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नेताजी की मृत्यु विमान हादसे से नहीं हुई तो सच क्या है और सच को छुपाने का मकसद क्या है?

नेताजी की विरासत से हमारी बेदखली फासीवाद की जीत है, यही हमारे सरदर्द का सबब है
आप स्टालिन को अगर फासीवादी और नाजीवादी नहीं मानते, तो नेताजी को गद्दार कैसे कह सकते हैं।
राजनीतिक खेल से हमें मतलब नहीं, नेताजी भारतीय महादेश की सांस्कृति विविधता को लबनाये रखने के हक में थे, खास बात यही है
इसीलिए यह सवाल लाजिमी है कि इस महादेश के नेताजी की मृत्यु विमान हादसे से नहीं हुई तो सच क्या है और सच को छुपाने का मकसद क्या है?
पलाश विश्वास
कामरेडों ने जो ऐतिहासिक गलती दूसरे विश्वयुद्ध के मुद्दे पर की और फतवा दे डाला कि नेताजी गद्दार हैं, उसकी वजह राजनीतिक जो हो, सबसे बड़ी वजह यह है कि इस महादेश की जनता और जमीन से उनका कोई रिश्ता नहीं रहा है।

बाबासाहेब को बहुत तरीके से मालूम था कि भारतीय जनता की गुलामी के लिए कम्युनिज्म से बेहतर कोई दूसरा रास्ता नहीं है और इसी मंजिल को हासिल करने के लिए उनने सबसे पहले ब्रिटिश सरकार के कानून मंत्री बनते ही मेहनतकशों के हक हकूक की गारंटी देने वाले कानून बना दिये।
भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन में अय्यंकाली की ऐतिहासिक भूमिका को कभी न मानने वाले कामरेडों से उम्मीद नहीं है कि वे मानें कि भारत में ट्रेड यूनियन का हक दिलवाने वाले भी बाबासाहोब थे और तमाम ट्रेड यूनियनों पर काबिज होने के बावजूद कामरेड न मेहनतकशों के हक हकूक के लिए खड़े हो सके और न ट्रे़ड यूनियन आंदोलन को बचा सके।
बाबासाबहेब न अस्मिता आंदोलन से राजनीति की शुरुआत नहीं की। उनने वर्कर्स पार्टी बनायी और रिपब्लिकन पार्टी तो बहुत बाद में बनायी।
बाबासाहेब के साथ खड़े नहीं हुए कामरेड और जाति उन्मूलन के एजंडे के तहत जो वर्गीय ध्रूवीकरण की दिशा खोल गये बाबासाहेब,  उसे कतई तरजीह नहीं दी कामरेडों ने वरना आज जांत पांत और धर्म के नाम मुल्क का इसतरह लगातार लगातर बंटवारा न होता और न फासिज्म हमारा मजहब होता और न यह महादेश बाजार होता।
जो बाबासाहोब को न समझे वे नेताजी को कैसे समझते, यह सवाल अब खड़ा है।
बाबासाहेब को कम्युनिज्म से शिकायत न थी और जाति उन्मूलन का उनका एजंडा इस महादेश के लिए कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो से कम नहीं था।
बाबासाहेब लड़ रहे थे बहुजनों की जीवन के हर क्षेत्र में नुमाइंदगी के लिए। बाबासाहेब लड़ रहे थे संसाधनों के समान बंटवारे के लिए।
समता और न्याय के लिए। बाबासाहेब का एजंडा था वर्गीय ध्रुवीकरण का और न लाल और न नील झंडे वालों ने बाबासाहेब के दिलोदिमाग को सही तरीके से समझा।
इसी ढुलमुल रवैये का नतीजा अब कामरेडों को भुगतना ही होगा।
ममता बनर्जी ने नेताजी से संबंधित जो 64 गोपनीय दस्तावेज जारी कर दिये हैं, उनसे बंटवारे के किस्से में और इस देश को बार बार बांटने लूटने बेचने के किस्सों में साजिशों की परतें अभी खुली नहीं है और जाहिर है कि कांग्रेस फिर कटघरे में है और फायदा कुल मिलाकर या दीदी को होना है या फिर मोदी को।
कामरेडों को इस सिलिसिले कुछ भी कहने का मौका नहीं है और दीदी ने एक तीर से दो निशाने जरुर साध लिये हैं लेकिन इससे भारत में फासीवाद के हाथ मजबूद होंगे क्योंकि हम अब भी सच का सामना करने के लिए कहीं से भी तैयार नहीं हैं।
