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निनाद : अगर कहीं मैं तोता होता

कुलदीप कुमार

रघुवीर सहाय की एक कविता है “अगर कहीं मैं तोता होता”, काफी कुछ बंगला के अबोल-तबोल वाले अंदाज़ में। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, जो अभी से खुद को देश का प्रधानमंत्री समझने लगे हैं, का सरदार वल्लभभाई पटेल के बारे में बयान सुनकर मुझे बरबस यह कविता याद आ गई। 1951 में लिखी गयी इस बहुत ही छोटी कविता की शुरुआती पंक्तियाँ हैं: “अगर कहीं मैं तोता होता, तोता होता तो क्या होता? तोता होता। होता तो फिर?” और कविता एक बेहद नाटकीय भंगिमा के साथ एकाएक समाप्त हो जाती है। इसकी अंतिम पंक्ति है: “बोल पट्ठे सीता राम”।

नरेंद्र मोदी अपने इतिहास ज्ञान का प्रदर्शन पटना की रैली में और अन्यत्र भी कर चुके हैं। लोगों को इस पर बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि उन्हें यह भी नहीं पता कि तक्षशिला विश्वविद्यालय बिहार में नहीं था और चन्द्रगुप्त मौर्य गुप्त वंश के शासक नहीं थे और न ही सिकंदर गंगा के तट तक पहुँच सका था। लेकिन मुझे कोई खास आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हिंदुत्ववादियों का इतिहास ज्ञान इसी तरह का हुआ करता है। किसी जमाने में संघियों की एक बहुत प्रिय पुस्तक थी “भारतीय इतिहास की दस भयंकर भूलें” और इसके लेखक थे पी एन ओक। इसमें सिद्ध करने की कोशिश की गई थी कि कुतुब मीनार वास्तव में विष्णुस्तंभ है, ताजमहल एक हिन्दू राजा द्वारा निर्मित तेजो महालय है और लाल किला भी एक हिन्दू राजा का महल ही है। उनकी समस्या यह थी कि इतिहासकारों ने उनकी इन गवेषणाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया, कुछ-कुछ उसी तरह जिस तरह हड़प्पा और वैदिक सभ्यताओं को एक सिद्ध करने के अभियान को अभी तक अकादमिक जगत में मान्यता नहीं मिल पाई है। इस अभियान के एक नेता राजाराम को, जो अमेरिका में रहते हैं, अंततः यह मानना पड़ा था कि इस मान्यता को सही सिद्ध करने के लिए उन्होंने एक कंप्यूटर द्वारा एक फोटो के साथ छेड़छाड़ करके उसमें बदलाव किए थे, यानी बौद्धिक धोखाधड़ी का सहारा लिया था।

इतिहास कल्पनाओं पर आधारित नहीं है। उसमें इस बात पर विचार नहीं किया जाता कि यदि ऐसा होता तो क्या होता? लेकिन राजनीति में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। उसमें चुनावी समर जीतने का सपना देखने वालों पर सपनों के आधार पर इतिहास की व्याख्या करने पर प्रतिबंध नहीं है। सो, नरेंद्र मोदी ने एक सपना देख डाला: “अगर जवाहरलाल नेहरू की जगह सरदार वल्लभभाई पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री बनते तो?” ठीक वैसे ही जैसे वे अपने बारे में सपना देखते रहते हैं: “अगर कहीं मैं प्रधानमंत्री होता”। और पूरा देश उनके इस सपने पर सिहरता रहता है, यह सोचते हुये कि “तो क्या होता”?

संघ परिवार और नरेंद्र मोदी जिस तरह सरदार पटेल का नाम लेते हैं, और उन्हें नेहरू के खिलाफ खड़ा करके राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करते हैं, उसे देखकर तरस ही खाया जा सकता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ठीक ही याद दिलाया है कि सरदार पटेल कांग्रेस के नेता थे। इस पर कुछ अखबारों ने अपनी संपादकीय प्रतिक्रिया भी व्यक्त की और कहा कि महात्मा गांधी, सरदार पटेल और उनके जैसे अन्य नेता पूरे देश के हैं, किसी एक पार्टी के नहीं। इसलिए यदि मोदी उनकी विरासत पर अपना हक़ जमाते हैं, तो इसके लिए उनकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए। इस राय में दम तो है, लेकिन बहुत अधिक नहीं।

यह सही है कि गांधी, नेहरू, पटेल और नेताजी जैसे व्यक्ति किसी एक पार्टी के नहीं हैं, लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि उनकी विरासत पर वह पार्टी ही गर्व कर सकती है जो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा ग्रहण करती हो और उनसे प्रभावित हो। उन्हें तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए शतरंज के मोहरों की तरह इस्तेमाल करना किसी भी दृष्टि से जायज नहीं है– न नैतिक दृष्टि से और न ही राजनीतिक दृष्टि से।

