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धर्म निरपेक्षता के सार्थक आयाम

अशोक गुप्ता

धर्म निरपेक्ष देश में साम्प्रदायिकता के बरअक्स ‘धर्म निरपेक्षता’ का  बार बार संघर्षशील स्थिति में पाया जाना कुछ बुनियादी संशय खड़े करता है। इतना ही नहीं, अगर एक बड़ा वर्ग साम्प्रदायिकता के पक्ष में बने रहते हुए केन्द्र की सत्ता पर काबिज होने का सपना ताल ठोक कर देख सकता है, तो धर्म निरपेक्षता के सद्यस्वरूप का पुनर्परीक्षण ज़रुरी हो जाता है। यह केवल एक प्रबुद्धीय चुनौती नहीं है बल्कि अक्सर मैंने धर्म निरपेक्षता का प्रतिनिधित्व करते समय इस प्रश्न का सामना किया है, कि  धर्म निरपेक्षता की परिभाषा क्या है ? इसलिए बेहतर है कि पहले इसी प्रश्न का सामना आत्मनिरीक्षण के स्तर पर किया जाय।

धर्म निरपेक्षता की मूल अवधारणा देश में ऐसे वातावरण को स्थापित करने का प्रयास है जिसमें सभी भारतीय धर्मों के लोग स्वतंत्र रूप से, अपने अपने धर्मों और धार्मिक विश्वासों का निर्वाह करते हुए रह सकें। इस संकल्पना में यह भाव अन्तर्निहित माना गया कि सभी देशवासी एक दूसरे के धर्म और धार्मिक विश्वासों के प्रति सहज बनेंगे और उनके प्रति किसी के मन में अनादर या विद्वेष की भावना नहीं पनपेगी। अगर ऐसा होता है तो इसे असंवैधानिक माना जाएगा और प्रशासन इस संदर्भ में यथानुकूल कार्यवाही करेगा। इस अवधारणा के समांतर और अनुकूल, यह संवैधानिक वैचारिकता भी रची गयी कि देश की कुल व्यवस्थाएं किसी भी धर्म विशेष की मान्यताओं पर अवलंबित नहीं होंगी, बल्कि स्वतंन्त्र रूप से, या कहें, धर्म निरपेक्ष हो कर रची जायेंगी और उनके निर्वाह में धार्मिकता के भेदभाव की कोई जगह नहीं होगी। इसी अवधारणा और व्यवस्थागत संकल्पना को केन्द्र में रख कर हमारे संविधान का गठन हुआ था, जो कि भारत के लिये आज़ादी के बाद का बड़ा काम गिना जाएगा। इसी काम के चलते भारत ‘गणतंत्र’ राज्य बना और धर्म निरपेक्षता उसकी केन्द्रीयता। इस लिहाज़ से सब कुछ चौकस पाबन्द हुआ, यह माना जाना चाहिये। लेकिन। इसकी चौकस पाबंदगी कितनी कारगर साबित हुई, यह इसी से ज़ाहिर है कि एक बड़ा वर्ग, जो कि सांप्रदायिक भी है और अपने प्रत्यक्ष परोक्ष रूप में अलोकतांत्रिक भी, केन्द्र की सत्ता पर काबिज होने का मंसूबा बना रहा है और एलानिया धर्म निरपेक्षता का घोर पक्षधर वर्ग इस प्रश्न का सामना करते हुए कमज़ोर दिख रहा है कि आखिर धर्म निरपेक्षता की परिभाषा क्या है ?

