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नमो ब्राण्डिंग की धूम, अब की बार सैन्य राष्ट्र की पुलिसिया सरकार

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
नमो ब्राण्डिंग की धूम, अब की बार सैन्य राष्ट्र की पुलिसिया सरकार। संप्रग की सरकार ने दस साल के राजकाज से भारत राष्ट्र का सैन्यीकरण कर दिया है। आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण के लिये इसी सैन्य राष्ट्र के लिये पुलिसिया सरकार के लिये जनादेश निर्माण की कवायद में मार्केटिंग की हर चमकदार कोरियाग्राफी के साथ नमो ब्राण्डिंग की धूम मची है।
इस एम्बुश मार्केटिंग का असर मीडिया और इंरनेट पर सबसे ज्यादा दीख रहा है। नमो सुनामी का असली रसायन यह है।
तेइस करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर को केसरिया बनाने में सबसे ज्यादा जोर है नमो टीम का और बाकी लोग जो इस कवायद में जुटे हैं,एनजीओ विशेषज्ञता और सरकारी साधनों से महाबली कांग्रेस इस प्रतियोगिता में नमो ब्रिगेड से काफी पीछे हैं।
हाल यह है कि नये वोटरों को प्रभावित करने में नमोमंत्र जाप अखंड है। लेकिन बाजार से बाहर जो असली भारत है, उसे सम्बोधित करने में कितनी कामयाबी इस विज्ञापनी अश्वमेध से मिल पायेगी, यह 16 मई से पहले जानने का कोई उपाय नहीं है।
सैन्य राष्ट्र मुकम्मल बना देने के बावजूद सरकार के मानवीय चेहरा दिखाते रहने की कांग्रेसी विकलांगता की काट हिंदू राष्ट्र का नस्ली तिलिस्म है, जहां जायनवादी हिटलरी जनसंहार संस्कृति विचारधारा है, जो मुक्त बाजार और आवारा पूँजी के सबसे ज्यादा माफिक है।
नमो एजेण्डा के तहत हिन्दुत्व के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के तहत जो ध्रुवीकरण की कॉरपोरेट राजनीति है और उसमें भी जो अराजनीति का मसाला तड़का है, वह संघ परिवार के हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना में राजकाज पुलिसिया है और इसकी मुकम्मल तस्वीर गुजरात से छत्तीसगढ़ तक में सलवा जुड़ुम के इतिहास में बाकायदा दर्ज है।
हिन्दू राष्ट्र के मुताबिक देश का मौजूदा संविधान बदला जाना है। कर प्रणाली सिरे से खत्म हो जानी है और करपद्धति के नाम पर जो भगवा अर्थतंत्र है, वह अंबानी से लेकर अडानी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर इंडिया इनकारपोरेशन को निनानब्वे फीसद कर राहत और राजस्व प्रबंधन, वित्तीय प्रणाली और मौद्रिक नीतियों का सारा बोझ बहुसंख्य निनानब्वे फीसद मूक जनता पर लादने का अन्तिम लक्ष्य है।
बिना फासीवाद, बिना नाजीवाद, बिना धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद बिना प्रतिरोध यह लक्ष्य हासिल हो ही नहीं सकता। विनिवेश हो या कालाधन को सफेद बनाने का खेल, श्रम कानून, कानून व्यवस्था व न्याय प्रणाली के साथ आरक्षण खत्म करने की तैयारी हो या वित्तीय, लम्पट पूँजी- आवारा पूँजी को हरसम्भव छूट, नागरिक और मानव अधिकारों के सिरे से सफाये के लिये सैन्य राष्ट्र के जनता के विरुद्ध युद्धघोषणा ही काफी नहीं है।
… होती तो कॉरपोरेट साम्राज्यवाद का पहला विकल्प फिर कांग्रेस ही होती।
पुलिसिया सरकार की मुठभेड़ संस्कृति के बिना देश के चप्पे-चप्पे में गुजरात मॉडल लागू किया ही नहीं जा सकता, इसीलिये कारोबार व उद्योग जगत के नाम पर नस्ली सत्ता बनिया वर्ग की पहली पसंद नमो पार्टी के प्रधानमंत्री नमो हैं। इसलिये देश भर में अब की बार नमो सरकार की ऐसी आक्रामक ब्रांडिंग है।
देश बेचो अभियान के लिये, जल जंगल जमीन से अबाध बेदखली के लिये वंचितों आदिवासियों के दिये गये संवैधानिक रक्षाकवच को किरचों में बिखेर देना अनिवार्य है।अनिवार्य है सलवा जुड़ुम। नागरिक अधिकारों का निषेध अनिवार्य है। सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून अनिवार्य है। विधर्मियों के साथ साथ प्राकृतिक ऐश्वर्य वाले इलाकों में नागिरक मानवाधिकार का निषेध  अनिवार्य है।
गौर करें, संघी नारा है- “बहुत हुआ मानवाधिकार,अबकी बार मोदी सरकार”। इसी तरह संघ की विचारधारा का प्रस्तान बिंदु विधर्मियों के लिये नागरिक अधिकारों का निषेध है।
खास बात तो यह है कि नमो ब्राण्डिंग में नमो सुपर मॉडल है। नमो ईश्वर है। घर घर मोदी है। भाजपा सरकार नहीं, अबकी दफा नमो सरकार है। इन जुमलों में संघ परिवार की भारत के संविधान के साथ-साथ संसदीय प्रणाली, लोक गणराज्य, संघीय ढांचा और लोकतंत्र को एकमुश्त तिलांजलि देने की परिकल्पना बेनकाब है।
मार्केटिंग की खास पद्धति के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तरह एकमेव व्यक्ति केंद्रित चुनाव प्रचार अभियान है, जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अभूतपूर्व है। यह सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली को स्थापित करने की शुरुआत है, लेकिन अमेरिका के विपरीत संसद के प्रति और जनता के प्रति पुलिसिया सरकार का उत्तरदायित्व सुनिश्चित किये बिना।

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