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नक्सलवाद बनेगा चुनावी मुद्दा!

एच एल दुसाध
   चार दशक से जारी नक्सलवादी आन्दोलन के इतिहास में 6 मार्च, 2010 एक खास दिन था। उस दिन माओवादी नेता कोटेश्वर राव उर्फ़ किशन जी ने घोषणा की थी- ‘हम 2050 के बहुत पहले ही भारत में तख्ता पलट कर रख देंगे।हमारे पास अपनी पूरी फ़ौज है।’ उनके उस बयान पर तब के गृहसचिव जीके पिल्लई ने कहा था,’माओवादी यह सपना देखते रहें, आखिर डेमोक्रेसी में सबको सपना देखने का अधिकार है।’ जाहिर है सरकार ने माओवादियों की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया था।किन्तु उस एलान के बाद से माओवादी थोड़े-थोड़े अन्तराल पर बड़ी-बड़ी बारदातें अंजाम दे कर यह संकेत देते रहे हैं कि वे सिर्फ सपना ही नहीं देखते बल्कि उसे हकीकत का रूप देने की कूवत भी रखते हैं। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने लोकसभा चुनाव पूर्व फिर एक बड़ी वारदात अंजाम दे दिया है।
  गत 11 मार्च को उन्होंने छत्तीसगढ़ के सुकुमा जिले में एक भीषण वारदात को अंजाम देते हुए 15 जवानों को मार डाला जिनमें 11 जवान सीआरपीएफ और चार जिला पुलिस बल के थे। यह हमला उन्होंने झीरम घाटी इलाके में उसी जगह अंजाम दिया है जहाँ छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव पूर्व गत 25 मई को कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर हमला हुआ था।उस हमले में 32 लोग मारे गए थे। इसी इलाके में माओवादियों ने 2010 में 76 जवानों की हत्या कर डाली थी। बहरहाल 12 मार्च के अखबारों में इस घटना की रिपोर्ट के साथ ही कई अख़बारों ने सम्पादकीय भी लिखे। इनमें एक बहुपठित अखबार की सम्पादकीय में तमाम अखबारों की राय का सटीक प्रतिबिम्बन हुआ था जिसमें कहा गया था- ‘नक्सलियों का दुस्साहस बेलगाम होते जा रहा है और वे ऐसी स्थिति में दिखने लगे हैं कि जब चाहें,जहाँ चाहें,हमला करें।नक्सलियों के प्रत्येक हमले के बाद जिस तरह शोक–संवेदना भरे बयान आने के साथ उनसे निपटने की बातें की जाती हैं वैसा कुछ इस बार भी होनेवाला है।यह भी तय है कि इस हमले की अपनी-अपनी तरह से व्यख्या की जायेगी। कोई सुरक्षा बलों के पर्याप्त सतर्क न होने का उल्लेख करेगा तो कोई केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल के अभाव का। यह कई बार स्पष्ट हो चुका कि नक्सली न तो बातचीत के जरिये समस्या का समाधान के लिए इच्छुक हैं और न वे हिंसा के रास्ते का परित्याग करने वाले हैं,लेकिन इस सबके बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों के रवैये में कहीं कोई तब्दीली नहीं आ रही है। यदि यह सोचा जा रहा है कि निंदा– आलोचना और भर्त्सना से नक्सलियों की सेहत पर कोई असर पड़ेगा तो यह व्यर्थ है। नक्सली तभी रास्ते पर आ सकते हैं जब उन्हें निहत्था और निःशक्त करने की किसी ठोस रणनीति पर काम किया जाएगा।’
उस अखबार ने जो कयास लगाया था लगभग हूबहू वैसा ही हुआ। हमले के अगले दिन शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने पहुंचे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे। उन्होंने हमले का बदला लेने का एलान करते हुए कहा- ‘बस्तर में सुरक्षाबल की मौजूदगी से गत विधानसभा चुनाव में अच्छे से निपटे थे। नक्सलियों का संगठन कमजोर हो रहा है। वे डरे हुए हैं और उनकी गतिविधियों में कमी आई है। इसी कारण लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने ऐसा हमला किया है। हमें पता है नक्सली कहाँ हैं? इस हमले की कोई निश्चित खुफिया सूचना नहीं थी।’ उसके बाद उन्होंने बंद कमरे में हुई बैठक में पुलिस अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई। साथ ही केन्द्रीय बलों और राज्य पुलिस के बीच समन्वय के अभाव पर भी असंतोष ज़ाहिर करते हुए उचित तालमेल के साथ काम करने की नसीहत दी।
  बहरहाल जब-जब नक्सली राष्ट्र को हिलाकर रख देनेवाली घटनाएँ अंजाम देते हैं, तब-तब हमारे बुद्धिजीवी भी कलम के साथ सक्रिय हो जाते हैं। कोई सरकार को नक्सलियों से कड़ाई से निपटने का सुझाव देता है, जैसा कि उपरोक्त अखबार ने दिया है तो कोई नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में विकास की गंगा बहाने का नुस्खा पेश करता है। कुछ बुद्धिजीवी विदेशी विद्वानों के अध्ययन के आधार पर नए सिरे से इस समस्या की जड़ पहचानने की कोशिश करते हैं। इनमें शायद ही कोई इसकी जड़ों की पहचान के लिए संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर की ओर मुखातिब होता है। जबकि सचाई यही है कि आंबेडकर को पढ़े बिना न तो हम इस समस्या की सही पहचान कर सकते हैं और न ही उपयुक्त समाधान ढूंढ सकते हैं।
