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नहीं दिया ध्यान तो रीढ़ की हड्डी करेगी परेशान

दिल और फेफड़े की तकलीफ (Heart and lung discomfort) पैदा करने वाली पीठ यानी रीढ़ सम्बंधी बीमारी कूबड़ (Spine Disease Hump) प्राचीन काल से ही कौतूहल का विषय रही है। अभी तक लोग इसे लाइलाज समझते रहे हैं जब कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में रीढ़ के विकार (Spinal Disorders in Modern Medical Sciences) अर्थात् कूबड़ को रोग माना जाता है। अध्ययनों के मुताबिक इस समय करीब एक फीसदी आबादी कूबड़ सहित रीढ़ के अन्य विकार से ग्रसित हैं।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार स्पाइन में असामान्य वृद्धि (Abnormal increase in spine) के कारण रीढ़ में विकार पैदा हो जाता है। जिसकी अनदेखी से या तो कूबड़ हो सकता है या रीढ़ में अन्य तरह की विकृति हो सकती है। जाने-अनजाने में गलत तरीके से उठने, बैठने, सोने, पढ़ने आदि से व्यक्ति के सेहत पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। इसकी वजह से रीढ़ की हड्डी में टेढ़ापन (Spinal curvature) और कम व पीठ में असहनीय दर्द की शिकायत होती है। हालांकि इसका कारण आनुवांशिक और गम्भीर संक्रमण भी होता है, लेकिन मुख्य वजह बचपन से जवानी तक की दिनचर्या से जुड़ा है। यदि शुरू से ही इस ओर ध्यान दिया जाये, तो रीढ़ की हड्डी की विकृति से बचा जा सकता है।

सही ढंग से नहीं बैठना, बिस्तर पर लेटकर पढऩा या टीवी देखना, गलत तरीके से बाइक चलाना आदि ऐसी क्रियाएं हैं, जिन्हें जाने-अनजाने सभी लोग अंजाम देते हैं।

मुंबई स्थित पी डी हिंदुजा हास्पिटल के वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. संजय अग्रवाला (Dr. Sanjay Agrawala, Senior Orthopedic Surgeon, PD Hinduja Hospital, Mumbai) के अनुसार बचपन से ही यदि रीढ़ की हड्डी पर दबाव बनाने वाली कार्य किये जायें, तो बड़े होते-होते उसमें विकृति आने की आंशका बढ़ जाती है। ऐसे में लोगों को अपनी दिनचर्या में रीढ़ की हड्डी का विशेष ध्यान रखते हुये कार्यों को अंजाम देना चाहिए।

Spine problems can begin in two ways

शरीर को आकार और मजबूती प्रदान करने वाला रीढ़ यानी स्पाइन दरअसल लाठी की तरह सख्त और सीधा न होकर लचीला होता है। ये खंड-खंड में बँटे होते हैं और एक-दूसरे से शॉक अब्जार्बर द्वारा जुड़े होते हैं। प्रत्येक खंड को कशेरूकी दंड या मेरूदंड कहते हैं। इसके कारण ही रीढ़ में लचीलापन होता है। रीढ़ में समस्या दो तरह से शुरू हो सकती है। एक तो यदि किसी कारणवश डिस्क की स्थिति बिगड़ जाये। दूसरे मेरूदंड में असामान्य वृद्धि होने लगे।

कूबड़ सहित रीढ़ के अन्य विकार का कारण मेरूदंड में असामान्य वृद्धि होना है। सामान्यत: बचपन से ही उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरूदंड में वृद्धि बराबर अनुपात में होती है। जिससे शरीर में संतुलन कायम रहता है लेकिन विपरीत परिस्थिति में किसी कारणवश मेरूदंड में असामान्य वृद्धि और दूसरे हिस्से के मेरूदंड में कम वृद्धि हो। इस अनियमित वृद्धि के कारण कूबड़ सहित रीढ़ में अन्य विकार पैदा हो जाते हैं। जिससे शारीरिक संतुलन बिगड़ जाता  है।

