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नाथूराम गोडसे: ‘हिन्दू मिलीशिया’ में प्रशिक्षित भारत का प्रथम आतंकवादी

पूरी तरह से राजनीतिक हत्या थी गाँधी की हत्या

जिस हत्यारे ने रघुपति राघव राजा राम, जैसी प्रार्थना के प्रवर्तक और अहिंसा के पुजारी लोकप्रिय महात्मा गांधी की हत्या की और जिसने ह्त्या के बाद न्यायालय को दिए बयान में कहा कि “मुझे विशवास है यदि मनुष्यों द्वारा स्थापित न्यायालय से ऊपर कोई और न्यायालय होगा तो उसमें मेरे कार्य को अपराध नहीं समझा जाएगा।” वह शख्स नाथूराम गोडसे था। जो सही मायनों में न तो राम जानता था, न रामायण। न हिन्द, न हिन्दू। अगर उसने धर्मग्रन्थ पढ़े भी हैं तो सही मायनों में वह राजनीतिक हत्याओं को धार्मिक रूप से सही ठहराने वाले अंशों से प्रेरित अवश्य हुआ होगा। आजादी तो जैसे उसके लिए कोई मुद्दा थी ही नहीं। हाँ, जिसे वह देशभक्ति कहता था, गहराई से देखने पर मालूम होगा कि उसके विचारों में न तो कहीं कोई देश था, न ही उसके लिए किसी तरह की भक्ति। अंग्रेजों से विरोध का विचार न राष्ट्रवाद के मामले में था न देशभक्ति।असल मुद्दा था औपनिवेशिक जालिमों द्वारा जनता का जुल्म और शोषण से मुक्ति।

तो क्या रामचंद्र उर्फ़ नाथूराम गोडसे एक हिंसक राष्ट्रवादी सोच और साम्प्रदायिक ताकतों की देन था। जिसके पीछे अराजक और खूनी राजनीति काम कर रही थी। अगर देशभक्त का मतलब किसी जननायक की ह्त्या है तो बेशक वह देशभक्त था। वह गांधी की अहिंसा को नपुंसकत्व मानता था। जबकि गांधी की नजर में अहिंसा वीरों का हथियार है। नपुंसकत्व जैसे विचार मात्र और एकमात्र उसी के दिमाग की पैदाइश थे इस बात से हरगिज़ सहमत नहीं हुआ जा सकता। तो फिर इस तरह के विचार देने वाली संस्था क्या उस वक्त मौजूद थी? थी तो कौन थी। और उसका मकसद क्या था? क्या वह राजनीतिक संस्था थी या सांस्कृतिक? कहीं वह राष्ट्रवाद और हिन्दुओं के नाम पर आतंक को बढ़ावा देने वाली संस्था तो नहीं थी। क्योंकि गोडसे जब तक ‘अखिल भारतीय नेशनल कांग्रेस’ में रहा, तब तक ह्त्या का विचार मन में कहीं रहा हो ऐसा नहीं लगता। फिर ऐसा क्या हुआ कि उसने यह पार्टी छोडी और साम्प्रदायिक विचारों व अराजक शक्तियों के साथ मिलकर हत्या जैसे अपराध की दिशा में आगे बढ़ा। यह मानना कतई सहज नहीं कि वो देशहित के लिए चिंतित था। चिन्तक होने का अर्थ हिन्दू होना तो कतई नहीं। हाँ धार्मिक रूप से फंडामेंटलिस्ट होने से यह संभावना अवश्य बढ़ जाती है। यह अराजकता की ओर एक बढ़ा हुआ कदम माना जा सकता है। या फिर यह सही है कि इस तरह के अलगाववादी विचार अंग्रेज़ी हुकूमत की देन थी।

किसी भी अराजक समय में कोई व्यक्ति कैसा होगा यह उसके परिवार, समाज और परिस्थितियों से बहुत हद तक समझ सकते है। गोडसे के पारिवारिक हालत देखें  यहाँ इसके सूत्र मिलते हैं। गोडसे की ब्राह्मण परिवार में पैदाइश हुई और बचपन से ही धार्मिक कार्यों में उसकी गहरी रूचि थी। धर्म के प्रति यह दिलचस्पी किसी भी समुदाय, वर्ग विशेष की सामान्य प्रवृति या संस्कार हो सकते है इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन संकटपूर्ण समय में जब आजादी के लिए जंग चल रही हो, आन्दोलन हो रहे हों। इन आंदोलनों का नेतृत्व गांधी जैसे संकल्परत व्यक्ति के हाथ में हो और वे अहिंसात्मक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए किसी सम्भानाशील हल पाने की कोशिशों में लगे हो। हर तरह से परिस्थितियाँ अंग्रेज़ी हुकूमत की गुलाम हों जिससे पूरा हिन्दुस्तान बुरी तरह परेशान था। ऐसे में गोडसे का होना कहीं कोई संदेह पैदा करता है सवाल था कैसे?