यह एक जटिल प्रश्न ज़रूर है लेकिन असंभव नहीं। कठिन भी इसलिए है, क्योंकि इस प्रश्न के तात्कालिक उत्तर से काम नहीं चलने वाला  बल्कि ऐसे उत्तर की खोज होनी है जो सभी कसौटियों पर खरा उतरते हुए, एक सर्वकालिक समाधान बन सके। इसलिए मैं प्रसंगवश, देश की पृष्ठ्भूमि को दूर तक टटोलने की ज़रूरत महसूस कर रहा हूँ।

देश की आज़ादी, यानी ब्रिटिश सरकार से आज़ादी जो 15th अगस्त 1947 को हासिल हुई, मैं उसके पहले के भारत का इतिहास सामने रखता हूँ।

अंग्रेजों के राज के पहले भारत में मुगलों का राज था और वह भी सामंती व्यवस्था की शक्ल में। सुदूर काल में देखने पर पता चलता है कि आठवीं सदी में अरबों ने सिंध को जीता था, यानी उनका पदार्पण हो चुका था। बताया जाता है कि ग्यारहवीं सदी से भारत तुर्क मूल के हमलों केन्द्र बन गया था। महमूद गजनवी का पहला हमला 1001 ईस्वी में हुआ। 1206 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में गद्दीनशीन हो चुका था और वह 1210 तक बना रहा। फिर इल्तुतमिश का गुलाम वंश, उसके बाद खिलजी। यह श्रृंखला तुगलक, सैयद और लोदी वंश तक जारी रही। लोदियों मे इब्राहिम ने 1526 तक हुकूमत की। यह सिलसिला उत्तर भारत का हुआ।

उधर गुजरात में भी 1411 से 1442 तक अहमदशाह प्रथम ने और फिर 1448 से 1511 तक महमूद बेगढ़ ने अपना कब्ज़ा जमाए रखा। वह तो गुजरात में मुग़ल साम्राज्य पुर्तगाल के जल दस्युओं के कारण कमज़ोर हुआ। फिर भी मुगलों ने एक सदी तक तो अपनी पीढियां वहां पैदा ही कीं। दक्षिणी भारत, जिसे दकन कहा गया, वहां भी मुगलों का अधिपत्य फैलता ही रहा, और उनकी पीढ़ियों की पीढ़ियां वहां बस कर रियाया का हक पाती रहीं। कुल मिला कर, अंग्रेजों के  अट्ठारहवीं सदी में अंग्रेजों के आ कर जम जाने तक मुग़ल भारत की धरती पर, बादशाह के रूप में, हमलावरों के रूप में और रियाया के रूप में गुजर बसर करते रहे और फलते फूलते रहे। इससे यह समझा जा सकता है कि अंग्रेजों के हुकूमत में आने के करीब एक हज़ार साल पहले से मुग़ल वंशज भारत की आबोहवा और दानापानी को अपना नसीब मान कर पाते रहे हैं और भारत को ही अपना मुल्क मानते रहे हैं। तवारीख, यानी इतिहास का यह व्योरा इस बात का हवाला देता है कि भारत की जनसंख्या में हिंदुओं और मुसलमानों का मिला जुला रंग, आज की बात नहीं है बल्कि हज़ार साल की हकीकत है। यहां एक हकीकत का और बखान हो जाय। अंग्रेजों के आने के पहले भारत एक मुकम्मल यानी एकखंड देश नहीं था बल्कि रियासतों का समूह था। रियासतें सामंती ढर्रे पर चलतीं, फैलतीं और जीतती हारती थीं। हर रियासत अपने विस्तार के लिये किसी दूसरी रियासत से मिल कर तीसरी पर आक्रमण करती थी। बकायदा लड़ाइयों का माहौल होता था। इस नाते, जब, चाहे शाहजहाँ हो या चाहे सम्राट अशोक, गद्दी के लिये सबने अपने सगे भाइयों तक को मार डाला, तो आपस की लड़ाइयों को धर्म, जाति या किसी अन्य पहचान के रूप में देखने का कोई मतलब नहीं रह जाता। लड़ाइयां होती रही हैं, लेकिन उन्हें सांप्रदायिक लड़ाई का नाम नहीं दिया जा सकता।

