नई चिकित्सा- बिना आपरेशन दूर होगी फाइब्रायड की समस्या

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क्या है फाइब्रॉयड? रसौली बीमारी क्या है?

फाइब्रॉयड यानी रसौली (Fibroid in Hindi) या ट्यूमर होना। वैसे तो यह किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन ये अक्सर 30 से 50 वर्ष के बीच की महिलाओं में अधिक देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये मोटापा से ग्रस्त महिलाओं में अधिक होता है, क्यों कि उनमें एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर (estrogen hormone levels) अधिक होता है। अगर कारणों की बात करें तो इसके सटीक कारणों का पता आज तक नहीं चल पाया है। फाइब्रायड को महिलाओं के शरीर में बनने वाले एक हार्मोन एस्ट्रोजन से जोड़कर देखा जाता है। ये महिलाओं की ओवरी में बनता है।

महिलाओं में फाइब्रायड उनकी प्रोडक्टिव उम्र 16 से 50 वर्ष कभी-भी उभर सकती हैं। इनका आकार तब बढ़ता है जब एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ता है। इन फाइब्रायड का आकार तब घट जाता है, जब एस्ट्रोजन का स्तर गिरता है जैसे मेनोपोज होने के बाद। आमतौर पर फाइब्रायड गर्भाशय की दीवार से निकलते हैं, जिससे बांझपन का खतरा भी रहता है। फाइब्रायड का आकार मटर के दाने से लेकर खरबूजे के आकार तक का हो सकता है।

नई दिल्ली स्थित फोर्टिस हास्पिटल के वरिष्ठ कंसल्टेंट इंटरवेंशनल रेडियोलोजिस्ट डॉ. प्रदीप मुले का कहना है कि फायब्राइड या रसौली ऐसी गांठें होती हैं जो कि महिलाओं के गर्भाशय में या उसके आसपास उभरती हैं। ये मांस-पेशियों और फाइब्रस ऊतकों से बनती हैं और इनका आकार कुछ भी हो सकता है। कभी-कभी इन्हें यूटरीन मायोमास और फाइब्रोमायोमास के नाम से जाना जाता है। बहुत सी महिलाओं को पता ही नहीं होता है कि उन्हें फाइब्रायड है क्योंकि उनमें ऐसे कोई लक्षण ही नहीं होते हैं। कभी-कभार जांच के दौरान पता चल जाता है कि वे फाइब्रायड का शिकार हैं। यह ट्यूमर नॉन कैंसर बिनाइन होता है।

क्यों होते हैं फाइब्रॉयड? | Why are there fibroids?

फाइब्रायड की उपज महिला की प्रजनन क्षमता के कारण होती है और इसको विकसित करने में एस्ट्रोजन हार्मोंन का हाथ होता है। यह हार्मोन अंडाशय में बनता है और हड्डियों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संतानहीन महिलाओं में इसका खतरा अधिक होता है। अल्ट्रा सांउड, सी टी स्कैन व एम आर जांच के द्वारा इसकी पुष्टि होती है। कई बार फाइब्रायड अपना लक्षण प्रकट नहीं करती है और किसी कारण से अन्ट्रा साउंड करने पर उसका पता चलता है।

फाइब्रॉयड होने के कारण (Why do fibroids happen?)

वैसे फैलोपियन ट्यूब के बंद होने की कई वजहें हो सकती हैं जैसे-संक्रमण, टीबी, बार-बार गर्भपात होना, गर्भधारण को रोकने के लिए कई विकल्पों का इस्तेमाल करना आदि। शल्य रहित प्रक्रिया की जानकारी के अभाव में मरीज शल्य प्रक्रिया कराने के लिए तैयार हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप मरीज को लंबे समय तक हॉस्पिटल में रहना पड़ता है। उससे शरीर पर भद्दे दाग पड़ जाते हैं और इससे संक्रमण होने की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं व टांके आदि भी लगाने पड़ते हैं। लेकिन अब यह शल्य रहित कैथराइजेशन प्रक्रिया किसी प्रशिक्षित इंटरनेशनल रेडियोलोजिस्ट द्वारा ही कराई जा सकती है।

डॉ. प्रदीप मुले का कहना है कि इस प्रक्रिया के कई फायदे हैं। जैसे-यह बिना टांके, चीरा, दर्द के होता है। मरीज प्रक्रिया कराके तुरंत घर लौट सकता है। मरीज अपनी नियमित दिनचर्या जल्द ही अपना सकते हैं। जिन औरतों की दोनों ओर की ट्यूब अवरूद्ध होती है, उन्हें भी एक ही सिटिंग में खोला जा सकता है। इसमें मरीज को बेहोश करने की भी आवश्यकता नहीं होती है और इसमें खर्च भी कम लगता है।

महिलाओं में फाइब्रॉयड होने पर क्या होता है? (What happens when women have fibroids?)