दरअसल रामचंद्र से नाथूराम बनने तक वो सेक्युलर समझी और कही जाने वाली ताकतों के साथ था। गोडसे बनने की नींव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने के साथ ही रख दी गई थी। यह एक मकसद के आरम्भ होने का समय था। संघ अपने शुरूआती दौर में ‘हिन्दू युवा क्लब’ के नाम से खोला गया। बाद में इस क्लब को मिलीशिया की शक्ल दी गयी और इसमें सैन्य प्रशिक्षण के लिए स्वयंसेवकों की भर्ती की जाने लगी। प्रशिक्षण के लिए अवकाश प्राप्त सैनिक अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई। तब कहीं जाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बना। इसमें शाखाएं लगाकर देश भर  से कट्टर हिन्दू सोच के समर्थकों को लाया जाने लगा। इन शाखाओं में व्यायाम, शारीरिक श्रम, हिंदू राष्ट्रवाद की शिक्षा के साथ- साथ वरिष्ठ स्वंयसेवकों को सैनिक शिक्षा भी दी जानी तय हुई। गोडसे भी इसी संस्था से वैचारिक और सैन्य प्रशिक्षण ले चुका था। बाद में वह संघ की शाखा ‘अखिल भारतीय हिन्दू महासभा’ में चला गया या सरसंघ चालक द्वारा बतौर कार्यकर्ता भेजा गया। अब उसके दिमाग में एक मकसद था। एक सोच पूरी तरह जड़ जमा चुकी थी। मकसद था हिन्दू नेतृत्व को सही अंजाम तक ले जाना और हिन्दू सैन्य प्रशिक्षण का फलीभूत होना। नाथूराम से गोडसे असल में वह तब बना जब इसी व्यवस्था ने उसे राजनीति में उतरने का पूरा मौका दिया। उसने गांधी के कार्यक्रमों में शामिल होकर शुरू में हर तरह से उनकी सराहना की। इस तरह वह गांधी के भरोसे के करीब पहुंचा। उसने देखा कि गांधी संघ के कार्यक्रमों और उसकी रूपरेखा से विचलित और चिंतित थे। संघ की गतिविधियों को गांधी ने कभी नहीं सराहा। हिंसा की ट्रेनिंग और हथियारों की विचारधारा गांधी को मंजूर नहीं थी।

यह भी सच है कि किसी भी हिन्दू संगठन को शुरू से ही देशद्रोह समझा गया। १९३७ में जब सावरकर नजरबंदी से छूटकर लौटे तो वो हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बनाए गये। इसके बाद जैसे मूर्छित पड़े संघ को पुनः प्राण मिल गये। अहमदाबाद में अधिवेशन का आगाज़ हुआ और इसके बाद तो ‘हिन्दू राष्ट्र दर्शन’ को लाखों भुजाएं समर्पित हो चलीं। इसमें दिल्ली, लाहौर, पेशावर के बाद देशभर में हिन्दू होने का गर्व, श्रेष्ठता, गौरव, संघ से जुड़ने के साथ ही होने लगा। ‘युवा संघ’ और ‘मुक्तेश्वर दल’ जैसे तमाम क्षेत्रीय हिन्दू दलों, वाहिनियों ने इसमें विलय कर संघ को श्रम और सैन्य खुराक देने में एक बड़ी भूमिका निभाई।

गांधी इस तरह की राजनीति से बिलकुल सहमत नही थे। वह राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए अपनी ऊर्जा दे रहे थे। जिसमें संघ की शाखाएं, नीतियाँ, दल कहीं न कहीं बाधक बन रहे थे।। क्योंकि राष्ट्रीय आन्दोलन हिन्दुस्तान की आजादी के लिए था। आखिर आज़ादी के बिना हिन्दू राष्ट्र की घोषणा होने का क्या अर्थ था? और फिर यह घोषणा कहीं -कहीं अंग्रेजी हुकूमत की नीतियों को भी मजबूत कर रही थी कि राष्ट्र हिन्दू और मुसलमान होकर आपस में ही लड़ता रहे। इस तरह अंग्रेजी हुकूमत सुरक्षित रहेगी। उसकी ताकत बनकर ये संगठन अपने को मजबूत दिखाने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसके साथ होंगे। संघ की यह पूरी कवायद गांधी की विचारधारा और राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन को  कमज़ोर कर  रही थी।

