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नेहरू के वारिस और विरासत

राजेंद्र शर्मा
जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री ही नहीं थे, हम आज स्वतंत्र भारत का जो रूप देख रहे हैं, उसके मुख्य गढ़वाइयों में भी थे। सवा सौ वीं जयंती के मौके पर उनकी विरासत की व्यापक रूप से चर्चा हो, यह गौर करने लायक होते हुए भी स्वाभाविक है। लेकिन कम से कम यह किसी भी तरह से स्वाभाविक नहीं है कि इस मौके पर नेहरू की विरासत की मोटे तौर पर तीन अलग-अलग पहचानें मैदान में हैं और किसी न किसी रूप में एक-दूसरे से दो-दो हाथ भी कर रही हैं। इस विरासत की पहली पहचान,जिसकी गंभीरता और सदाशयता दोनों ही संदिग्ध हैं, वह है जो खुद प्रधानमंत्री के माध्यम से मौजूदा सरकार ने पेश की है। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि मौजूदा सरकार की दिलचस्पी, वास्तव में अनमने तरीके से देश के पहले प्रधानमंत्री की जयंती के पालन की खाना-पूरी करने में ही है। कोशिश यह है कि नेहरू की विरासत को, जयंती के मौके पर होने वाले सरकारी-अर्द्धसरकारी आयोजन तक ही सीमित कर दिया जाए। इस पहचान में नेहरू को ‘बच्चों के चाचा’ में ही घटा दिया गया है और बच्चों को सफाई से आदि की शिक्षा देने में ही समेट दिया गया है।
    इससे पहले इसी प्रकार गांधी जयंती पर, महात्मा गांधी को ‘सफाई के प्रेरक’ में घटाकर,उन्हें सफाई अभियान के शुभंकर तक सीमित किया जा चुका था। अचरज नहीं कि कभी-कभी खुलकर किंतु ज्यादातर दबे सुर में यह सवाल उठाया जाता रहा है कि आधुनिक भारत के निर्माताओं की ऐसी सीमित छवि बनाने के जरिए,क्या उनकी वास्तविक विरासत को हटाने-मिटाने की ही कोशिश नहीं की जा रही है? चूंकि भाजपा और खासतौर पर उसके संचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रुख इस विरासत के प्रति आम तौर पर वैर-भाव का ही रहा है, क्या यह भी स्वतंत्रता आंदोलन की इस विरासत के खिलाफ संघ परिवार के युद्ध का ही हिस्सा नहीं है। याद रहे कि स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के साथ संघ परिवार का रिश्ता बहुत खींच-खांचकर भी सावरकर से आगे नहीं जाता है। लेकिन,  यह वही सावरकर हैं जिन पर स्वतंत्र भारत में महात्मा गांधी की हत्या के षडयंत्र में शामिल होने के लिए मुकद्दमा चला था। कहने की जरूरत नहीं है कि यह मुकद्दमा उन्हीं सरदार पटेल के देश का गृहमंत्री रहते हुए शुरू हुआ था, जिन्होंने गांधी की हत्या के बाद ही, आर एस एस पर पहली बार पाबंदी लगायी थी। याद रहे कि ब्रिटिश हुकूमत को आर एस एस से कभी ऐसा खतरा महसूस नहीं हुआ था, जो उस पर पाबंदी लगाने की जरूरत महसूस करती।
    बहरहाल, इसके बावजूद अगर संघ परिवार को स्वतंत्र भारत के नेताओं में एक सरदार पटेल ही ‘अपने’ लगते हैं, तो यह सिर्फ नेहरू के मुकाबले में पटेल को खड़ा करने और इस तरह नेहरू का कद घटाने का ही मामला नहीं है। वास्तव में संघ के लिए पटेल के इस अपनेपन का संबंध, संघ के प्रति पटेल के अपने रुख से उतना नहीं है, जितना कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में हिंदुत्ववादी धारा के प्रति नेहरू-गांधी के कठोर विरोधी रुख के मुकाबले, पटेल के अपेक्षाकृत नरम रुख से है। याद रहे कि पटेल के समय तक हिंदुत्ववादी धारा की मुख्य प्रतिनिधि आर एस एस नहीं बल्कि हिंदू महासभा ही थी। यह दूसरी बात है कि जैसाकि गांधी हत्या के बाद तथा आर एस एस प्रतिबंध प्रकरण में सरदार पटेल की कार्रवाइयों से स्पष्ट था, पटेल के रुख की उक्त ‘नरमी’ का दायरा भी काफी सीमित ही था। इसीलिए, ‘लौह पुरुष’ के लिए दुनिया की सबसे ऊंची लौह प्रतिमा बनाने की मोदी की प्रिय परियोजना से नेहरू का कद छोटा नहीं होता है। हां! नेहरू का और वास्तव में गांधी का भी कद छोटा होता है, पटेल को ‘एकता’ का प्रतीक बनाए जाने से। यह राष्टï्रीय एकता की बहुसंख्यकवादी परिभाषा है,जो नेहरू की और गांधी की भी विरासत को ही नकारने की कोशिश करती है।