डॉ. प्रदीप मुले का कहना है कि महिलाओं में फाइब्रायड होने पर महावारी अनियमित हो जाती है, ओवोल्यूशन माहवारी (ovulation menstruation) कभी 32 दिन तो कभी 24 दिन कभी इससे अधिक और कम भी हो जाता है। कभी-कभी माहवारी महीने में दो बार भी हो जाती है। थोड़ा भार उठाते ही महिलाओं को रक्त स्राव होने लगता है। महावारी के दौरान बहुत अधिक रक्त स्राव होने लगता है। पेट के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत अकसर रहने लगती है। कई बार इससे महिलाएं तनावग्रस्त भी हो सकती हैं। कुछ महिलाओं में फाइब्रायड होने पर दर्द महसूस भी नहीं होता। फाइब्रायड के कारण संभोग के समय दर्द, बार-बार मूत्रत्याग की इच्छा, बड़ी आंत पर दवाब और कब्ज जैसे लक्षण भी हो सकते हैं। अधिक उम्र में भी गर्भवती होने से भी फाइब्रायड का खतरा बढ़ जाता है। सामान्य तौर पर फाइब्रायड बनने का कारण एस्ट्रोजन हार्मोन है। फाइब्रॉयड का इलाज (treatment of fibroids) इस बात पर निर्भर करता है कि फाइब्रायड गर्भाशय के किस हिस्से पर है और कितने है। फाइब्रॉयड का आकार (fibroid size) कितना है, पीड़ित महिला अविवाहित है या विवाहित। ये सभी बातें इलाज के लिए महत्वपूर्ण है। यदि फाइब्रायड का आकार 3 से 4 सेमी है तो ऐसे में हार्मोन थेरेपी (hormone therapy) और अन्य दवाओं के द्वारा किया जाता है। लेकिन अगर फाइब्रायड का आकार 5 से 6 सेमी तक बढ़ जाता है तो उसे सर्जरी करनी पड़ती है, जिससे उसे निकाला जाता है। यदि फाइब्रायड दो से अधिक होते हैं और उनका आकार भी बड़ा होता है तो और पीड़ित महिला को रक्त स्राव ज्यादा होता है, तो ऑपरेशन के माध्यम से फाइब्रायड को निकाला जाता है। यह ऑपरेशन लैपरोस्कोपी के माध्यम से होता है। यदि पीड़ित महिला की उम्र 40 से ज्यादा है और फाइब्रायड का आकार बड़ा है तो इस स्थिति में पहले दवा दी जाती है। यदि इससे आराम नहीं मिलता तो इंजेक्शन दिए जाते हैं। यदि इससे भी फर्क नहीं पड़ता तो गर्भाशय को ऑपरेशन के माध्यम से हटा दिया जाता है।

मासिक धर्म के दौरान कुछ महिलाओं में अधिक मात्रा में रक्त का स्राव। भारी और लंबी पीरियड होने के कारण एनीमिया भी हो सकता है। दर्दनाक पीरियड, पीरियड के बीच में रक्त स्राव। पेडू में दर्द और दवाब साथ ही पेट, कमर या लॉ बेक में दर्द, बांझपन। फाइब्रॉयड के कारण कभी कभी गर्भवती बनने में मुश्किल हो जाती हैं। गर्भावस्था में समस्याएं जैसे समय पूर्व प्रसव होना, गर्भपात भी हो सकता है। मासिक स्राव के दौरान अधिक खून आने के साथ ही पेट और कमर में दर्द। आमतौर पर 3 से 5 दिन तक चलने वाले रक्त स्राव की अवधि 8 से 10 दिन हो जाती है।

दवाइयों, शल्य क्रिया और लैप्रोस्कोपी, अति सुक्ष्म छिद्र द्वारा फाइब्रायड  के  निदान के साथ ही अधिकतर केसों में हिस्टरटेक्टोमी कराने की सलाह दी जाती थी, मगर अब एक नई शल्य रहित चिकित्सा यूट्रीन फाइब्रोइड एंबोलाइजेशन के आ जाने से हिस्टरटेक्टोमी कराने की जरूरत नहीं पड़ती।

रसौली का इलाज (treatment of neoplasm) | भारत में गर्भाशय को हटाने के लिए कौन सी सर्जरी सबसे अच्छी है?

डॉ. प्रदीप मुले का कहना है कि इस आधुनिक तकनीक के द्वारा त्वचा पर अति सूक्ष्म छिद्र करके बच्चेदानी की फाइब्रॉयड का इलाज (Uterine fibroids treatment) किया जाता है। इस प्रक्रिया में रोगी को बेहोश नहीं किया जाता और उसे अस्पताल में केवल एक ही दिन रुकना पड़ता है। इस प्रक्रिया के उपरांत अधिकतर महिलाएं 1-3 दिन में सामान्य रूप से कार्य करने लगती हैं और बच्चेदानी को निकालने की आवश्यकता नहीं होती है। एक ही समय में सारी फाइब्रायड का उपचार हो जाता है और यह अत्यधिक प्रभावशाली है। दरअसल इस प्रक्रिया के दौरान एक इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट (interventional radiologist) त्वचा पर एक अति सूक्ष्म सा छिद्र करके पेट के निचले हिस्से से नली डालकर एंजियोग्राफी करता है। गर्भाशय नलिका की पहचान (Uterine duct identification) एंजोग्राफी द्वारा करने के उपरांत नली के जरिए राई के दाने के बराबर की दवाई इंजेक्शन द्वारा रसौलियां तक पहुंचाते हैं। रक्तस्राव के कारण होने वाला दर्द (bleeding pain) भी 4-6 घंटों में ठीक हो जाता है और रक्तस्राव तुरंत बंद हो जाता है।

उमेश कुमार सिंह