अंग्रेजों का भारत आना व्यापार और समृद्धि के लिये आना था, फिर रियासतों के मनसबदारों ने अपने निजी लालच के चलते उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को हवा देनी शुरू की, यानी उनके मुंह खून का स्वाद लगाया। अंग्रेज कौम ऊपर से जितनी शिष्ट और सौम्य थी, भीतर से उतनी ही कुटिल और चालबाज़ थी। उसे समझ में आने में देर नहीं लगी कि रियासती फांकों में बंटे हुए इस मुल्क हिन्दुस्तान को और भी टुकड़ों में बांटा जा सकता है, उनके बीच भेद-भाव बोया जा सकता है और फिर उन्हें आपस में लड़ा कर, लड़ाइयों से लदे फंदे मुल्क में लड़ाई की एक नई किस्म पैदा की जा सकती है,  ‘सांप्रदायिक लड़ाई ‘। और फिर फूट डालो राज करो की नीति अपना कर भारत के लिये स्वाधीनता का लक्ष्य सपनों से भी दूर किया जा सकता है। बस फिर क्या था उनका कुचक्र शुरू हो गया।

अंग्रजों ने भारत को ‘गुड गवर्नेंस’ दिया। यानी प्रशासनिक व्यवस्थाएं, जिनमें एक न्याय व्यवस्था भी थी। इसके लिये कानून ऐसे बनाये जो फूट को बनाए रखने में मददगार हों। एक धड़े को फायदेमंद लगें और दूसरे को खिलाफ खड़े होने का कारण दें। हिंदू और मुसलामानों के लिये अलग अलग कानून बनाना इसी बदनीयती का प्रतिफल है। हिंदुओं में सवर्णों और दलितों के बीच घृणा की हद तक अलगाव जितना अंग्रेजों के राज में पैदा हुआ उतना पहले नहीं था। इसी तरह वर्ण व्यवस्था को हवा दे कर और भी बंटवारा किया गया। पुचकारना और लतियाना उनकी नीति रही। आरक्षण का विचार इसी कुटिल पुचकार का प्रतिफल है। परिवारों में स्त्री और पुरुष के बीच के भेदभाव को भी अंग्रेजों ने हवा दी और कुल मिला कर स्थिति यह बन गयी कि आज़ादी पाने में भारत को युग लग गया।

भारत को स्वाधीन करना अंग्रेजों की विवशता बनने लगी तो उन्होंने भारतीयों के बीच ऐसा वर्ग तैयार करना शुरू किया जिन्हें काला अंग्रेज कहा जा सके। इस वर्ग को पहले भावी हुकूमत की रंगत दिखाई और फिर यह समझा दिया कि न ‘फूट डालो राज करो’ की नीति बदलो और न ही कानून के ढाँचे में छेड़छाड़, फिर चाहे खुद को लोकतांत्रिक कही या धर्म निरपेक्ष, चलेगा।

इस नये काले अंग्रेज वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में नेहरु को पहचाना जा सकता है। नेहरु की किताब ‘ग्लिम्प्स ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री 1934-35 में किताबिस्तान इलाहबाद से प्रकाशित हुई थी, जिसका पहला पत्र 26th अक्टूबर 1930 का है। यानी, विगत का कौन सा ऐतिहासिक   सच था जो उनकी नज़र से ओझल था, तब भी उन्होंने भारत की आज़ादी के बाद के स्वरूप की संकल्पना में वही पुराने अंग्रेजों के कानून को बने रहने दिया, आरक्षण का लौलिपौप जारी किया और पाकिस्तान की नींव रखवा कर भारत में ऐसा सांप्रदायिक माहौल तैयार कर दिया जिसके आगे धर्म निरपेक्षता की परिभाषा व्यंग्पूर्वक पूछी जाने लगी।

