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नवउदारवाद की बेदखली होगी सुनील को सच्ची श्रद्धांजलि

प्रेम सिंह
साथी सुनील नहीं रहे। उन्हें आकस्मिक मस्तिष्काघात हुआ और बेहोश हो गए। चार दिन तक बेहोशी में मौत से जूझते हुए 21 अप्रैल को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उनका निधन हो गया। सुनील पिछले कई साल से समाजवाद के प्रति लोगों की जागरूकता बनाने के लिए पूरे देश की यात्रा पर निकलना चाहते थे। उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई; और महाकाल ने उन्हें अपना सहयात्री बना लिया!
सुनील का अंतिम संस्कार अगले दिन दिल्ली में किया गया। 23 अप्रैल को एम्स में और 24 अप्रैल को गांधी शांति प्रतिष्ठान में दिल्ली में ही शोकसभा का आयोजन हुआ। डॉ. लोहिया, जिनके विचारों का सुनील पर गहरा प्रभाव था, मानते थे कि किसी नेता की मृत्यु विदेश में होने पर वहीं उसकी अंत्येष्टि हो जानी चाहिए। देश के अंदर तो ऐसा होना ही चाहिए। सुनील के परिवारजनों अथवा सहकर्मियों ने आग्रह नहीं किया कि अंत्येष्टि उनके पैतृक स्थान अथवा कर्मस्थान पर हो। यह ठीक ही था- निधन दिल्ली में हुआ है तो अंत्येष्टि भी वहीं हो जाए।
हालांकि मुझे यह विडंबना जरूर लगी कि जिस दिल्ली के बारे में रामधारी सिंह दिनकर जैसे कवि और राममनोहर लोहिया जैसे नेता ने तानाकशी की है; और जिसे सुनील ने करीब तीन दशक पहले जेएनयू में छोटे-से अध्ययन प्रवास के बाद हमेशा के लिए छोड़ दिया था, उसी दिल्ली में उन्होंने अंतिम सांस ली और उनका पार्थिव शरीर भी वहीं पंचमहाभूतों विलीन हुआ। मस्तिष्काघात होने पर सुनील बेहोशी की हालत में मध्यप्रदेश से दिल्ली लाए गए तो मुझे मुक्तिबोध की याद आई। उन्हें भी मस्तिष्काघात के बाद मध्यप्रदेश से एम्स लाया गया था। वे भी होश में नहीं आ पाए थे। उनका भी अंतिम संस्कार दिल्ली में किया गया था। मुक्तिबोध का समय और था। ‘कहां जाऊं/दिल्ली या उज्जैन?’ – मुक्तिबोध के सामने एक उभयतोपाश की स्थिति थी। सुनील का समय पांच दशक बाद का है, जब दिल्ली कारपोरेट के दलालों की भरीपूरी मंडी बन चुकी है;    निर्लज्जता उसका आभूषण है।
मुझे लगता रहा कि सुनील ने अंतिम सांस भले दिल्ली में ली, उनका अंतिम संस्कार केसला तहसील स्थित उनके गांव भुमकापुरा में उनके अपने लोगों के बीच गुलियाबाई और फागराम की मौजूदगी में होना चाहिए था!
