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नोटबंदी-अब दौलताबाद से दिल्ली वापसी, बलि के बकरे भी तैयार ; यह नोटबंदी भोपाल गैस त्रासदी है

नोटबंदी-अब दौलताबाद से दिल्ली वापसी की तैयारी, बलि के बकरे भी तैयार
मोदी-दीदी ध्रुवीकरण सबसे खतरनाक
यह नोटबंदी, नोटबंदी नहीं भोपाल गैस त्रासदी है
पलाश विश्वास
 2000 और 500 रुपए के नए नोट में पीएम मोदी की स्पीच के वीडियो की बातें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं।  
दावा है कि नए नोट को स्मार्टफोन से स्कैन करने पर पीएम की वह स्पीच सुनी जा सकती है,  जो उन्होंने ब्लैक मनी और करप्शन को लेकर दी थी।
यह नोटबंदी का असल मकसद है कि गांधी फिलहाल जायें न जायें, अशोक चक्र रहे न रहें, हर नोट के साथ मोदी महाराज का वीडियो जरुर चस्पां हो।
हिंदुत्व का नोटबंदी एजेंडा दरअसल यही
रुपए के नए नोट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण।
 सुनने में यह अचरज से भरता है,  लेकिन है सोलह आने सच।  बस इसके लिए आपको “मोदी के नोट” एप डाउनलोड करना होगा।  
#Daulatabadsedelhi
इसी बीच भारतीय बैंकिंग हिंदुत्व के एजेंडे के सौजन्य से दिवालिया है और  देश लगातार 12 दिनों से कैश की कमी से जूझ रहा है।
 भारत अब कैशलेश पेटीएम इंडिया है।
जिसमें भारत और इंडिया के लोग अलग अलग दो कौमें हैं।
इंडिया के लोग जीने के लिए चुन लिये गये हैं
और भारत के लोग बेमौत मारे जायेंगे।
बलि के बकरे भी तैयार।
सफेद धन से मोहताज आम जनता और कालाधन को सफेद करने की संसदीय सर्वदलीय राजनीति तेज।
मोदी दीदी ध्रुवीकरण।
नोटबंदी का फैसला जैसे औचक हुआ वैसे ही अब नोटबंदी का फैसला वापस हो सकता है। सर्वदलीय सहमति की राजनीति इसी दिशा में बढ़ रही है।
ममता बनर्जी नोटबंदी के खिलाफ विपक्ष को गोलबंद कर रही हैं, तो मोदी महाराज को अब चिटफंड की याद आयी है, जिसे बंगाल में कांग्रेस और माकपा का नामोनिशां मिटाने की मोदी-दीदी युगलबंदी के तरह रफा-दफा कर दिया गया है और सीबीआई जांच का नतीजा चूंचूं का मुरब्बा है।
नारदा में घुसखोरी के थोक वीडियो फुटेज मिलने पर भी खामोश रहे मोदी अब फिर 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार चिटफंड के शिकार लोगों के लिए आंसू बहाने लगे हैं।
अभी-अभी हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में किसी संघी या भाजपाई को चिटफंड की याद नहीं आयी। मोदी या शाह को शारदा का नाम लेते किसी ने नहीं सुना।
किसी धर्मस्थल पर जमा अकूद नकदी सोना चांदी वगैरह-वगैरह जो देश की कुल नकदी और संपदा है, किसी छापेमारी की कोई खबर नहीं है।
धार्मिक ध्रुवीकरण की तरह यह दीदी मोदी ध्रुवीकरण बेहद खतरनाक है। अब बैंक आफिसर्स एसोसियोसिएशन ने नोटबंदी प्रबंधन में नाकामी के लिए रिलायंस ठप्पे वाले रिजर्व बैंक के गवर्नर को हटाने की मांग भी कर दी है।
खाताधारकों, आयकरदाताओं को पिछले दस दिनों से उनका पैसा वापस देने में नाकाम भारतीय बैंकिंग प्रणाली अक्षरशः दिवालिया है और इसकी वजह हर नये नोट में चस्पां हिंदुत्व का एजेंडा है और इसका राजनीतिक प्रबंधन है। जिसमें न अर्थव्यवस्था के हित हैं और न अर्थशास्त्र है।
