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नरसंहार का सौंदर्यबोध-काली जनता को कालों के वध से क्या ऐतराज भला?

नरसंहार का सौंदर्यबोध
गोरा गोरा सपना संजोये काली काली जनता को कालों के वध से क्या ऐतराज भला?
अशुभ काला नहीं, कालों पर गोरों का आधिपात्य है
ब्रांड को बचाओ, ब्रांड में फंसी है पूंजी और पूंजी ही सत्ता की जान

रोज़ी-रोटी हक़ की बातें जो भी मुँह पर लाएगा
कोई भी हो, निश्चय ही वह, कम्युनिस्ट कहलाएगा।
-नागार्जुन

हिंदू साम्राज्यवाद के लिए जैसे कालारंग अशुभ है वैसे ही कालों की दुनिया के खिलाफ रंगभेदी उसका अश्वमेध है।
कालों के सफाये के लिए जल जंगल जमीन नागरिकता आजीविका प्रकृति और पर्यावरण, मौसम और जलवायु, उत्पादन और उत्पादक शक्तियों के विरद्ध धर्मोन्मादी रंगभेद की सत्ता अपराजेय है और उनका सौंदर्यबोध हमारी संस्कृति है और तिलिस्म ऐसा घनघोर कि लोक को तिलांजलि देकर परलोक साधने के लिए हम नर्क के सारे दरवाजे खोलकर मेनकाओं, रंभाओं और उर्वशियों की अप्सरा दुनिया में तब्दील करना चाहते हैं मर्दवादी धर्म की देवदासियों को।
बाजार के उत्पाद ही उत्पादन है एकमात्र। उपभोक्ता सामग्री और माडल ही सबसे बड़े आइकन हैं जो सामाजिक प्रतिबद्धता की बातें करते हुए जमीन आसमान एक कर दें और सहस्राब्दी का स्टार बनकर दो मिनट में आपके देहमन को जहरीला बनाने का नूडल बेचें सरेबाजार या सत्यमेव जयते का उद्घोष करते हुए शीतल पेय के बहाने कीटनाशक पिलाते रहें, हम सारे लोग उनके वैसे ही फैन हैं, जैसे हिंदू साम्राज्यवाद की पैदल बजरंगी सेना जो अच्छे दिन लाने के लिए फिर राम की सौगंध खा रहे हैं और उनके तमामो महामहिम बिलियन ट्रिलियन डालरों में देश बेच रहे हैं और दावा कर रहे हैं विशुद्ध वैदिकी राजकाज का, जिसमें घोटाला न हो।
कालाेधन को छूट हो और कालाधन की वापसी का दावा भी हो, अंबानी हो, अडानी हो और गुजराती पीपीपी कंपनियां हों तो विकास ही विकास।
विनेवेश से विकास।
निजीकरण से विकास।
विनियमन से विकास।
विनियंत्रण से विकास।
अबाध पूंजी विकास।
टैक्स होली डे विकास।
खुल्ला बाजार विकास।
सुगंधित कंडोम विकास।
मैनफोर्स विकास।
बलात्कार संस्कृति विकास।
स्मार्टसिटी सेज विकास।
रेडियोएक्टिव विकास।
भूकंप विकास।
एफडीआई विकास।
एनआरआई विकास।
विकास भोपाल गैस त्रासदी।
विकास परमाणु समझौता।
विकास सिखों का संहार।
विकास खैरांजलि से लेकर नागौर तक।
विकास भट्टा परसौल के सीने पर एक्सप्रेस वे पर उतरता युद्धक विमान।
विकास सलावा जुड़ुम के बहाने कालों के सफाये का रंगभेद।
विकास गोरा बनाने के कास्मेटिक का।
विकास गली-गली फैसते आइकन सौंदर्य बाजार का।
विकास खुदरा कारोबार समेटे शापिंग माल का।
विकास खेतों खलिहानों को खाते स्वर्णिम राजमार्ग का जहां जनता के दमन का सबसे चाकचौबंद इंतजाम है।
विकास एक-एक इंच कन्याकुमारी से लेकर कैलाश शिखर के देवादिदेव की देवभूमि के एक-एक इंच पर काबिज प्रोमोटर माफिया सिंडिकेट का।
विकास धर्मस्थलों पर हानीमून रिसार्ट का।
विकास मानव तस्करी और मांस के दरिया का।