बिना परिवार बसाए अथवा परिवार के साथ न्यूनतम सुविधाओं में जीवन गुजारते हुए विचार और संघर्ष का काम करने वाले भारत और दुनिया में काफी लोग रहे हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि वैसा जीवन वे पूंजीवादी व्यवस्था का वास्तविक विरोध करने के लिए चुनते हों। जाने-अनजाने उनका ‘त्याग’ पूंजीवाद को मजबूत बनाने के लिए भी हो सकता है। पूंजीवाद ने अपने समर्थकों के लिए धन-संपत्ति और उपभोक्तावाद का खजाना खोला हुआ है। ऊंची नौकरियां करने वाले हम जैसे लोगों का वेतन-भत्ता भी अब उसी खजाने से आता है। अस्सी के दशक में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर और अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के बीच होने वाली वाशिंगटन सहमति के बाद शुरू हुए वैश्वीकरण के तीसरे दौर में ‘सेवा’ करने वाले किसी भी संगठन अथवा शख्स का परदा उठा कर देख लीजिए, वह पूंजीवाद का सेवक निकलता है। यह तीसरी दुनिया में फैले नवउदारवादी व्यवस्था से अभिन्न एनजीओ का युग है। सुनील इस परिघटना से पूरी तरह वाकिफ व सजग थे। उन्हें एप्रोप्रिएट नहीं किया जा सकता था। समग्रता में तो सवाल ही नहीं, टुकड़ों में भी नहीं। यह उनकी वैचारिक निष्ठा तो थी ही, शायद उनका फकीरी स्वभाव भी इसमें सहायक था। समाजवादी आंदोलन का पूर्णकालिक कार्यकर्ता होने के पहले ही वे ‘जेएनयू के गांधी’ कहलाने लगे थे।
सुनील आदर्शवादी थे, यह कहना पूरी तरह गलत है। अगर नवउदारवाद की जमीन से नीचे उतर कर उसके द्वारा तबाह आबादी की जमीन पर खड़े होकर देखेंगे तो पाएंगे सुनील पक्के यथार्थवादी थे। यह कहना भी गलत है कि वे राजनीति और आदर्शवाद को एक साथ संभव मानते थे और उस जद्दोजहद में लगे थे। राजनीति और आदर्श(वाद) दो अलग कोटियां नहीं हैं। समाजवादी आदर्श से अपने स्खलन को छिपाने की कोशिश में इस तरह की निर्धारणाएं की जाती हैं।
बिना आदर्श के जीवन का कोई भी उद्यम संभव नहीं होता। भारत और दुनिया की अधिकांश राजनीति का ‘आदर्श’ नवउदारवाद है। तभी वह पूरी दुनिया में फलफूल रहा है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीति का आदर्श आजादी था। उस आदर्श के लिए लोग कष्ट उठाते थे और प्राण तक दे देते थे। आजादी के बाद की राजनीति का आदर्श समाजवाद था, जिसकी दिशा में कुछ प्रावधान संविधान में किए गए थे। सुनील समाजवादी आदर्श की राजनीति के पथिक थे। उसमें उन्हें सफलता नहीं मिल पाई तो इसके कई बाहरी और अंदरूनी कारण हो सकते हैं।
मैंने 15 साल समाजवादी जन परिषद (सजप) में काम किया। 2009 में मैंने सजप छोड़ी और मई 2011 में सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना तक सहमना सहयोगी के रूप में उसका काम करता रहा। सुनील जी से मेरा वैचारिक मतभेद कभी नहीं हुआ। विश्व समाज मंच (डब्ल्यूएसएफ) की हालांकि सुनील ने मुखर आलोचना नहीं की, लेकिन मेरी आलोचना से वे पूरी तरह सहमत थे। एनएपीएम के राजनीति विरोधी रुख से हम दोनों की असहमति थी। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन और भ्रष्टाचार के विरोध पर हम एकमत थे।
चंद्रशेखर की मृत्यु पर मैंने ‘मेनस्ट्रीम’ में जो श्रद्धांजलि लिखी थी, उस पर आपत्ति करते हुए सुनील जी ने मुझे एक खत लिखा था। वह टिप्पणी उन्होंने बाकी साथियों को भी भेजी थी। कुमकुम जी ने मुझसे कहा कि मुझे जवाब देना चाहिए। क्योंकि मेरे अंग्रेजी लेखन को वही अंतिम रूप देती हैं और देख लेती हैं कि किसी लेख अथवा प्रस्ताव आदि में विचारधारात्मक च्युती तो नहीं हुई है। मुझे तो था ही, उन्हें भी पूरा विश्वास था कि उस श्रद्धांजलि में चंद्रशेखर जी के ‘समाजवाद’ की प्रशंसा नहीं थी। बल्कि वैश्वीकरण विरोधी चंद्रशेखर को वह श्रद्धांजलि दी गई थी। मैंने कुमकुम जी से कहा कि सुनील जी ने टिप्पणी की है तो वे दोबारा कुछ कहेंगे। जल्दी ही उनका खत आया कि उनके दिमाग में उस समय कई बातें घुमड़ रही थीं और उन्होंने जल्दबाजी में वह खत लिख दिया था। दोबारा पढ़ने पर उन्होंने पाया कि चंद्रशेखर जी को दी गई श्रद्धांजलि में जो कहा गया है, उससे वे सहमत हैं।
