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नेताजी प्रकरण- संघ 60 साल से पं. नेहरू की छवि खराब कर रहा है

नेताजी की बेटी अनीता बोस मानती हैं कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में हो चुकी है
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु को लेकर पिछले 70 साल से तरह-तरह की चर्चाएं देश में होती रही हैं। इस चर्चा को समाप्त न होने देने के पीछे कुछ व्यक्तियों और समूहों के अपने-अपने हित जुड़े रहे हैं।
अभी एक बार फिर चर्चा गरम है और इसे हवा देने में तीन हित समूहों की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। सबसे पहले भाजपा सरकार व संघ परिवार, फिर नेताजी के कुटुंब की तीसरी-चौथी पीढ़ी के कुछ सदस्य और सबसे अंत में इस मुद्दे पर हाल-हाल में सक्रिय हो गई पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी।
नेताजी अगर आज जीवित होते तो उनकी आयु एक सौ अठारह वर्ष होती। इसलिए तर्क दृष्टि यह कहती है कि नेताजी का निधन हो चुका है। उनकी मृत्यु कब, कैसे, किन परिस्थितियों में हुई यह हम शायद कभी नहीं जान पाएंगे। किंतु इस बहस को जीवित रखने से किसका क्या हित साधन हो रहा है, यही सोचने की बात है।
इसके पूर्व नेताजी व उनके द्वारा गठित आजाद हिन्द फौज से जुड़े कुछ तथ्यों को सामने रखने से वस्तुस्थिति समझने में हमें शायद मदद मिल सकेगी।
सर्वप्रथम इस तथ्य को याद रखें कि 18 अगस्त 1945 (नेताजी की घोषित पुण्यतिथि) को भारत में ब्रिटेन का राज था। द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था किन्तु भारत के स्वाधीन होने की उस समय कोई चर्चा नहीं थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू के उस समय प्रधानमंत्री बनने या किसी अन्य रूप में शक्ति सम्पन्न होने का भी सवाल नहीं था।
सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु विमान दुर्घटना में हुई या नहीं हुई इसके बारे में जानकारी ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को ही हो सकती थी जिन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में हिटलर की सहयोगी जापानी सेना को पराजित किया था। यहां सवाल उठता है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक महानायक की मृत्यु के बारे में झूठी खबर फैलाकर ब्रिटेन का क्या भला हो सकता था?
यह तो सबको पता है कि नेताजी हिटलर के पास भारत की आज़ादी के लिए सैन्य सहायता मांगने गए थे और हिटलर ने ही उन्हें जापान भिजवा दिया था। धुरी राष्ट्रों की सहायता से ही नेताजी ने आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था, जिसमें पूर्वी देशों में तैनात ब्रिटिश भारतीय सेना के अनेक सिपाही विद्रोह करके शामिल हो गए थे। आज़ाद हिन्द फौज का सांगठनिक आधार बहुत मजबूत नहीं था। उद्दाम देशप्रेम की भावना ही उनकी मुख्य शक्ति थी। इसीलिए मित्र राष्ट्रों की सेना के सामने आज़ाद हिन्द फौज टिक नहीं पाई। बड़ी संख्या में सैनिक गिरफ्तार हुए और सेना के स्थापित नियमों के अनुसार उनका कोर्ट मार्शल हुआ। यहां ध्यान रहे कि द्वितीय विश्व युद्ध मई 45 में लगभग खत्म हो चुका था, जबकि जापान ने 15 अगस्त 1945 को अंतिम रूप से समर्पण कर दिया था।
यह हमारे इतिहास का एक रोचक और स्मरणीय प्रसंग है कि आज़ाद हिन्द फौज याने आईएनए के तीन प्रमुख सेनानियों के विरुद्ध जब लालकिले में ब्रिटिश सरकार ने कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरु की तो इनकी वकालत करने के लिए बैरिस्टर जवाहर लाल नेहरू ने बरसों बाद एक बार फिर अपना काला गाउन पहना तथा सुविख्यात वकील भूलाभाई देसाई के साथ मिलकर उनकी पैरवी की। इन तीनों के नाम उस समय बच्चे-बच्चे की जुबान पर थे- सहगल, ढिल्लो, शाहनवाज़। इसके आगे की जानकारी और भी गौरतलब है। कर्नल शाहनवाज़ खान कांग्रेस की टिकट पर अमरोहा (उत्तरप्रदेश) से लोकसभा के उम्मीदवार बनाए गए। जीतने के बाद वे नेहरू सरकार में मंत्री भी बने। कर्नल गुरुदयाल सिंह ढिल्लो मध्यप्रदेश में ग्वालियर के पास शिवपुरी में आकर बसे। यहां उनको सरकार द्वारा खेती के लिए जमीन दी गई। वे भी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन हिन्दू महासभा के उम्मीदवार के आगे जीत नहीं सके क्योंकि हिन्दू महासभा प्रत्याशी को ग्वालियर राजदरबार का समर्थन प्राप्त था।
कर्नल प्रेम सहगल कानपुर जाकर बस गए और एक कम्युनिस्ट नेता के रूप में राजनीति में सक्रिय हुए। उनकी पत्नी कैप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल आईएनए की झांसी रानी बिग्रेड की कमांडर थीं। दोनों पति-पत्नी वामपंथी राजनीति में ताउम्र सक्रिय रहे। कैप्टन लक्ष्मी ने अपनी मेडिकल प्रैक्टिस जारी रखी और एक ममतामयी डॉक्टर के रूप में उन्होंने ख्याति प्राप्त की। यह याद कर लेना मुनासिब होगा कि 2002 में  वामदलों ने कैप्टन लक्ष्मी को एपीजे अब्दुल कलाम के खिलाफ राष्ट्रपति चुनाव में खड़ा किया था। डॉ. कलाम सपा द्वारा प्रस्तावित भाजपा के उम्मीदवार थे और कांग्रेस ने भी उन्हें समर्थन देना बेहतर समझा था। इस तरह आज़ाद हिन्द फौज की एक वीर नायिका को अपनी वृद्धावस्था में पराजय का सामना करना पड़ा।