    बहरहाल, नेहरू की विरासत की दूसरी पहचान भी, जो नेहरू की सवा सौ वीं जयंती पूर्व-संध्या में खुद कांग्रेस पार्टी द्वारा शुरू किए गए आयोजनों में रेखांकित हुई है, अधूरी ही है। जयंती की पूर्व-संध्या में राजधानी में तालकटोरा स्टेडियम में कथित रूप से नेहरू के अनुयाइयों को दिलायी गयी ‘शपथ’, इसका जीता-जागता सबूत है कि नेहरू के प्रत्यक्ष वारिस होने के दावेदार, वास्तव में नेहरू की विरासत से कितनी दूर चले गए हैं। जरा भी आश्चर्यजनक न होते हुए भी उल्लेखनीय है कि इस लंबी शपथ में समाजवाद जैसा शब्द तो दूर-दूर तक नहीं ही है, समता स्थापित करने के लक्ष्य के लिए भी शायद ही कोई जगह है। ‘प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक’ भारत के निर्माण की बात जरूर है। लेकिन, ‘समाजवाद’ और ‘समता’ की नेहरू की कल्पनाओं की तमाम सीमाओं के बावजूद, जिन्हें नेहरू के वामपंथी आलोचक उनके जीवन काल से ही बलपूर्वक रेखांकित करते आए हैं, समाजवाद तथा समता के उत्प्ररेणों के बिना, नेहरू की विरासत को किसी भी तरह नहीं समझा जा सकता है। लेकिन, जहां नवउदारवादी नीतियों के भारतीय मसीहा, डा0 मनमोहन सिंह परमादरणीय के रूप में मंच पर विराजमान हों, नेहरू की विरासत के इन उत्प्रेरणों को याद किया भी कैसे जा सकता था।
    दुर्भाग्य से नेहरू की विरासत के ये दावेदार, समाजवाद व समता के इन उत्प्रेरणों से निकले हरेक क्षेत्र में स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता के उस अमल की विरासत से भी विमुख हैं, जो नेहरू की विरासत की असली श्क्ति ही नहीं है, उसी ने सही मानों में आधुनिक भारत के निर्माण की नींव रखी है। पुन:, ग्लोबलाइजेशन के व्यामोह में डूबे नेहरू के वारिसों को, भारी उद्योगों से लेकर, नाभिकीय व अंतरिक्ष विज्ञान जैसे फ्रंटलाइन शोध व विज्ञान के क्षेत्रों तक में आत्मनिर्भर विकास की नींव रखे जाने की मुश्किल उपलब्धियों की, कीमत ही कहां मालूम है। सच पूछिए तो इन कथित वारिसों को धर्म को बलपूर्वक राजनीतिक जीवन से दूर रखे जाने के अर्थ में, धर्मनिरपेक्षता को और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास को, एक आधुनिक, जनतांत्रिक समाज के विकास की पूर्व-शर्त के रूप में स्थापित करने की, अपने इस महान पुरखे की विरासत का भी पता नहीं है। इसीलिए, अचरज की बात नहीं है कि तालकटोरा स्टेडियम के अपने भाषण में कांग्रेस की ‘आशा’ माने वाले राहुल गांधी, ‘घृणा बनाम प्रेम’ की राजनीति की अपनी तमाम छद्म दार्शनिकता के बावजूद, न राजनीतिक जीवन में तेजी से बढ़ती धर्म तथा संप्रदाय की घुसपैठ को चीन्ह पाए और न सत्ता में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों द्वारा खुल्लमखुल्ला अवैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिए जाने की बढ़ती बीमारी को।
    बेशक, नेहरू की विरासत की एक तीसरी पहचान भी है। यह पहचान सबसे बढक़र, राष्ट्रीय मुक्ति के आंदोलन के दौरान उभरकर आयी समता, न्याय तथा स्वतंत्रता की आकांक्षाओं को, एक हर प्रकार से पिछड़े देश और संपन्नों व समर्थों के विशेषाधिकारों की रक्षक व्यवस्था की सीमाओं में रहकर पूरा करने के, उत्कट संघर्ष की पहचान है। यह पहचान एक आत्मनिर्भर, धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक व न्यायाकांक्षी राष्ट्र के निर्माण की मजबूत नींवें डालने वाले की है। हां! यह पहचान इसकी भी है कि किस तरह नवउदारवादी शासन में हो रहा ‘निर्माण’ एक-एक कर इन सभी नींवों को कमजोर कर रहा है। सिर्फ नाम-जाप करते-करते, नेहरू की विरासत से उल्टी दिशा में चलने के मामले में, पूर्व प्रधानमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री के बीच, उन्नीस-बीस से ज्यादा का फर्क नहीं है। नेहरू की विरासत को उनके भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। वे तो नेहरू की विरासत का जितना गुन गाएंगे, उसे उतना ही गहरा दफ्नाएंगे।

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राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।

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