विकास अबाध बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी का।
विकास हत्यारों और बलात्कारियों का।
विकास गुजरात माडल के नरसंहार का।
विकास नरसंहार प्रवचन का।
विकास तंत्र मंत्र यंत्र ताबीज ज्योतिष का।
विकास बारबरी विध्वंस का।
विकास हाशिमपुरा और मलियाना का और दलितों पर निरंतर उत्पीड़न का विकास जबकि दलितों के सारे राम हनुमान।
हर रोज निर्वस्त्र द्रोपदी और हर रोज महाभारत और हर रोज कुरुवंश का ध्वंस और फिर यदुवंश का भी ध्वंस।
कल्कि अवतार की ब्रांडिंग करे अडानी तो लौहपुरुष अडवाणी हाशिये पर, ऐसा हुआ विकास कि राजधानी कहने को नई दिल्ली है और राजकाज संघ मुख्यालय से।
न्यायपलिका का अंकुश भी हिंदुत्व का एजेंडा।
पांच मिनट में जेल और बेल का फर्क समझ लीजिये जनाब कि ब्रांडिंग ही असल है अच्छे दिनों की मनायाब रेसिपी है यह कि ब्रांड बचाओ और फिर कहर बरपाओ।
गोरा गोरा सपना संजोये काली काली जनता को कालों के वध से क्या ऐतराज भला?
शत प्रतिशत हिंदुत्व के गोरेपन का यह कारोबार ब्रांडिग पर निर्भर है और बाजार की सारी ताकतें ब्रांडिंग में लगी हैं। जिन्हें दमभर घोटाला करने का मौका मिल रहा है, जो दुनियाभर में हिंदुत्व राजकाज के प्रायोजक संयोजक पुरोहित वगैरह वगैरह हैं, वे तमाम लोग वधस्थल की रस्म अदायगी का आंखों देखा हाल बताते हुए ले चौका, ले छक्का के चियारिन अंदाज में बल्ले बल्ले हैं कि लोग मारे जा रहे हैं और मारे जाने के लिए मुंडी चियारे कतारबद्ध है, कारपोरेट केसरिया राज के अच्छे दिन हैं कि काले बहुजनों ने आत्मसमर्पण कर दिया है और गोरा सवर्ण सत्तावर्ग में शामिल होने के लिए रंगभेदी मनुसमृति की वैदिकी हिंसा बिना प्रतिरोध कबूल कर ली है।
ब्रांडिग का कमाल है कि आप हत्याएं करके, नरसंहार करके और मनुष्यता के खिलाफ हरसंभव अपराध करके विकास की अनिवार्य शर्त और नरसंहार संस्कृति को ही विकास का माडल बनाकर मनुष्यता और प्रकृति के साथ निरंतर बलात्कार के बावजूद विशुद्ध यज्ञाधिपति हैं और सारा राजसूय आपके लिए। समय नहीं लिख रहा आपका अपराध और आपके तानाशाह राष्ट्रद्रोह के खिलाफ कहीं कोई आवाज नहीं है और आपमें समाहित है समूचा लोकतंत्र, कार्यपालिका, विधायिका और न्यापालिका के साथ साथ चौथा स्तंभ का दावा करने वाला मीडिया भी।
सोलह मई के बाद और उससे पहले हिंदुत्व की ब्रांडिंग की विकास दर आसमान चूमने लगी हैं और इसके मुकाबले मंहगाई, मुद्रास्फीति, उत्पादन, बजटघाटा, गरीबी, बेरोजगारी सब कुछ शून्य है।
अश्वेतों के खिलाफ श्वेत वर्चस्व की ब्रांडिग हमारा सौंदर्यबोध
यही ब्रांडिंग नरसंहार की पकती हुई जमीन
अशुभ काला नहीं, कालों पर गोरों का आधिपात्य है
ब्रांड को बचाओ, ब्रांड में फंसी है पूंजी
और पूंजी ही सत्ता की जान
काला झंडा और काला टीका, काली पट्टी को मानदंड मानें तो काला अशुभ है जबकि अश्वेतों की दुनिया में काला से ज्यादी शुभ कोई चीज नहीं है। जमीन भी वही सबसे उपजाऊ जो काली होती है।
कंगना रनावत गजब की अभिनेत्री हैं। मैं प्रियंका चोपड़ा और इस हिमाचली लड़की के लिए दुःखी हूं कि इन्हें स्मिता और शबाना की तरह वैसे निर्देशक नहीं मिले जो उन्हें निखार दें।
