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नमो को किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसरी थोड़े ही करनी है

व्यंग्य—

एक मासूम भक्त की मासूम पीड़ा

अरविन्द कुमार
लोग चाहे कुछ भी कहें। कनुआ को पक्का विश्वास है कि नमो के रूप में इस धरती पर प्रभु का दसवां अवतार हो चुका है। और वह दिन दूर नहीं जब इस पूरे देश में नमो राज्य की तरह राम राज्य तो स्थापित होगा ही, यह देश भी सोने की चिड़िया बन जायेगा। और देश जैसे ही सोने की चिड़िया बनेगा, खुद उसके भी सारे कष्ट स्वतः ही दूर हो जायेंगे। नमो के बारे में फ़ैली तमाम अफवाहों और आलोचनाओं के बावजूद कनुआ को पूरा भरोसा है कि भले ही इस प्रभु के हाँथ में कोई सुदर्शन चक्र या जादू की छड़ी न हो, पर ज़रुरत पड़ने पर अपने तरकश से वे कोई न कोई अमोघ अस्त्र ज़रूर निकालेंगे। और देखते ही देखते इस धरती को पाप और पापियों से रहित कर देंगे। जैसा कि उन्होंने अपने नमो राज्य में किया हुआ है। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान कृष्ण ने कहा भी था—हे अर्जुन, जब जब इस धरती पर धर्म की हानि होगी, तब तब अधर्म का नाश करके धर्म को पुनर्स्थापित करने के लिए मैं इस धरती पर अवश्य अवतरित होऊंगा…
—लेकिन कब अवतरित होगे, प्रभु? देखो, घोर कलियुग आ गया है। आज कल हंस दाना चुग रहा है और कौआ मोती खा रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, हत्या-लूट, बलात्कार, सूदखोरी, मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद ने सभी का जीना दुश्वार कर दिया है। कभी हमें पाकिस्तान घुड़कता है, तो कभी चीन धमकाता है। और कभी कभी तो बंगला देश भी आँखे तरेरने लगता है। धर्म की हालत तो यह हो गयी है कि लोग-बाग़ राज धर्म निभाना तो दूर, एक धर्म का बंदा दूसरे धर्म के बंदे का गला काट रहा है। और हर तरफ अधर्म का बोलबाला है।
कुछ दिनों पहले तक कनुआ इसी तरह रोज़ भगवान की मूर्ति के सामने बैठ कर बातें किया करता था। लेकिन मूर्ति थी कि कुछ बोलती ही नहीं थी। बस मुस्कुरा कर रह जाती थी। और उस मुस्कराती हुयी मोहिनी मूरत को ही प्रभु के शीघ्र आने का आश्वासन समझ कर कनुआ उत्साहित हो जाता था। और उम्मीद की मासूम आशा लिए अपना सब दुःख दर्द भूल कर दोगुने जोश के साथ काम पर निकल पड़ता था। लेकिन शाम ढलते ही उसके ऊपर फिर से निराशा तारी हो जाती थी। और सुबह के इंतजार में करवटें बदलते हुए वह किसी तरह से रात गुज़ारता था, ताकि सुबह फिर भगवान से फाईनली पूछ सके कि साफ़-साफ़ बताओ कि तुम्हारा कलियुगी अवतार कब होगा?…और होगा भी कि नहीं?
काफी समय से कनुआ इसी तरह किसी अवतार की आशा में टकटकी लगाये आसमान की ओर देख रहा था। ज़िंदगी बदलने की आशा में वह कभी इसको तो कभी उसको वोट देकर सरकारें बनवाता था। सरकारें बनती थीं और अपना समय पूरा करके चली जाती थीं। पर उसकी ज़िंदगी दिन पर दिन बद से बदतर हो रही थी। पर उसे पक्का विश्वास था कि कभी न कभी कोई न कोई आसमानी देवता इस धरती पर ज़रूर आएगा, जो देश और उसकी ज़िंदगी की सारी मुश्किलों को पलक झपकते ही हल कर के रख देगा। घर धन-धान्य से भर जायेगा। गरीबी काफूर हो जायेगी। सितवा का मुकम्मिल इलाज़ हो जायेगा। मुनिया की शादी हो जायेगी। और रमुआ पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बन जायेगा। अपना घर होगा। अपने खेत होंगे। अपनी फसल होगी। और ज़िंदगी में हरवक्त खुशियों की बहार छा जायेगी। लेकिन अब टीवी और अखबार पढ़ पढ़ कर और इंटरनेट देख देख कर कनुआ को पूरा विश्वास हो गया है कि देर से ही सही कल्कि प्रभु नमो का रूप धारण करके अवतरित हो चुके हैं। और सिर्फ अवतरित ही नहीं हुए हैं, नमो राज्य को सुधारने के बाद वे अब इस पूरे देश की शक्लो-सूरत को बदलने के अपने व्यग्र हठी अभियान पर निकल भी पड़े हैं।
लेकिन कनुआ को इस बात का बहुत दुःख है कि तमाम अखबारों, टीवी चैनलों, राय-सर्वेक्षणों और लाखों-करोड़ों फेसबुक-ट्विटर करने वालों ने भी जब नमो को अपना भगवान मान लिया है, तो फिर कुछ लोग अभी भी नमो को प्रभु क्यों नहीं मान रहे? कहीं ये लोग पकिस्तान या चीन समर्थक तो नहीं? कहीं ये नमो विरोधी इस-उस के एजेंट तो नहीं? सच चाहे जो भी हो। पर नमो की आलोचना उनके बोलने-चालने, उठने-बैठने और उनकी सोच-समझ की खिल्ली उड़ाये जाने पर कनुआ की अंध भक्ति बुरी तरह से आहत हो जाती है। और लोगों की यह बात कि वे गलत बयानियाँ कर रहे हैं, झूठे आंकड़ें पेश कर कर के जबरदस्ती अपने आप को समग्र देश का प्रभु मनवाने पर तुले हुए हैं, उनको इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र का ज्ञान बिलकुल नहीं है, कनुआ को इतना चिढ़ा देती है कि वह उत्तेजित हो नमो को प्रभु साबित करने के लिए हरेक के ऊपर लट्ठ बजाने लगता है।
—-न हो ज्ञान. इससे क्या फर्क पड़ता है? कहाँ लिखा है कि आसमानी अवतार का पढ़ा-लिखा होना बहुत ज़रूरी है? नमो को भी किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसरी थोड़े ही करनी है। उनको तो बस राज गद्दी पर बैठ कर राजकाज चलाना और देश की हालत को सुधारना है। और इसके लिए क्या चाहिए? सिर्फ थोड़ी बहुत राजनीतिक धर्म की जानकारी। और बहुत मात्रा में धार्मिक राजनीतिक ज्ञान। बस और कुछ नहीं। और नमो तो इसमें पूरी तरह से पारंगत हैं। नमो राज्य की तरह वे धर्मानुसार पूरे देश में पापियों का संहार करेंगे। और धर्मानुसार ही देश की दशा और दिशा दोनों को बदल कर रख देंगे। नमो प्रभु हैं। और धर्मानुसार प्रभु की आलोचना करना घोर पाप और दंडनीय अपराध है।
 

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अरविन्द कुमार तिवारी, लेखक व्यंग्यकार हैं।

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