अलबत्ता इंडिया अंग्रेस्ट करप्शन (आईएसी) और अन्ना हजारे व रामदेव समेत भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बारे में हम दोनों में मतभेद था। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू होने के कुछ महीने पहले इस बारे में मेरी उनसे दिल्ली में कंझावला शिविर में भाग लेने जाते वक्त चर्चा भी हुई थी। मैंने उनसे बहुत साफ तौर पर कहा था कि आपका और सजप का इस झमेले में पड़ना उचित नहीं होगा। उन्होंने मेरी बातें ध्यान से सुनी थीं। आगे जो हुआ वह सब जानते हैं।
पिछले करीब दो सालों से वे केसला-इटारसी से ‘सामयिक वार्ता’ का खुद संपादन कर रहे थे। दिल्ली में हम लोग जो कतिपय स्मृति व्याख्यान, वैचारिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक संगोष्ठियां/कार्यशालाएं/स्टडी सर्किल आदि आयोजित करते हैं, सुनील जी हमेशा सकारात्मक रुख रखते हुए ‘सामयिक वार्ता’ के लिए उनकी रपट भेजने का आग्रह करते थे। वार्ता नियमित और अपनी धार के साथ निकलती रहे, यह किशन जी की भी इच्छा थी। सुनील जी ने तो उसका पूरा जिम्मा ही अपने ऊपर ले लिया था। सजप समेत सभी साथियों को न केवल सुनील जी की स्मृति में एक अच्छा अंक निकालना चाहिए, वार्ता का नियमित प्रकाशन भी सुनिश्चित करना चाहिए।
सुनील का अधिकांश लेखन वार्ता की मार्फत हिंदी में हुआ है। उन्होंने उस अंग्रेजी का मुकाबला किया है जो कारपोरेट पूंजीवाद के शीर्ष प्रतिष्ठानों से निकल कर आती है और देश के संसाधनों सहित स्वावलंबन, स्वतंत्रता व मौलिकता की समस्त संभावनाओं को खुले आम लूट कर ले जाती है। नब्बे के दशक के शुरू में आई उनकी पुस्तिका ‘डुंकेल प्रस्तावों को कैसे समझें’ (1991) से लेकर हाल में आई ‘भ्रष्टाचार को कैसे समझें’ (2013) पुस्तिका तक उनका समस्त लेखन इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मैंने कुछ साल पहले हिंदी आकदमी, दिल्ली, की एक संगोष्ठी में सुनील, सच्चिदानंद सिन्हा और किशन पटनायक की गद्यभाषा पर एक वक्तव्य दिया था। मेरे कुछ विद्यार्थियों ने वह वक्तव्य एक लेख की शक्ल में लाने का आग्रह मुझसे किया था, जिसे में पूरा नहीं कर पाया।
सुनील अर्थशास्त्र के अध्येता थे और हम उन्हें जमीनी अर्थशास्त्री कहते थे। उन्होंने अर्थशास्त्र जैसे जटिल विषय पर हमेशा हिंदी में लिख कर वैश्वीकरण को चुनौती दी। उनके व्यक्तित्व और विचारों का निचोड़ वैश्वीकरण विरोध था। उसमें कहीं थोड़ी-सी असंगति भी नजर नहीं आती है। शिक्षा के सवाल पर भी उन्होंने काफी काम किया है। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए स्वामी अग्निवेश ने कहा कि श्रद्धांजलि रस्मअदायगी न रह जाए, इसके लिए हमें सुनील के विचारों और कामों को आगे बढ़ाने के लिए ठोस व योजनाबद्ध प्रयास करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि सबसे पहले शिक्षा के सवाल को लेकर चला जा सकता है कि देश में समान स्कूल शिक्षा प्रणाली लागू हो। यह सही सुझाव है। अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच, जिसके सुनील सक्रिय कार्यकर्ता थे, के तत्वावधान में एकजुट होकर राज्य की ओर से सभी को समान, गुणवत्तापूर्ण और मुफ्त शिक्षा दिलाने का संघर्ष आगे बढ़ाया जा सकता है। शिक्षा पर होने वाले नवउदारवादी हमले को अगर हम निरस्त कर दें तो उसे अर्थनीति और राजनीति से बेदखल करने में देर नहीं लगेगी। सुनील जी को सच्ची श्रद्धांजलि वही होगी।

About the author

डॉ. प्रेम सिंह भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फेलो, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के महासचिव हैं।

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