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नैंसी का त्यागपत्र अथवा अफवाह के कारखाने का नया झूठ

सुन्दर लोहिया    
भारत स्थित अमेरीकी राजदूत नैंसी पॉवैल के इस्तीफा देने के बारे में राजनीतिक क्षेत्र में कई प्रकार के अनुमान लगाये जा रहे हैं। यह इस्तीफा ऐसे वक़्त आया है जब यहां लोकसभा चुनाव में राजनीतिक पार्टियां व्यस्त हैं। ऐसे समय किसी मित्र कहलाने वाले देश के राजनयिक का इस्तीफा कुछ सवाल तो खड़े करता है। इस सम्बन्ध में यह बात ध्यान आकर्षित करती है कि यह राजदूत गुजरात के मुख्यमन्त्री के साथ मुलाकात कर चुकी है। उस मुलाकात पर उस समय जो राजनीतिक प्रतिक्रियांए आई थी उन्हें यह कह कर टाल दिया था कि इस मुलाकात में केवल व्यापारिक मसलों पर विचार विमर्श किया गया। लेकिन तब तक नरेन्द्र मोदी भाजपा के प्रधानमन्त्री पद के घोषित उम्मीदवार भले ही नहीं थे लेकिन वे अपने आप को प्रधानमन्त्री पद के सबसे योग्य प्रत्याशी सिद्ध करने की हरमुमकिन कोशिश में जुटे हुए थे। विदेशी गुप्तचर एजेन्सियों को इस मामले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इरादे मालूम न हो यह कैसे माना जाये ?
इसलिए राजनीतिक नानुकर के बाबजूद उस मुलाकात में राजनीतिक मसाले से इन्कार कैसे किया जा सकता है? इस मुलाकात की पृष्ठभूमि में मोदी को अमेरीकी वीजा देने का मामला भी उछाला गया था। अगर और पीछे जाये ंतो अमेरीका की पत्रिका टाइम्स में मोदी को योग्यतम प्रशासक सिद्ध करते हुए प्रधानमन्त्री  मनमोहनसिंह को अनिर्णय की अपंगता ग्रस्त बताकर मोदी को भारत का भावी प्रधानमन्त्री बनाये जाने की रणनीति को उजागर कर दिया था।
        इस अंतराष्ट्रीय परिघटना का भी अपना इतिहास है। वैसे तो कश्मीर समस्या को लेकर पाकिस्तान के प्रति अमेरीकी रुझान के कारण भारत और अमेरिका के सम्बन्ध सौहार्द्रपूर्ण तो कभी रहे नहीं लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार और राष्ट्रपति बारक ओबामा के बीच जो दोस्ताना कायम हुआ था उससे सुधार की झलक दिखने लगी थी। इस नये समीकरण पर एक अमेरिकी समाचारपत्र ने तो यहां तक लिख दिया कि भारत के प्रधानमन्त्री को ओबामा अपना गुरु मानते हैं और मनमोहन सिंह के लिए राष्ट्रपति ओबामा व्यक्तिगत मित्र है। मित्रता का यह रसायन ज़्यादा देर तक  कायम नहीं रहा क्योंकि अमेरिका की सामरिक गतिविधियों में भारत आंखमूंद कर अनुसरण करने वाला दोस्त नहीं बन सका। अफगानीस्तान के युद्ध में अमेरिका भारतीय सेना की तैनाती चाहता था जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया। अमेरकिा चाहता था कि भारत श्रीलंका में तमिलों के प्रति  अत्याचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्रसंघ में उसके प्रस्ताव का समर्थन करे परन्तु भारत ने इस मामले में अनुपस्थित रह कर दक्षिण एशिया क्षेत्र में अमेरिकी हस्ताक्षेप को रोकने का फैसला करके उसे नाराज़ कर दिया। इसी प्रकार क्रिमिया के रूस के पक्ष में जो मतदान हुआ उस मामले में भी भारत ने रूस का साथ दे कर अमेरिका को हताश कर दिया।
       लेकिन इसी बीच अमेरिकी थिंकटैंक और वहां के व्यापार जगत की जानी मानी हस्तियां गुजरात में नरेन्द्र मोदी की सरकार से सांठगांठ करके वहां कारखाने स्थापित करके विदेशी निवेश की चर्चा शुरू हो गई थी। अमेरिकी कार बनाने वाली कम्पनियों में जनरल मोटर्स पहले से ही पांव जमा चुकी थी। अब फोर्ड कम्पनी भी गुजरात में पांव जमाने आ रही है। इसके उपलक्ष्य में अमेरिकी मीडिया नरेन्द्र मोदी को भारत के भावी प्रधानमन्त्री के तौर पर पेश कर रहा है। इस बारे अमेरिकी पत्रकार जोसेफ ग्रिवोस्की ने कहा है ;‘ अमेरिका में मोदी को भारत के भावी प्रधानमन्त्री के रूप में देखा जा रहा है। धार्मिक स्वतन्त्रता का मुद्दा 2005 में जितना महत्त्वपूर्ण था जिसके प्रभाव में मोदी को विजा देने से इन्कार कर दिया था वह अब उतना प्रभावशाली नहीं रहा है।’ मतलब साफ है कि मोदी के प्रधानमन्त्री बन जाने से अमेरिका अपनी नीति बदल सकता है।