कंगना ने फिल्म गैंगस्टार और फैशन में ध्यान खींचा तो क्वीन के लिए वह राष्ट्र की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री हैं। अभी-अभी तनु के दूसरे अवतार में वह लाजबाव है।
बालीवुड ने तो शुरु से ही अभिनेत्रियां एक से बढ़कर एक दी हैं लेकिन कंगना की खास चर्चा इसलिए कि गोरा बनाने के बाजार के खिलाफ उसने दो करोड़ का विज्ञापन ठुकरा दिया। वह परदे से बाहर कुछ गोरा बनने की कोशिश करती हुई कभी नजर नहीं आयी।
कंगना की दलील मुझे लाजवाब लगी। उसका कहना है कि चूंकि उसकी बहन गोरी नहीं है तो गोरा बनाने के कारोबार में शामिल होकर वह अपनी बहन का अपमान नहीं कर सकती। फिर उनकी यह दलील कि अपनी बहन के सांवलेपन का अपमान नहीं कर सकती तो इस देश की तमाम सांवली सुंदरियों का अपमान वह कैसे कर सकती है।
पूर्वी बंगाल के शरणार्थी गोरी लड़कियों की बजाय काली और सांवली लड़कियों को ज्यादा सुंदर मानते रहे हैं। हमारी नानी और दादी के किस्सों की तमाम सुंदरियां काली या सांवली हैं। कास्मेटिक कल्चर और सौंदर्यबाजार सजने से पहले गोरा बनाने की यह फर्जी आपाधापी नहीं थी कभी।
गोरा बनाने का यह उद्दोग दरअसल ब्रांडिग है और श्वेत वर्चस्व की दुनिया में दाखिले का पारपत्र है, जिसके लिए दुनियाभर के काले रंगभेद के इस अजब गजब सौंदर्यशास्त्र के तहत काले रंग को ही अशुभ मानने लगे हैं।
हमने गोरों की सवर्ण दुनिया में अबनी माताओं, बहनों और बेटियों के कालेरंग को अशुभ मानना शुरु कर दिया है तो गोरेपन के इस झूठ और फर्जीवाड़े का कारोबार सबसे तेज मुनाफावसूली का सिलसिला है।
आज सुबह आठे बजे से पहले सविता बाबू ने धकियाकर नीद तोड़ दी बोलीं, तुरंत पीसी पर बैठ जाओ कि बिजली दस बजे चली जायेगी और फिर रात को आयेगी।
हफ्ते भर से यही हो रहा है। बिजली का निजीकरण हो गया है। और बिजली वालों की मर्जी जब चाहे बिजली गिराये या फिर न गिराये।
अब कलम से तो लिखते हैं नहीं, कि अंधेरे और आंधी पानी की परवाह न करें और जब चाहे तब लिखे या पढ़ें। बहुत दिन हुए कलम का इस्तेमाल किये। हस्ताक्षर भी इन दिनों डिजिटल है। बिजली न हो तो बिजली का इंतजार। बिजली जैसे महबूबा हो, जो मंदिर जाने के बहाने आती हो और आते न आते कहती हो, अच्छा तो मैं चलती हूं।
इसी वजह से धायं धायं आखर दागने के बाद मुढ़कर पढ़ भी नहीं पाते कि गलतियां सुधार लें। लिखते न लिखते तुरंते पोस्ट।
डिजिटल देश में सबकुछ बायोमैट्रिक है। नतीजा यह गैस सब्सिडी डिजिटल और बैंकिंग भी डिजिटल। मिले न मिले किसी की जवाबदेही नहीं।
गैस की बुकिंग हो रही है। गैस आ नहीं रही है। एजेंसी तो शिकायत करो तो कहेंगे डिजिटल है और गैस आने की सूचना देने के बाद बुकिंग कैंसिल और नये सिरे से बुकिंग कीजिये और फिर इंतजार।
शिकायतें और जनसुनवाई भी डिजिटल। चाहे तो सीधे पीएमओ को शिकायत दर्ज करा दें या चाहें तो सीधे सुप्रीम कोर्ट को संबोधित पीटिशन दाग दें, सुनवाई लेकिन होगी नहीं।
पलाश विश्वास

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