दरअसल, धर्म निरपेक्षता या लोकतंत्र अपने सही माने में तभी ठहरेगा जब भारत के सभी धर्मों के लिये कानून के प्रारूप में कोई अंतर नहीं होगा। नागरिक अपने घर और धार्मिक स्थल पर अपने धर्मानुसार आचारह व्यवहार करें, वह इसके लिये स्वतंत्र हैं। वह इसके लिये भी स्वतंत्र हैं कि वह अपनी श्रद्धानुसार किसी दूसरे धर्म के आयोजन परिसर में जाएँ। लेकिन वह न तो किसी दूसरे धर्म के आचरण पर आक्षेपपूर्ण टिप्पणी करने के लिये स्वतंत्र हैं, न ही इस बात के लिये कि वह दूसरे धर्म के आयोजन में जाएंगे तो सही लेकिन उसके अनुशासन का पालन नहीं करेंगे। जैसे चर्च में लोग जूते पहन पर जाते हैं और प्रार्थना करते हैं। यह उनकी मूल परिपाटी है। लेकिन अगर कोई किसी हिंदू के धार्मिक आयोजन में जाता है तो उसे जूते उतार कर ही जाना होगा। आरती करना मंदिर का विधान है, ऐसे में अगर कोई वहां है तो वह उसे अस्वीकार नहीं कर सकता। साथ ही, राष्ट्रीय संन्दर्भ में सबका आचरण, धर्मनिरपेक्ष रूप से एक सा होना अनिवार्य होना चाहिये। राष्ट्रीय झंडे के सम्मान में, राष्ट्र गान या वंदे मातरम के गायन में कोई भी छूट मान्य नहीं होनी चाहिये। यह बाध्यताएं धर्मनिरपेक्षता के अनुकूल हैं। जहाँ इन बाध्यताओं में हीला हवाली होती है, वहीँ व्यवस्था पर पक्षपात का आरोप लगता है और माहौल सांप्रदायिक हो जाता है।

आज सत्ता के गठन के संदर्भ में धर्म निरपेक्षता और सांप्रदायिकता एक बड़ा मुद्दा है। एक वर्ग है जो इस बात को झुठला कर कि भारत में मुसलमान हजारों साल से रह रहे हैं, प्रत्यक्ष परोक्ष हिंदू राष्ट्र की तर्ज़ पर राजनैतिक खेल खेल रहा है और डंके की चोट पर गैर हिंदुओं की हत्या को उचित ठहराते हुए केन्द्र की सत्ता की ओर कदम बढ़ा रहा है। इसके बरअक्स दूसरा वर्ग है जो खुद को धर्म निरपेक्ष कहते नहीं थकता, लेकिन वह कानून के ढांचे में उस आमूल बदलाव की ओर से उदासीन है जो अंग्रेजों ने अपनी कुटिल नीति के तहत बनाया था। दरअसल, धर्म निरपेक्ष कहलाने वाला वर्ग भी धर्म निरपेक्षता की परिभाषा का निर्वाह नहीं करना चाहता क्योंकि उसके मन में भी वही ‘फूट डालो राज करो’ की भावना हैं।

धर्म निरपेक्षता राष्ट्र भर के लिये एक से कानून की मांग करती है। जातिगत विद्वेष को मिटाने के लिये जाति के आधार पर आरक्षण खत्म करने की मांग करती है। किसी भी समुदाय विशेष के पक्ष में किसी भी कारण से, अतिरिक्त झुकाव का विरोध करती है। किसी भी अलगाववादी कानून को मान्यता नहीं देती इसलिए धारा 370 को भी हितकर नहीं पाती। यह कुछ कसौटियां हैं जो धर्म निरपेक्षता का सार्थक आयाम मानी जा सकती हैं और धर्म निरपेक्षता की परिभाषा गढती हैं। अन्यथा जो कुछ भी है, वह केवल उजला किन्तु कुटिल नारा है, उतना ही, जितना अंग्रेजों के पास भारतीयों के लिये था।

 

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