         इस कूटनीतिक परिप्रेक्ष्य में सबसे ताज़ा घटना भारतीय राजनयिक अधिकारी देवयानी के साथ की गई बदसलूकी है जिसकी तीव्र प्रतिक्रिया के फलस्वरूप दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के सामने से सुरक्षा बैरीकेड हटाये और कर्मचारियों के विशेषाधिकार निरस्त कर दिये गये थे। ये सारे राजनीतिक प्रकरण नैंसी पॉवेल के त्यागपत्र की पृष्ठभूमि में काम कर रहे थे लेकिन नमो- मोदी के जाप करने वालों को इन सब कारणों से जैसे कोई लेना देना ही नहीं है। इसलिए नैंसी के इस्तीफे वाली घटना को भी वे अपने नेता के पक्ष में प्रस्तुत करते हुए कह रहे हैं कि उसे मोदी की छवि को कम आंकने के कारण वापिस बुलाया गया है। इन लोगों का मानना है कि इस राजदूत ने अपनी सरकार को नरेन्द्र मोदी के बढ़ते हुए प्रभाव को कम आंक कर जो गलती की है उसके परिणामस्वरूप उसे हटाया गया है। वास्तविकता यह है कि नैंसी को भारत अमेरिकी समब्न्धों में गिरावट के कारण वापिस बुलाया जा रहा है। यदि भाजपा की बात सच होती तो अमेरिकी व्यापारजगत और उसके थिंक टैंक के आकलन के संदर्भ में नैंसी की गुजरात यात्रा को उसकी राजनयिक दक्षता का प्रमाण माना जाना चाहिए था जबकि ऐसा नहीं है।
इससे यह बात साफ नज़र आ रही है कि मोदी की अमेरिका में गिरती हुई साख को बचाने के लिए भाजपा की अफवाह उगलती मशीन ने एक और अफवाह फैला कर झूठ को सच के तौर पर प्रसारित करने की अपनी कला का प्रदर्शन किया है।
           इस संदर्भ में आरएसएस के नेतृत्व से पूछा जाना चाहिए कि क्या नरेन्द्र मोदी के गुजरात विकास को संघ राष्ट्रीय स्तर पर आदर्श मानता है ? यदि हां तो संघ द्वारा संचालित स्वदेशी जागरण मंच के साथ इस मॉडल की संगति कैसी बिठाई जा सकती है ? या तो स्वदेशी जागरण मंच के आदर्श झूठे हैं या फिर नरेन्द्र मोदी के विकास के दावे जनता को बहकाने वाले हैं?यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक हो जाता है कि हिन्दुत्व के विकास के मॉडल भाजपा नेता लालकृष्ण अडवानी के अनुसार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी तो हैं उनकी ओर संघ की नज़र क्यों नहीं जाती?
       दूसरा सवाल है कि क्या संघ मोदी को अमेरिकी वीजा दिलाना इसलिए ज़रुरी मानता है कि यदि कल को गुजरात के नर संहार को लेकर मोदी की जानबूझकर अनजान बनने को संलिप्तता मान लिया जाये और उन्हें इसके लिए सज़ा मिलने के आसार बन जायें तो वह अमेरिका में शरण प्राप्त करने की स्थिति में वहां प्रवेश कर सके ? जब तक वीजा को लकर प्रतिबन्ध कायम रहेगा मोदी अमेरिका में शरण लेने के हकदार नहीं माने जायेंगे इसलिए उन्हें प्रधानमन्त्री बनाने के लिए ज़मीन आसमान एक किये जा रहे हैं ताकि प्रधानमन्त्री के तौर पर उनपर लगा हुआ प्रतिबन्ध राजनयिक शिष्टाचार के तहत स्वतः निरस्त हो जाये?
( नोटः- इस आलेख में उद्धृत वक्तव्य अमेरिकी समाचारपत्र न्यूयार्कटाम्इस के 31 मार्च 2014 और इसी तिथि के बीबीसी हिन्दी समाचार के इंटरनेट संस्करण से लिए गये हैं)

About the author

सुन्दर लोहिया, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। आपने वर्ष 2013 में अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं। इनका न केवल साहित्य और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है बल्कि वे सामाजिक जीवन में भी इस उम्र में सक्रिय रहते हुए समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं। अपने जीवन के 80 वर्ष पार करने के उपरान्त भी साहित्य और संस्कृति के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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