वित्तीय प्रबंधन उसी तरह नहीं है जिस तरह सवा अरब नागरिकों की जानमाल की कोई परवाह नहीं है। उनकी आजादी और उनकी संप्रभुता की कोई परवाह नहीं है।
आधार के जरिये बूंद बूंद नकदी जो दी जा रही है, उस आधार का क्या क्या इस्तेमाल होने जा रहा है, कोई नहीं जानता।
कालाधन के लिए किसी राजनेता, हथियारों के सौदागर, निजीकरण के दलाल, कारपोरेट घराने के वारिशान को आयकर नोटिस गया हो या नहीं, कतारबद्ध होकर किसी आपातकाल के लिए निकाले पैसे फिर बैंक में जमा करने वालों को थोक आयकर नोटिस का चाकचौबंद इंतजाम है।
अकेले विजय माल्या को अकेले एसबीआई ने दो हजार करोड़ का कर्ज माफ कर दिया तो कितने और माल्या को कितने बैंकों ने कितने हजार या लाख करोड़ माफ कर दिये हम नहीं जानते।
आम जनता के पास अब धेला भी नकद बचा नहीं है।
अब पुराने पांच सौ और हजार के नोट जो करीब दस से बारह ट्रिलियन जमा नहीं हुए, वैध करार दिये गये, तो आम जनता को कोई राहत मिलने वाली नहीं है।
यह दौलताबाद से दिल्ली की कवायद दस बारह ट्रिलियन कालाधन को सफेद बनाने के लिए शुरु हो गयी है। सर्वदलीय संसदीय राजनीति इसका माहौल बना रही है मोदी दीदी ध्रुवीकरण के तहत।
यह फासीवादी राजकाज की तस्वीर का दूसरा पहलू है।
कैश संकट का कमाल यह है कि दस रुपये के सिक्के असली बता दिये गये हैं।
मौजूदा संकट से कल्कि महाराज बैंकिग प्रणाली को दिवालिया बनाकर साफ बच निकले हैं और उन्हें कोई कटघरे में खड़ा भी नहीं कर रहा है।
रिजर्व बैंक के गवर्नर और बाकी बैंकों के गवर्नर और बाकी बैंकों के टाप अफसरान बैंको के दिवालिया बनने के हादसेके बाद बलि के बकरे बनकर कतारबद्ध हैं तो आम जनता को राहत देने की राजनीति कुल मिलाकर यह है कि नोटबंदी फिर वापस ले ली जाये तो कालाधन जो अभी नकदी में है, उसे उन्हें कारपोरेट चंदा बतौर मिल जाये। यह नोटबंदी से भी ज्यादा खतरनाक खेल है।
इस खेल का ताजा नजारा मसलन लोकसभा में विपक्ष की बैठक खत्म हो गई है। नोटबंदी पर विपक्ष राष्ट्रपति भवन तक मार्च करेगा और संसद परिसर में गांधी प्रतिमा के पास धरना देगा।  
नोटबंदी के फैसले के औचित्य पर अब कोई बहस नहीं हो रही।
मीडिया, राजनीति और आम जनता भी नोटबंदी प्रबंधन को मौजूदा संकट के लिए जिम्मेदार बता रही हैं।
इसका सीधा मतलब है कि कुल मिलाकर नोटबंदी को जायज ठहराने की कवायद सर्वदलीय है और इस सर्वदलीय राजनीति को देश के वित्तीय प्रबंधन या अर्थव्यवस्था या मुक्तबाजार से कोई शिकायत नहीं है।
जाहिर है कि कल्कि महाराज का छप्पन इंच का सीना पता नहीं कितने इंच का हो गया होगा जबकि ग्लोबल हिंदुत्व का ट्रंप कार्ड चल चुका है।
प्रधानमंत्री का ताजा बयान यह है कि वे जब चाहेंगे, नीति बदल देंगे।  
भयानक त्रासदियों का यह दुस्समय प्राकृतिक आपदाओं पर भारी है।
अंटार्टिका पिघल जाये या हिमालय के सारे ग्लेशियर एक मुश्त बहकर मैदानों का नामोनिशां मिटा दें, उससे भारी यह कयामत है जब करदाताओं के बैंकों में अपने खाते में जमा पैसा देने में असमर्थ है भारतीय बैंकिंग प्रणाली।