अगर इस पूरे प्रकरण पर गौर करें तो पायेंगे कि गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की हिन्दू अस्मिता पर आधारित राजनीति से अलग एक दूसरे तरह की अस्मिता राजनीति भी करते आ रहे हैं और वह है गुजराती अस्मिता की राजनीति। जब भी उन पर कोई राजनीतिक हमला हुआ, जब भी किसी ने गुजरात में हुयी व्यापक मुस्लिम-विरोधी हिंसा की बात की, उन्होंने तुरन्त उसे छह करोड़ गुजरातियों का अपमान बताया। प्रदेश के मुख्यमन्त्री होने के नाते गुजरात को हर क्षेत्र में उभारना उनका फर्ज़ था और है। लेकिन अपने आप को गुजरात का पर्याय बनाकर उसी तरह पेश करना जिस तरह इमरजेंसी के दिनों में देवकान्त बरुआ ने “इन्दिरा इज़ इंडिया एंड इंडिया इज़ इन्दिरा” कहकर इन्दिरा गांधी को पेश किया था, इस फर्ज़ में शामिल नहीं है। और तो और, उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा के समय भी उन्होंने सिर्फ गुजरातियों को बचाने की ही बात की। उन्हें सुनकर एच डी देवगौड़ा की याद आती  है जो प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कई माह तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री की तरह बोलते रहे थे।

यदि सरदार पटेल जैसी राष्ट्रीय विभूतियों को किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं किया जा सकता, तो क्या उन्हें किसी एक राज्य विशेष तक सीमित किया जा सकता है? यह एकदम स्पष्ट है कि मोदी सरदार पटेल के गुजराती होने को राजनीतिक रूप से भुनाने में लगे हैं। गुजरात में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी ऊंची प्रतिमा लगाने की योजना का और क्या लक्ष्य है? कभी उन्हें यह सपना क्यों नहीं आता कि यदि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस देश के प्रथम प्रधानमंत्री बनते तो क्या होता? बहुत से लोग आज भी यह मानते हैं कि वे जवाहरलाल नेहरू से बेहतर प्रधानमंत्री साबित होते। यूं मेरी राय में ऐसी अटकलें लगाना समय की बरबादी है, लेकिन क्योंकि संघ परिवार नेताजी का भी भारी प्रशंसक हुआ करता था, इसलिए मोदी यह सवाल भी उठा ही सकते थे। लेकिन नहीं उठाया, क्योंकि सुभाषचन्द्र बोस गुजराती तो थे नहीं।

यदि नरेंद्र मोदी सरदार पटेल के इतने ही बड़े प्रशंसक हैं, तो उन्हें सार्वजनिक मंच से स्वीकार करना चाहिए कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगाकर सही कदम उठाया था। उन्हें सरदार पटेल द्वारा एक पत्र में व्यक्त इस विचार को भी ठीक ठहराना चाहिए कि भले ही महात्मा गांधी की  हत्या के पीछे संघ की प्रत्यक्ष भूमिका न हो, लेकिन उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सांप्रदायिक जहर फैला कर उनकी हत्या के लिए अनुकूल माहौल अवश्य तैयार किया। सरदार पटेल देश के पहले गृहमंत्री और उप-प्रधानमंत्री थे। आज संघ के समर्थक यह दावा भी कर रहे  हैं कि संघ पर से प्रतिबंध बिला किसी शर्त हटाया गया था, लेकिन ऐतिहासिक साक्ष्य चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि उसके सामने लिखित संविधान के आधार पर लोकतान्त्रिक पद्धति से काम करने और राजनीति से दूर रहने की शर्त रखी गई थी और उसने इसे माना था। इसी कारण वह आज तक अपने को सांस्कृतिक संगठन कहता आ रहा है और एक संगठन के रूप में चुनावी राजनीति से दूर रहता है। लेकिन उसने पहले भारतीय जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया और उसमें अपने स्वयंसेवकों को भेजा। आज भी संघ के महत्वपूर्ण कार्यकर्ता भाजपा में पदाधिकारी हैं। उसके इशारे पर पार्टी के अध्यक्ष बनाये और हटाये जाते हैं। उसी के निर्देश पर लालकृष्ण आडवाणी और कई अन्य शीर्षस्थ नेताओं की मर्जी के खिलाफ नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। लेकिन झूठ यही दुहराया जाता है कि संघ का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।

सरदार पटेल को नेहरू से भिड़ाने के क्रम में मोदी यह भी कह गये (बाद में उनका इंटरव्यू छापने वाले अखबार ने एक लाचार सा खंडन भी छापा) कि नेहरू तो उनकी अन्त्येष्टि तक में नहीं गये। जब झूठ पकड़ा गया तो यह कहा गया कि बात प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के बारे में कही गयी थी। प्रचारित किया जा रहा है कि नेहरू पटेल को अपमानित करते थे, लेकिन अपने गिरेबान में झाँकने की कोई तकलीफ नहीं कर रहा। हकीकत यह है कि जब भी नेहरू देश से बाहर जाते थे तब सरदार पटेल को अपने पद का चार्ज सौंप कर जाते थे और उनकी अनुपस्थिति में वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करते थे। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी? पहले तो उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी को काफी समय तक उप-प्रधानमंत्री बनाया ही नहीं। फिर जब बनाया तो कभी प्रधानमंत्री पद का चार्ज नहीं सौंपा। घुटनों के छह-आठ घंटे तक चले ऑपरेशन के दौरान बेहोश रहे, लेकिन चार्ज नहीं सौंपा। कभी इस पर मोदी कुछ क्यों नहीं बोलते?

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