Home » समाचार » नेहरू को बौना साबित करने की एक और कोशिश नाकाम

नेहरू को बौना साबित करने की एक और कोशिश नाकाम

जवाहरलाल नेहरू को हर दौर के राजनेता अपनी तरह का साबित करने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन पिछले पचास वर्षों में जब भी कोशिश हुयी उसे सफलता नहीं मिली। अब तक का सबसे बड़ा अभियान इंदिरा गांधी ने चलाया था और आपने चापलूसों से ‘ इंदिरा इज इण्डिया ‘ तक कहलवा लिया था लेकिन नेहरू के सामने वे मामूली ही रहीं। नेहरू की लोकशाही के जवाब में वे तिनका ही साबित हुईं। इस बार भी नेहरू को बौना साबित करने का एक अभियान चल पड़ा है। अपने आकाओं के लिए एक तथाकथित शोधकर्ता ने कुछ ऐसी जानकारी जुटाई है जिसके हवाले से एक बार फिर जवाहरलाल नेहरू की को बेकार साबित करने के लिए बहस का सिलसिला शुरू हो गया है। इस बार कोशिश की जा रही है कि यह साबित कर दिया जाए कि जवाहरलाल नेहरू ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के परिवार वालों पर आई बी के ज़रिये निगरानी रखी।
सुभाष चन्द्र बोस की राजनीतिक हैसियत भारत के समकालीन इतिहास में खासी अहम है इसलिए उनके खिलाफ नेहरू को पेश करके नेहरू को कमज़ोर शख्सियत वाला साबित करने की कोशिश चल रही है। वे लोग जिनकी पार्टियां आज़ादी की लड़ाई के दौरान या तो तटस्थ थीं और अगर नहीं थीं तो अंग्रेजों की मददगार थीं, वे जवाहर लाल नेहरू को बहुत ही मामूली नेता बताने की दौड़ में शामिल हो गए हैं। कुछ टेलिविज़न समाचारों के चैनल भी इस लड़ाई में कूद पड़े हैं। दिल्ली के काकटेल सर्किट में होने वाली गपबाज़ी से इतिहास और राजनीति की जानकारी ग्रहण करने वाले कुछ पत्रकार भी 1947 के पहले और बाद के अंग्रेजों के वफादार बुद्धिजीवियों की जमात की मदद से जवाहरलाल नेहरू को बौना बताने की कोशिश में जुट गए हैं। यहाँ किसी का नाम लेकर बौने नेताओं, दलालों और पत्रकारों को मह्त्व नहीं दिया जाएगा लेकिन यह ज़रूरी है कि आज़ादी की लड़ाई और उसके बाद की भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तरक्की में जवाहरलाल नेहरू की हैसियत को कम करने वालों की कोशिशों पर लगाम लगाई जाए।
नेहरू की विदेश नीति या राजनीति में कमी बताने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह नेहरू की दूरदर्शिता का ही नतीजा है कि आज भारत एक महान देश है और ठीक उसी दिन आज़ादी पाने वाला पाकिस्तान आज एक बहुत ही पिछड़ा मुल्क है। जो लोग समकालीन इतिहास की मामूली समझ भी रखते हैं उन्हें मालूम है कि कितनी मुश्किलों से भारत की आज़ादी के बाद की नाव को भंवर से निकाल कर जवाहरलाल लाये थे और आज जो लोग अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर टी वी चैनलों पर बैठकर मूर्खतापूर्ण प्रलाप करते हैं उन पर कोई भी केवल दया ही कर सकता है।
इस बात में दो राय नहीं है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का भारत की आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान है। कांग्रेस के हरिपुरा और त्रिपुरी अधिवेशनों के वे अध्यक्ष थे। महात्मा गांधी की मर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा और विजयी रहे, इस तरह से कांग्रेस के अन्दर जो राजनीतिक लोकतंत्र था उसको बहुत बड़े पैमाने पर नेताजी ने रेखांकित किया था। अंग्रेजों से आज़ादी हासिल करने के महात्मा गांधी के सत्याग्रह वाले तरीके को सुभाष चन्द्र बोस सही नहीं मानते थे। इसीलिये उनका महात्मा गांधी से सैद्धांतिक विरोध था। आज जो लोग महात्मा गांधी की विरासत को अपनाने के फ़िराक में हैं और