अगर इन राजनीतिक हालात में गोडसे के राजनीतिक कार्यकर्ता होने के बारे में बात करें तो कोई भी राजनीतिक कार्यकर्ता विचारधारा में जीने और उसे फलीभूत करने की ट्रेनिंग भी अपनी वैचारिक संस्था से लेता है। कई बार दुर्भावनापूर्ण तरीके से दी जाने वाली राजनीतिक तालीम  राष्ट्रहित या हिन्दू के बहाने या एक ख़ास वर्गहित की हिफाज़त के बहाने हत्या तक करने के लिए भी आग्रही होती हैं। अमूमन हत्या करने की ट्रेनिंग राजनीतिक संस्थाएं खुले तौर पर नहीं देतीं। पर यह एक सच्चाई है कि सत्ता के लिए सियासी दलों में किसी व्यक्ति की हत्या या सामूहिक हत्या के षड्यंत्र रचे जाते रहे हैं। इसके उदाहरण  रामायण, महाभारत, गीता आदि ग्रन्थों में मिलते है। कई बार हत्याएं करवाने के लिए प्रोफेशनल हत्यारों का उपयोग किये जाने के उदाहरण मिलते हैं। यह स्पष्ट है कि कोई राजनीतिक कार्यकर्ता कभी हत्या नहीं करता। गांधी की हत्या जैसे मामले में, यह हत्या पूरी तरह से राजनीतिक हत्या होने के साथ सेक्युलर और सोशलिस्ट विचार की हत्या थी , यह लोकतंत्र में जीने के अधिकार की हत्या थी। इस तरह आरएसएस से शुरू होकर भाजपा तक का लंबा राजनीतिक भ्रमण आज यहाँ तक पहुंचा है।

२०१४ में  गांधी जयंती के अवसर को स्वच्छता अभियान में बदल दिया। गांधी के दर्शन को साफ कर, उनके चश्मे के फ्रेम के दोनों हिस्से को स्वच्छता और अभियान का प्रतीक बनाया गया। गांधी को कुछ इस तरह मिलाया गया कि उत्तर आधुनिक विमर्श पैदा हो सके। और दूसरी तरफ गांधी के हत्यारे की मूर्ति स्थापित करने की घोषणा करके राजनीतिक विमर्श में अजीबोगरीब बेमेल पैदा किया गया। जो पूरी तरह अनैतिक और दुर्भाग्यपूर्ण है। हत्यारे और गांधी को एक साथ एक राजनीतिक मंच पर खड़ा करके एक  नयी बहस आमद की गई है।

गोडसे कैसा कार्यकर्ता था जिसने जन आन्दोलन के महानायक गांधी पर सरेआम गोलियां दागीं और फिर दलील भी दी “गांधी जी ने देश को छलकर इसके टुकड़े किए। क्योंकि ऐसा कोई न्यायालय नहीं था जिसके आधार पर ऐसे अपराधी को दंड दिया जा सकता इसलिए मैंने गांधी को गोली मारी।” यह जो बयान दिया उससे साफ़ जाहिर है कि वह इस हत्या को न्यायिक और तर्कसंगत मानता था। मानो यह हत्या देश के हक़ में हुई थी।

अगर गोडसे का पूरा बयान पढ़ें तो कई सवाल उठना स्वाभाविक हैं। गाँधी की हत्या को उसने वध कहा और अपनी विचारधारा के मुताबिक़ खुद को बाकायदा जस्टीफाई किया। गांधी की हत्या की योजना जब बनी, तब उसे आत्मबल से सही साबित करते हुए गोडसे का तर्क था “मैं यह भी जानता था कि गांधी जी सदा के लिए विदा हो जायेंगे तो देश में शस्त्र प्रयोग और प्रतिकारात्मक कार्रवाई को स्थान मिलेगा,  देश शक्तिशाली होगा। मैं अवश्य मारूंगा किन्तु देश अत्याचारों से मुक्त होगा। सब मुझे मूर्ख कहेंगे। पर देश ऐसे मार्ग पर चलेगा जो उचित होगा। यही सोचकर मैंने गांधी का अंत करने की ठानी।”

यही नफरत गोडसे जैसे तमाम हिन्दू कार्यकर्ताओं के भीतर आरएसएस ने शुरू से भरी। गोडसे बार-बार देश और जाति की भलाई की बात करता है, हिन्दुओं पर आये घोर संकटों की बात कहता है। और हिन्दुओं के मारे जाने की बात करते हुए खुद को मृतप्राय मान बैठता है। ये किस तरह के मनोविकृत और दूषित विचार थे? यह कैसी जहरीली विचारधारा उसके दिमाग में बैठाई गई थी। किसने किया यह दुष्प्रचार? इस योजना के पीछे केवल एक व्यक्ति नहीं हो सकता न ही उसका सबसे प्रबल विचार हीं हो सकता है। क्योंकि इन विचारों को प्रचारित प्रसारित करने वाली संस्था अपने तमाम हिंदूवादी संगठनों के बल पर जोरों से प्रचार प्रसार में लगी हुई थी।

…… जारी
-डॉ. अनिल पुष्कर

About the author

अनिल पुष्कर कवीन्द्र, प्रधान संपादक अरगला (इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका)

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