  नक्सलवाद या माओवाद के कारण आज राष्ट्र को थोड़े-थोड़े अन्तराल पर जिस हालत से दो-चार होना पड़ रहा है,उसकी कल्पना करके ही डॉ. आंबेडकर ने 25 नवम्बर,1949 को संसद के केन्द्रीय कक्ष से राष्ट्र को चेतावनी देते हुए कहा था- ‘हमलोगों को निकटतम समय के मध्य आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा कर लेना होगा, नहीं तो विषमता से पीड़ित जनता इस राजनैतिक गणतंत्र को विस्फोटित कर सकती है।’ जिस आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के खात्मे का आह्वान आंबेडकर में किया था वही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है एवं जिसके फलस्वरूप ही दुनिया में गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, विच्छिन्नता, आतंकवाद इत्यादि जैसी तरह-तरह की समस्यायों का उद्भव होता रहा है। चूँकि सारी दुनिया में ही आर्थिक और सामाजिक विषमता की उत्पत्ति शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक और धार्मिक)के लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे से होती रही है इसलिए लोकतंत्र की सलामती को ध्यान में रखते हुए शासक दलों को भारत के चार प्रमुख सामाजिक समूहों-सवर्ण,ओबीसी,एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों-के स्त्री पुरुषों के संख्यानुपात में शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की ठोस कार्ययोजना बनानी चाहिए थी, जो नहीं हुआ। इस बीच आजाद भारत में पंडित नेहरु, इंदिरा गाँधी, जयप्रकाश नारायण, ज्योति बसु, राजीव गाँधी, अटल बिहारी वाजपेयी इत्यादि जैसे राजनीति के सुपर स्टारों ने अपनी प्रतिभा से से राष्ट्र को धन्य किया, किन्तु तमाम खूबियों के बावजूद वे लोकतंत्र की सलामती की दिशा में कारगर उपाय न कर सके। फलस्वरूप 15 प्रतिशत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न तबके का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा हुआ और शेष बहुसंख्य आबादी 15-20 प्रतिशत अवसरों पर गुजर-बसर करने के लिए विवश हुई। ऐसी गैर-बराबरी विश्व में अन्ययत्र कबका ही लोकतंत्र के विस्फोटित होने का सबब बन गयी होती। किन्तु भारत में देर से ही सही आदिवासियों के तरफ से माओवादियों ने लोकतंत्र को चुनौती दिया।
  आदिवासियों के तरफ से माओवादियों को लोकतंत्र को चुनौती देने अवसर इसलिए मिला क्योंकि आजाद भारत के शासकों ने भागीदारीमूलक नहीं, भीखनुमा योजनाओं के सहारे देश को महाशक्ति बनाने की जो परिकल्पना किया उसमें शक्ति के स्रोतों में न्यूनतम शेयर ही आदिवासियों को मिला। किन्तु शासकों ने शक्ति के स्रोतों के न्यायोचित बंटवारे से जो परहेज किया उसके फलस्वरूप वंचना के लिहाज़ से मुस्लिम, दलित और पिछड़े भी आदिवासियों से बहुत बेहतर स्थिति में नहीं है। माओवादियों की नज़र इन बाकी वंचित तबकों पर भी है। शायद इनको दृष्टिगत रखकर ही उन्होंने 2050 के बहुत पहले लोकतंत्र के दिर मंदिर पर कब्जा ज़माने की घोषणा कर दिया है। अतः सुकुमा की सद्य घटना को गृहमंत्री की तरह हलके में न लेकर राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे नक्सलवाद के खात्मे को अपने घोषणापत्र का अन्यतम प्रमुख अजेंडा बनायें।चूँकि नक्सलवाद का खात्मा सिर्फ और सिर्फ आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे से ही हो सकता इसलिए जब वे समतामूलक समाज निर्माण की ठोस कार्ययोजना पर आगे बढ़ेंगे तो नक्सलवाद का शमन होगा ही, राष्ट्र महिला-मुस्लिम-दलित-पिछड़ा अशक्तिकरण की समस्या से भी उबर जायेगा, जो लोकतंत्र की सेहत के लिए संजीवनी बूटी साबित होगी। राजनीति को मिशन से प्रोफेशन में तब्दील कर चुके नेताओं को यह अजेंडा अपने घोषणापत्र में प्रमुखता से डालना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जब लोकतंत्र का मंदिर सलामत रहेगा तभी वे राजनीति को यश और धनार्जन का माध्यम बना पाएंगे।
प्रकाशित- जनमोर्चा,16मार्च,2014।

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एच एल दुसाध, लेखक बहुजन चितक, स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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