नेताजी को भी नेहरू के खिलाफ पेश करके नेहरू को छोटा करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, उनको शायद नहीं मालूम कि कांग्रेस में 1930 के बाद जिन पोंगापंथियों का प्रभाव था, वही लोग जवाहरलाल और सुभाष बोस जैसे लोगों को किनारे लगाने की कोशिश कर रहे थे, इन पुरातन पंथियों के खिलाफ जो लामबंदी हुयी थी उसमें जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, सुभाष चन्द्र बोस और राम मनोहर लोहिया साथ-साथ थे। इसी दौर में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ था और उसमें कांग्रेस के अन्दर के सभी प्रगतिशील शामिल थे। बहुत कम लोगों को मालूम है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ई एम एस नम्बूदिरीपाद भी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य थे। नेहरू और सुभाष उसमें ऐलानियाँ तो शामिल नहीं थे लेकिन सामंती और पुरातनपंथी कांग्रेसियों के खिलाफ बन रहे इस संगठन को इन दोनों ही नेताओं का समर्थन था। महात्मा गांधी के करीब चिपकने की कोशिश कर रहे नेताओं से जवाहरलाल और सुभाष ने संयुक्त मुकाबला किया था। दोनों के बीच बहुत दोस्ती भी थी। एक दूसरे के घर के सदस्यों के बारे में भी जानकारी रखी जाती थी। 30 जून 1936 की एक चिट्ठी में सुभाष चन्द्र बोस ने इंदिरा गांधी के बारे में पूछा है और लिखा है कि बेचारी स्विटज़रलैंड में वह बहुत अकेली महसूस करती होगी। नेताजी लिखते है कि इंदु को मेरी तरफ से याद करना। इस पत्र को उन्होंने बहुत ही अपनेपन के साथ ख़त्म किया है। इसी तरह से 19 अक्टूबर 1938 की एक चिट्ठी में नेताजी ने नेहरू को लिखा है कि आप की कमी उन्हें बहुत खली। 1935-36 के दौरान ही नेताजी ने इन्डियन स्ट्रगल और नेहरू ने आत्मकथा नामक किताबें लिखीं। दोनों ही किताबों में जो राजनीतिक धार है वह बहुत मिलती जुलती है। इसलिए यह बहुत भरोसे के साथ कहा जा सकता है दोनों नेताओं में बहुत ही अच्छी दोस्ती थी और सुभाष चन्द्र बोस हमेशा जवाहरलाल नेहरू को बड़ा भाई मानते रहे।
लेकिन जब महात्मा गांधी से सुभाष का मतभेद बहुत बढ़ गया और उन्होंने कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी फारवर्ड ब्लाक बना लिया तो दोनों के बीच दूरियां कायम हुईं। सुभाष और नेहरू के बीच की दूरियां सही मायनों में सैद्धांतिक मतभेद था।वास्तव में जब नेताजी ने हिटलर और मुसोलिनी से संपर्क साधना शुरू किया तो कांग्रेस के सभी नेता उनसे दूर हो गए। उसके बाद उनके रास्ते अलग हो गये। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने १९४२ में भारत छोडो आन्दोलन शुरू किया और पूरा देश उनके साथ हो गया। उस दौर में जो लोग गांधी के साथ नहीं थे वे अंग्रेजों के साथ थे। इस आन्दोलन को कांग्रेस का आन्दोलन कहना भी सही नहीं है क्योंकि मुहम्मद अली जिन्नाह और हिन्दुत्ववादी नेता सावरकर और उनके अनुयायियों के अलावा बाकी सभी राजनीतिक मंच गांधी के साथ थे। महात्मा गांधी सहित सभी कांग्रेस नेता 1942 में जेलों में बंद कर दिए गए। लेकिन जो राजनीतिक संगठन कांग्रेस के खिलाफ और अंग्रेजों के साथ थे वे जेलों के बाहर रहे। इसी दौर में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने सैनिक शक्ति के साथ अंगेजों को चुनौती दी। उन्होंने जापानी सैनिकों के साथ मिलकर बर्मा के जंगलों में अपनी आज़ाद हिन्द फौज के साथ अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये लेकिन जब दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी के हिटलर ,इटली के मुसोलिनी और भारत की आज़ाद हिन्द फौज हार गयी तो सब कुछ बदल गया। आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक गिरफ्तार कर लिए गए। दिल्ली के लाल किले में उनके ऊपर मुक़दमा चला और देश की आज़ादी के बाद सब रिहा कर दिये गए और उनको आज़ादी के सिपाही माना गया। इस बीच नेताजी की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी। उसी मृत्यु और उससे जुडी घटनाओं को नेहरू विरोधी नेता और कुछ बुद्धिजीवी संशय पैदा करने के लिए इस्तेमाल कर रहे है, हमेशा से ही करते रहे हैं।
