर चुकी है। काम के नाम पर उसके पास कारपोरेट और उच्च वर्ग की सेवा है। देने की जगह उसका हर फैसला जनता से छीनने के लिए होता है। रोजी-रोटी का प्रश्न हो या कि बेरोजगारी, सामाजिक सम्मान हो या कि महिलाओं की इज्जत का सवाल, सामाजिक ताना बाना हो या कि राष्ट्र को एकता में बांधने का सूत्र। हर मोर्चे पर सरकार नाकाम साबित हो रही है। विकल्प के नाम पर एक विखरा विपक्ष है। और कांग्रेस ऐतिहासिक तौर पर कमजोर है। ऐसे में भारतीय राजनीति के इस निर्वात को भरने की जगह अगर कोई बैसाखी की तलाश करता है। तो इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है? बिहार में एकता की एक छोटी कोशिश ने वामपंथ को चर्चे में ला दिया था। सीपीएम को भी यह समझना चाहिए कि बीजेपी और संघ से आखिरी लड़ाई सड़क पर ही होगी। किसी जोड़-तोड़ के जरिये उससे निपट पाना मुश्किल है। कांग्रेस के साथ एक और समझौते से कुछ मिलने की जगह सीपीएम के सीपीआई बनने का खतरा ज्यादा है। भारतीय वामपंथ चुनावी मोर्चे पर भले कमजोर हो लेकिन राजनीतिक-सामाजिक आधार और संगठन के मामले में इतनी ताकत रखता है कि वह नये सिरे से देश में हलचल पैदा कर सके। ऐसे में उसे वामपंथी एकता के साथ स्वतंत्र पहल का नया संकल्प लेने की जरूरत है। न कि किसी नई बैसाखी की तलाश करने की। क्योंकि उसके पास साख है तो संगठन भी है, सिद्धांत है तो विचार का मजबूत हथियार भी है और इन सबसे आगे देश को एक राजनीतिक विकल्प की जरूरत है।
बिहार के चुनाव में वामपंथ की स्वतंत्र पताका बुलंद करने के बाद अचानक क्या बदलाव आया जिससे सीपीएम को इस नतीजे पर पहुंचना पड़ा? दरअसल सीपीएम अभी तक बंगाल सिंड्रोम से बाहर निकल ही नहीं पायी है। सत्ता में रहने के दौरान उसे बचाए रखने की उसकी प्राथमिकता थी। अब बाहर है तो हर कीमत पर उसे हासिल करने की जुगत में है। इसके लिए उसे किसी भी तरह की जोड़-तोड़ करनी पड़े। या कोई भी कीमत चुकानी पड़े। यहां तक कि अपने सिद्धांतों और दूरगामी लक्ष्यों की ही क्यों न बलि देनी पड़े। विभ्रम की शिकार सीपीएम के लिए दूरगामी लक्ष्य नजरों से ओझल हो गया है। तात्कालिक लाभ उसकी सबसे बड़ी जरूरत बन गया है। न तो सीपीएम ने पहले ही सबक लिया और न ही अब लेने के लिए तैयार दिखती है। बंगाल को देश में वामपंथी शासन के म़ॉडल के तौर पर पेश करने की उसकी पुरानी रणनीति औंधे मुंह गिर चुकी है। अब यह बात साबित हो चुकी है कि पूंजीवादी व्यवस्था में कोई समाजवादी मॉडल नहीं दिया जा सकता है। हां सरकारें जरूर ईमानदारी से चलाई जा सकती हैं। लेकिन उसकी भी अपनी सीमाएं हैं। इस मामले में सीपीएम अपने रजानीतिक शत्रु बीजेपी भी सीख सकती थी। जिसमें उसने अपने लक्ष्य (बाबरी मस्जिद को गिराने और देश को हिंदू राष्ट्र बनाने ) को हासिल करने के लिए अपनी तीन-तीन सरकारों तक की कुर्बानी दे दी। क्या बीजेपी-संघ को यह नहीं पता था कि बाबरी मस्जिद गिरने के बाद उनकी सरकारों का क्या होगा, लेकिन उन्होंने अपने दूरगामी लक्ष्य को तवज्जो दी।
सीताराम येचुरी के महासचिव बनने के साथ ही इस बात का अंदेशा हो गया था। दरअसल येचुरी को समझौते की लाइन का पक्षधर माना जाता है। इस लिहाज से किसी को संयुक्त मोर्चा सरकार का दौर ही याद दिलाना काफी होगा। जब उसका गठन करवाने में येचुरी ने पार्टी महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत का दाहिना हाथ बन कर काम किया था। बाद में भी उनकी कमोवेश यही लाइन बरकरार रही। यहां तक कि ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनने के प्रस्ताव के मामले पर चली पार्टी में बहस के दौरान भी येचुरी उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में खड़े थे। ये बात अलग है कि प्रकाश करात समेत पार्टी की क्रांतिकारी धारा इस कोशिश को रोकने में कामयाब रही।
हालांकि इस राह में सबसे बड़ी बाधा केरल रहा है। जहां पार्टो को सीधे कांग्रेस से मोर्चा लेना है। लिहाजा यहां की पार्टी इकाई हमेशा से इस तरह के किसी गठबंधन की विरोधी रही है। फिलहाल प्लेनम ने गठबंधन के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी है। उसको आगे बढ़ाने और लागू करने के मामले को पार्टी की केंद्रीय कमेटी के ऊपर छोड़ दिया है। इस मसले पर संवाददाता सम्मेलन में येचुरी की हिचकिचाहट को आसानी से समझा जा सकता है। प्रस्ताव पारित होने के बाद भी वह सीधे तौर पर उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिख रहे थे। और उन्होंने मामले को केंद्रीय कमेटी में विचार करने की बात कह कर टाल दिया।