बाकी इन दस्तावेजों से कुछ भी साबित नहीं हुआ है। अगर कुछ साबित हुआ होता तो संघ परिवार की दो-दो सरकारें नेहरु को किनारे करने और कांग्रेस का सफाया करने का मौका गवां नहीं रही होती।
भले ही नेताजी की 1945 में मौत नहीं हुई और भले ही वे 1945 से बाद भी जीवित रहे। अब वक्त इतना बीत गया है कि जिंदा या मर्दा नेताजी इस महादेश में जो हो गया है इस दरम्यान उसे पलट नहीं सकते। हमारे बहस का मुद्दा यह नहीं है और न यह हमारे सरदर्द का सबब है।
मुश्किल यह है कि भारत में फासिज्म की जो सुनामी है, उसमें सेकुलर डेमोक्रोट नेताजी की विरासत समाहित होने जा रही है और उस विरासत पर अंबेडकरवादी अंबेडकर को खो चुके तो खाक कोई दावा पेश करेंगे और बंगाल में तो क्या बाकी देश में भी नेताजी की भारतीय सांस्कृतिक विविधता बनाये रखने की विरासत पर चरचा करने की हालत में भी कहीं नहीं हैं कामरेड।
सच लेकिन यह है और उपलब्ध दस्तावेजों से साफ है कि भारत की आजादी के लिए नेताजी चले तो थे अमेरिकी ब्रिटिश मित्रशक्ति समूह के दुश्मन हिटलर से मुलाकात करने, लेकिन वे किसी भी सूरत में फासिस्ट थे नहीं। उनके लिए भारत के मुसलमान, ईसाई, बौद्ध और सिख जैन पारसी तमाम समुदायों के लोग उतने ही प्यारे थे जितने कि बहसंख्य हिंदू।
फासीवाद और नाजीवाद के तौर तरीके अपनाकर ने जनसंहार की संस्कृति के झंडेवरदार जैसे नहीं हो सकते थे वैसे ही वैचारिक तौर पर उनका फासीवादी नाजीवादी होना असंभव था वे हिन्दी नहीं,  हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे और अखंड भारत के पहले राष्ट्राध्यक्ष थे और गुलाम मातृभूमि को आजाद करने के लिए जो आजाद हिंद फौज उनने बनायी, उसमें इस देश का मुकम्मल भूगोल था। इस कायदे से समझने की जरुरत है क्योंकि फासीवाद के मुकाबले इस वक्त इसी साझे चूल्हे को सुलगाने की सबसे ज्यादा जरूरत है।
थोड़ा ध्यान से देखे तो इतिहास गवाह है कि हिटलर के साथ समझौता तो स्टालिन ने भी किया था वैश्विक पूंजी के खिलाफ मोर्चाबंदी के लिए। फिर आप स्टालिन को अगर फासीवादी और नाजीवादी नहीं मानते, तो नेताजी को गद्दार कैसे कह सकते हैं।
जैसे स्टालिन की हिटलर से पटी नही और हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला भी बोल दिया।
उसी तरह नेताजी और हिटलर की भी बनी नहीं और नेताजी की मुहिम और मिशन को हिटलर ने भी कोई मान्यता नहीं दी सिवाय इसके कि हिटलर ने नेताजी को जर्मनी से सही सलामत एशिया निकलने की इजाजत दी और करीने से देखें तो इसमें भी जर्मनी में उनकी राजनीतिक सहयोगी जो बाद में उनकी पत्नी भी बनी, उन इमिली शेंके का कृतित्व बहुत ज्यादा है और इसे हम भारतीय न कायदे से जानते हैं और न मानते हैं।
दूसरे विश्वयुद्ध के दस्तावेजों को कायदे से देखा जाये तो नेताजी तो हिंदुस्तान की आजादी के लिए लड़ रहे थे और भारतीय सरहद में दाखिले के लिए सबसे पहले उनने महात्मा गांधी को देश का पहला नागरिक मानते हुए उनसे इजाजत भी मांग ली थी, लेकिन किसी भी तरीके से मुल्क के बंटवारे की कीमत पर सत्ता पर काबिज होने की तमन्ना लेकर देश के भीतर जो गद्दार सियासत और मजहब के मार्फत मुल्क का बंटवारा कर रहे थे, उनने न नेताजी  और न आजाद हिंद फौज का कोई समर्थन किया और हमेशा दोनों को बदनाम किया। उस पांत में हमारे कामरेड कैसे शामिल हो गये, अब इसका जबाव देना होगा।