The hump is called scoliosis in English

कूबड़ को अंग्रेजी में स्कोलियोसिस कहते हैं, मेरूवक्रता यानी मेरूदंड में विकृति का पता यदि शुरू से चल जाये तो इलाज काफी सरल हो जाता है। मैग्लेटिक रेजोनेंस इंमेजिग या एमआरआई रीढ़ के विकारों का पता लगाने के लिये सबसे कारण जाँच तकनीक है। कई एमआरआई में मेरूवक्रता की स्थिति और उसके कारण नसों पर पडऩे वाले दबावों को आवर्धित रूप से देखना सम्भव हो जाता है। इससे चिकित्सा में सुविधा होती है।

New treatment for scoliosis (spinal cord)

मेरूवक्रता के इलाज में पहले परम्परागत शल्य क्रिया का इस्तेमाल होता था। इसमें 3 से 5 घंटे का समय व 4 से 5 बोतल खून लगता था। साथ ही अल्परक्त दाब पर बेहोश रहना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। यह काम माइक्रो सर्जरी से सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इसमें बहुत ही छोटा चीरा लगाना पड़ता है। कम समय लगता है।

डॉ. संजय अग्रवाला का कहना है कि रीढ़ की हड्डी के टेढ़ापन को विशेषज्ञों ने कई श्रेणियों में बाँटा है। इसके टेढ़े होने के अलग-अलग कारण और प्रभाव हैं। यदि इन पर गौर किया जाये, तो समय रहते इसे रोका जा सकता है या फिर इनका उचित इलाज कराया जा सकता है।

जिस व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी सामने से सीधी और किनारे से झुकी हुयी हो, तो समझना चाहिए कि वह स्कोलियोसिस का शिकार है। ऐसी विकृति का शिकार अधिकांशत: महिलाएं होती हैं और यह आनुवंशिक होता है। यह देखने में बुरा तो लगता ही है, इसके हृदय व फेफड़े पर असर पड़ऩे की आंशका रहती है।

इसमें गर्दन व कमर से आगे की ओर झुकाव देखने में आता है। यदि कमर में पीछे की ओर झुकाव बढ़ जाये, तो उसे आम भाषा में कूबड़ निकलना कहते हैं। कुछ बच्चों में पैदा होने के समय से ही रीढ़ की हड्डी टेढ़ी होती है। बड़ा होने के साथ उसमें टेढ़ापन बढ़ता चला जाता है। इसे कंजैनिटल स्कोलियोसिस या काईफोसिस कहते हैं। इसकी वजह बचपन से ही गलत तरीके से बैठने या सोने की आदत है। इसके अलावा, बोन टीबी, नसों व माँसपेशियों की बीमारियाँ भी जिम्मेदार हैं। इस प्रकार के टेढ़ेपन से नसों पर दबाव पड़ता है, जो पैरों के कमजोर होने का कारण हो सकता है। इससे लकवा होने की आशंका बनी रहती है।

रीढ़ की 33 हड्डियां आपस में जोड़ बनाती हैं। यदि जोड़ कमजोर पड़ जाये, तो हड्डी आगे की ओर एक-दूसरे पर सरक जाती है, जिससे एक तरह का टेढ़ापन हो जाता है। इससे भी लकवा होने की आंशका रहती है।

कुछ लोगों में रीढ़ की हड्डी में टेढ़ेपन के कारण (Causes of spinal curvature) का पता नहीं चल पाता है। इसे इडियापैथिक का नाम दिया गया है। यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में इस बीमारी के होने की आंशका आठ गुना अधिक होती है।

हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय अग्रवाला के अनुसार, रीढ़ की हड्डी के टेढ़ेपन का इलाज इस पर निर्भर करता है कि उसमें विकृति का अनुपात कितना है। रीढ़ की हड्डी में कम टेढ़ापन है, तो विशेष प्रकार की बेल्ट और व्यायाम के जरिए इलाज किया जाता हैं। यदि टेढ़ापन अधिक है, तो ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है। इसके लिये समय-समय पर हड्डी रोग विशेषज्ञ से सलाह (Orthopedic Advice) लेने की जरूरत है।

बैठने के लिये सही कुर्सी का चुनाव करें, झुक कर नहीं बैठे, बिस्तर पर लेट कर पढ़ने या टीवी देखने की आदत बदलें, सोने के लिये धँसे हुये गद्दे का उपयोग न करें। पतले तकिये का उपयोग करें और मोटर साइकिल चलाते वक्त रीढ़ की हड्डी सीधी रखें आदि।

उमेश कुमार सिंह

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