हालांकि पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी ने सामाजिक नीति को लेकर पार्टी की सोच में कुछ बदलाव के संकेत जरूर दिए हैं। इसे एक बड़ी और जरूरी पहल के तौर पर देखा सकता है। क्योंकि इस देश में वामपंथ की यह सबसे बड़ी कमियों में चिन्हित किया जा सकता है। जिसमें भारतीय समाज और राजनीति की ठोस समझ और उसका सटीक विश्लेषण और फिर उसके मुताबिक कार्यनीति और रणनीति का अभाव रहा है। भारत में जितना आर्थिक सवाल जरूरी है उससे कम सामाजिक मुद्दे नहीं हैं। रोजी-रोटी अगर प्राथमिक है तो सामाजिक सम्मान का सवाल उसकी चौखट पर खड़ा हो जाता है। इस लिहाज से जाति एक बड़ी सच्चाई बनकर सामने आ जाती है। भारतीय समाज और राजनीति के बीच की वह ऐसी गांठ है जिसे खोले बगैर सत्ता का कोई भी सवाल हल होना मुश्किल है। जिस सर्वहारा की तलाश वामपंथ को थी वह भारत में दलितों के तौर पर मौजूद था। लेकिन वर्गों को ढूढने के चक्कर में वामपंथ फैक्टरियों और कारखानों से लेकर इधर-उधर भटकता रहा। भारत में क्रांति का रास्ता किसानों से होकर जाता है। लेकिन स्थापित वामपंथ की प्राथमिकता में वह कभी नहीं रहा।
मार्क्सवाद को समाज-राजनीति और व्यवस्था के सबसे अग्रणी दर्शन के तौर पर जाना जाता रहा है। व्यवस्था की आखिरी पैदाइश मजदूर वर्ग की इस पार्टी से किसी बदलाव को सबसे पहले महसूस करने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन एक पूरी सूचना क्रांति सामने से गुजर गई और वामपंथ खड़ा देखता रहा। कहीं थोड़ी जुंबिश भी नहीं दिखी। इस्तेमाल उस पार्टी ने किया जिसे हम समाज की सबसे पिछड़ी, दकियानूस, रुढ़िवादी, आधुनिक और तकनीकी विरोधी करार देते हैं। आखिरी दो मसलों के लिहाज से वामपंथ के लिए ग्राम्सी काफी मददगार साबित हो सकते हैं। उनका आधार और अधिरचना के मामले में अधिरचना के कभी प्राथमिक होने की संभावना का सिद्धांत बेहद कारगर है। भारतीय राजनीति में जाति एक उसी तरह की अधिरचना है। मौजूदा समय में आयी सूचना क्रांति को भी अधिरचना के दायरे में ही परिभाषित किया जा सकता है। है।
राजनीति में साख बहुत मायने रखती है। साख हो तो कोई ताकत जीरो से शुरू कर पूरे जहान को अपने वश में कर सकती है। साख गिरते ही उसके आसमान से जमीन पर गिरने में भी देरी नहीं लगती है। भारतीय राजनीति के इस फलसफे को समझना बहुत जरूरी है। दिल्ली के चुनाव ने इस बात को साबित भी किया है। एक छोटी ताकत बहुत कम समय में कैसे सत्ता की मंजिल तक पहुंच सकती है। उसकी एक जीती जागती मिसाल है आप परिघटना।
भारतीय राजनीति जिस मुकाम पर पहुंच गई है अब उसमें इंतजार और गल्ती के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। और कम से कम वामपंथ के लिए तो कतई नहीं। क्योंकि इस मौके को चूका तो फिर शायद वह कोई नई गल्ती करने लायक ही न रह जाए। ऐसे समय में जबकि बीजेपी की पूरी कोशिश है कि भारतीय राजनीति को दो पार्टियों तक सीमित कर दिया जाए। क्षेत्रीय और वामपंथी दलों को वह इतिहास का विषय बना देना चाहती है। तब सीपीएम का नया रुख उसके लिए किसी मुंहमागे तोहफे से कम नहीं है। ऐसे में शायद यह देश भी तमाम यूरोपीय देशों की तर्ज पर नकली कम्युनिस्टों (यूरोप के मध्यमार्गी दलों) के सहारे चलने और जीने के लिए अभिशप्त ना हो जाए। या फिर सीपीआई (एमएल) जैसी छोटी ताकतों के बड़ी ताकत में तब्दील होने का इंतजार करना होगा। जो अभी भी कम से कम सीपीएम की नई लाइन से इत्तफाक नहीं रखती है।

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महेंद्र मिश्रा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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गल्तियां करके नहीं सीखने वाले को शायद भारतीय वामपंथ कहा जाता है ‪#‎PartyPlenum‬

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