नेताजी हमारे लिए राष्ट्रनेता और आजादी के सिपाही ही न थे। नेताजी की वजह से नैनीताल की तराई में सिख, पंजाबी, बंगाली शरणार्थियों में अजब-गजब का अपनापा रहा है।
बसंतीपुर में उत्तराखंड का आधिकारिक नेताजी जयंती मनायी जाती है और दूर दराज के भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी और नेताजी के साथी और आजाद हिंद फौज के लड़ाके एक साथ जमा होकर मुल्क को फिर अखंड भारत बना देते हैं हर साल।
हमारे घर शहीदे आजम भगतसिंह की मां भी पधार चुकी हैं औ वे मेरे पिता को देखकर कहती थीं कि एकदम बटुकेश्वर दत्त जैसे लगते हो। दूसरे तमाम स्वतंत्रताता सेनानी आते जाते रहे हैं और नेताजी को साठ सत्तर के दशक में जीवित मानने वाले लोग भी नेताजी के लिखे दस्तावेजों और किताबों के साथ, उस महायुद्ध के इतिहास के साथ और नेताजी से संबंधित तमाम कतरनों के साथ बसंतीपुर में हमारी झोपड़ियों में ढहरते रहे हैं और मेरा बचपन उनके सान्निध्य में बीता रहा है।
तराई के तमाम शरणार्थी मानते रहे हैं कि नेताजी जिंदा होते और भारत में होते तो भारत का बंटवारा न होता।
आज जो बातें दस्तावेजों के खुलासे से सामने आ रही हैं, उन्हें हम बचपन से बंटवारे के जख्मों के साथ जी रहे थे। बंटवारे के शिकार तमाम लोग। बसंतीपुर में उस विरासत की नजीर देखना चाहे तो पधारे किसी भी नेताजी जयंती के मौके पर और वहीं खड़े अंदाजा लगाइये कि नेताजी को फासीवाद और नाजीवाद से जोड़कर हमने कितना बड़ा गुनाह कर दिया है कि आज नेताजी की धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक विरासत और उनकी और आजाद हिंद की बेमिसाल देसभक्ति को अंध राष्ट्रवाद में तब्दील होने का मौका हमने कैसे बना दिया है।
यह भी बहस का विषय है कि सिंगापुर और रंगून में आजाद हिंद फौज खड़ी करके नेताजी ने जो तिरंगा पहनाया, उसमें नेताजी ने जापान का कितना इस्तेमाल किया और जापान ने उनका इस्तमेाल करते हुए कैसे अंडमान भी फतह कर लिया।
सच जो भी हो आजाद हिंद के चरित्र और इतिहास की प्रासंगिकता अब सबसे ज्यादा है जब पुराने दस्तावेजों के खुलासे के साथ कांग्रेस भी कटघरे में है और कामरेड भी कटघरे में है।
मुझे कोई शक नहीं है कि नेताजी की विरासत से हमारी बेदखली फासीवाद की जीत है, यही हमारे सरदर्द का सबब है।
मुझे कोई शक नहीं है और राजनीतिक खेल से हमें मतलब भी नहीं,  नहीं है क्योंकि नेताजी भारतीय महादेश की सांस्कृतिक विविधता को बनाये रखने के हक में थे, खास बात यही है।
मुझे कोई शक नहीं है क्योंकि इस देश के बंटवारे के शिकार तमाम घरों का मैं सगा बेटा हूं और जितना मैं हिंदू हूं उससे कम न मुसलमान हूं और न सिख और बौद्ध और न ईसाई। इंसानियत के जख्मों ने मुझे इंसानियत का मजहब जीना सीखा दिया और सही मायने में यही नेताजी की विरासत है जो बेदखल हो गयी है।
इसीलिए यह सवाल लाजिमी है कि इस महादेश के नेताजी की मृत्यु विमान हादसे से नहीं हुई तो सच क्या है और सच को छुपाने का मकसद क्या है।
आज टाइम्स आफ इंडिया में इसी सिलसिले में नेताजी के पोते का इंटरव्यू छापा है जो नेताजी की विरासत समझने में मददगार हैः
http://epaperbeta.timesofindia.com/index.aspx?eid=31812&dt=20150919
 

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