इस जमापूंजी का बाकायदा इनकाम टैक्स भुगतान हो चुका है। रिटर्न दाखिल हो चुका है। बैंक खाते में जमा वेतन,  पेंशन,  भत्ता,  पीएफ, ग्रेच्युटी से लेकर सब्सिडी सबकुछ सफेद है। फिर भी आपको साबित करना है कि यह कालाधन नहीं है।
चार पांच लाख ट्रिलियन रुपये बैंकों में जो जमा हुआ है, वह जाहिर है सफेद है। इसके बाहर जो दस बारह लाख रुपये अभी जमा नहीं है, उस कालाधन को सफेद में बदलने की अब संसदीय राजनीति है। सावधान।
कानपुर में ट्रेन हादसे में सवासौ लाशों की गिनती हो चुकी है, जिनके नाम रेलवे और यूपी सरकार ने मुआवजे का ऐलान कर दिया।
भारतीय बैंकिंग नेटवर्क से बाहर जो वर्गहीन समाज है, जिसका न बैंक खाता है, न आधार कार्ड है, उसमें शामिल हर हतदरिद्र मनुष्य की जिंदगीभर की जमापूंजी एक झटके से कालाधन में तब्दील है।
मेहनत मजदूरी करके घर चला रही स्त्रियां, माताएं, बहनें, पत्नियां जो अपीने कुसल वित्तीय प्रबंधन से जिंदगीभर जोड़ा है, रातोंरात वह कालाधन है।
आयकर छापे से पहले ही उन्हें वह रकम बैंक में लाइन लगाकर जमा करना पड़ा या परिजनों को सौंप देना पड़ा।
उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और उनका आत्मविश्वास एक झटके से खत्म हो गया।  
ये जिंदा लाशें हैं हर घर में, जिनकी गिनती किसी ने नहीं की है।
नोटबंदी संकट में जो लोग बेमौत मारे गये हैं और आगे भी मारे जायेंगे, उनके लिए मुआवजे का कोई ऐलान अभी तक हुआ है कि नहीं, नहीं मालूम है।
प्रधानमंत्री के भाषण का वीडियो दिखाने वाला नया नोट अब भी अतिदुर्लभ है। पांच सौ और हजार के नोट रद्द हो गये तो नया कालाधन बनाने, चलाने और जमा करने के लिए भाषम चस्पां हिंदुत्व का एजेंडा जेब में हुआ तो उसके बदले खुदरा सामान खरीदने का उपाय नहीं है क्योंकि छुट्टा आम दुकानदारों के पास नहीं है।
फिर जो पेटीएम से कारोबार नहीं करते, जो कार्ड स्वाइप नही करते, उन करोड़ों लोगों का कारोबार बंद है और वे बाजार से बाहर हैं और उनका कोई वैकल्पिक रोजगार भी नहीं है।
वे तमाम लोग जब आहिस्ते-आहिस्ते मारे जायेंगे या अलग अलग खुदकशी करेंगे, तो हम किसी भी सूरत में इसकी वजह नोटबंदी साबित नहीं कर पाएंगे।
उनके लिए मुआवजे का ऐलान हो भी जाये तो जिनके सर पर अभी मौत मंडरा रही है और देर सवेर जो मारे जाएंगे, उन्हें कानपुर की रेल दुर्घटना की तरह कोई मुआवजा नहीं मिलेगा।
खेतों और चाय बागानों और कल कारखानों में नवउदारवाद के अश्वमेधी अबियान के बलि करोड़ों लोगों की मौत का कोई लेखा जोखा कहीं नहीं है।
अब पेटीएम चालू है और देश डिजिटल है। इस सिलसिले में हमने पहले ही लिखा है कि चार महीने से आम आदमी के डेबिट कार्ड एटीएम पिन चोरी हो रहे थे।
 बैंकों को इस बात की जानकारी भी थी,  मगर उन्होंने यह जानकारी अपने ग्राहकों से छिपा ली। साइबर क्राइम से बड़ा अपराध तो भारतीय वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक और बैंकिग प्रबंधन का है।
इस हादसे के बावजूद पेटीएम इंडिया के हिंदुत्व एजेंडे के तहत यह नोटबंदी,  नोटबंदी नहीं भोपाल गैस त्रासदी है और इस गैस चैंबर में मौत बरसाने वाली गैस सुगंधित नहीं है और उसका कोई रासायनिक नाम भी नहीं है।

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