नेताजी द्वारा स्थापित आईएनए के सैनिकों याने नेताजी के अनुयायियों के प्रति कांग्रेस के लंबे शासनकाल में एक सम्मान का एक भाव लगातार विद्यमान था। कैप्टन लक्ष्मी सहगल को तो पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया गया। इसके अलावा आईएनए के तमाम सैनिकों को यद्यपि सेना में तो दुबारा नहीं लिया गया, लेकिन उनके पुनर्वास की वैकल्पिक व्यवस्था अवश्य की गई। रायपुर में ही कैप्टन नत्थासिंह मिन्हास थे। उनके पुत्र अक्षर सिंह मेरे मित्र थे। नेताजी और उनके साथियों के प्रति सरकार व समाज में जो आदर था वह अन्य रूपों में भी व्यक्त हुआ। मसलन, स्कूलों में विद्यार्थियों के जो दल या हाउस बनते थे उनमें नेहरू हाउस होता था तो सुभाष हाउस भी अवश्य होता था। ऐसे और भी बहुत से उदाहरण देखने मिल जाएंगे।
इस पृष्ठभूमि में हम इस प्रश्न की ओर वापिस लौटते हैं कि विवाद को जीवित रखने में किसका हित साधन हो रहा है। अभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नेताजी से संबंधित अड़सठ फाइलें जो राज्य सरकार के पास थीं, वे सार्वजनिक कर दी हैं। उन्हें पुलिस म्यूजियम में जनता के अवलोकनार्थ रख दिया गया है। पिछले लगभग एक माह में कितने ही लोगों ने इन फाइलों को देखा होगा लेकिन उससे कुछ हासिल हुआ प्रतीत नहीं होता। ममता बनर्जी शायद सोचती हैं कि विधानसभा के निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में उन्हें अपनी इस चतुराई से लाभ होगा, लेकिन अगर दस्तावेजों से नए तथ्य उभर कर सामने नहीं आ रहे हैं तो उनको फायदा मिलना संदिग्ध ही है।
नेताजी के कुछ कुटुंबीजन भी फाइलों को उजागर करने के लिए बड़ी दौड़धूप कर रहे हैं। उनकी उम्मीदें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर टिकी हुई हैं। यह मजे की बात है कि नेताजी की कानूनी वारिस व उनकी अपनी बेटी अनीता बोस खुद यह मानती हैं कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में हो चुकी है। सहज बुद्धि कहती है कि दूरदराज के रिश्तेदारों के बजाय सगी बेटी की बात पर विश्वास किया जाए। मज़ेदार बात यह है कि अब यही कुटुंबीजन ममता दी पर शक व्यक्त कर रहे हैं कि उन्होंने सारे दस्तावेज उजागर नहीं किए। याने विवाद चलते रहना चाहिए। इसके पीछे हमें निजी स्वार्थ साधन की भावना ही नज़र आती है। जहां तक भाजपा और संघ की बात है तो उनका मुख्य मकसद एक ही है कि येन-केन-प्रकारेण पंडित जवाहर लाल नेहरू की छवि को धूमिल किया जाए। उनकी इन कोशिशों को हम पिछले साठ साल से देख रहे हैं। इसके बावजूद केंद्र की मोदी सरकार चुनावी घोषणा के विपरीत अब नेताजी से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से इंकार कर रही है। उसने अपना रुख बदला है तो इसके पीछे कोई जबरदस्त कारण ही होगा। जनता को भावनाओं में बहने के बजाय सोचना चाहिए कि यह कारण क्या हो सकता है!
ललित सुरजन
(साभार देशबन्धु)

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