ताज़ा विवाद एक किसी शोधकर्ता के नाम से चलाया जा रहा है। इन महाशय ने कुछ ऐसी चिट्ठियाँ तलाश ली हैं जिनमें लिखा है कि नेताजी के परिवार वालों पर जासूसी करवाई जा रही थी और वह जासूसी इंटेलिजेंस ब्यूरो के ज़रिये जवाहरलाल नेहरू व्यक्तिगत रूप से करवा रहे थे। यह भी कहा जा रहा है कि उन दिनों इंटेलिजेंस ब्यूरो डाइरेक्ट प्रधानमंत्री के आदेश पर काम करती थी। इस बाद पर हंसी भी नहीं आयेगी क्योंकि यह सरकारी तंत्र के बारे में जानकारी के अज्ञान की सीमा है। इंटेलिजेंस ब्यूरो हमेशा से ही गृहमंत्रालय के अधीन काम करता रहा है।बताया जा रहा है कि १९४८ से १९६८ तक जासूसी करवाई गयी। इस दौर में सरदार पटेल, सी राजगोपालाचारी, कैलाश नाथ काटजू, गोविन्द वल्लभ पन्त, लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा और यशवंत राव चह्वाण गृहमंत्री रहे। अगर कोई यह कहता है इन सारे गृहमंत्रियों की अथारिटी को जवाहरलाल ने छीन लिया था तो उसकी सोच पर दया और सहानुभूति के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता। किसी भी हालत में आई बी द्वारा की गयी जासूसी जवाहरलाल पर नहीं फिट बैठती।
जहां तक जासूसी होने न होने की बात है उस पर कोई टिप्पणी करना ठीक नहीं है क्योंकि सरकारों में जिस तरह के लोग बैठे होते हैं वे कुछ भी कर सकते हैं लेकिन यह कहना कि जवाहरलाल नेहरू खुद जासूसी करवा रहे थे, बिलकुल विश्वास लायक नहीं है।
जिन लोगों ने भी जवाहरलाल को बौना साबित करने के लिए इस विवाद को चलाया है उन्होने अनजाने ही सही, नेहरू को एक महान व्यक्ति के रूप में स्थापित करने में निश्चित योगदान किया है। क्योंकि 1971 के बाद से जब कांग्रेस में इंदिरा गांधी को महान साबित करने के प्रोजेक्ट की शुरुआत हुयी तब से जवाहर लाल को नज़रंदाज किया जाने लगा था। इंदिरा गांधी के तानाशाही और पुत्रप्रेम की राजनीति को बड़ा दिखाने की कोशिश में नेहरू के लिबरल डेमोक्रेट व्यक्तित्व को कमतर करने का सरकारी अभियान चल रहा था। उस चक्कर में संजय गांधी, राजीव गांधी और राहुल गांधी देश के महान नेता बताये जा रहे थे। जबकि सच्चाई यह  है कि इन लोगों के महान बनाए जाने के दौरान ही ज़्यादातर कांग्रेसी इनसे बड़े राजनेता थे लेकिन उनको इंदिरा गांधी के इन वंशजों के पीछे चलने के लिए मजबूर कर दिया गया था। जब नेहरू विरोधियों ने देखा कि इन मामूली लोगों के साथ नेहरू को जोड़ा जा सकता है तो उन लोगों ने नेहरू को बौना साबित करने का अभियान चला दिया। यह तथाकथित शोधकर्ता इसी प्रोजेक्ट की पैदाइश लगता है। सबको मालूम है कि इस व्यक्ति को नेहरू विरोधी लोगों से अच्छा इनाम अकराम मिलेगा लेकिन हर बार की तरह इस बार भी जवाहरलाल नेहरू पहले से भी बड़े नेता के रूप में पहचाने जायेगें। ज़ाहिर है कि आज़ादी की लड़ाई में तो बहुत महान राजनेता थे लेकिन आज़ादी के बाद के नेताओं में जवाहर लाल नेहरू सबसे बड़े हैं। और उनको बौना साबित करने की एक और कोशिश नाकाम हो गयी है।
शेषनारायण सिंह

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: