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नोटबंदी पूंजीपतियों को फायदा पहुँचाने की चाल- मोदी

नोटबंदी पूंजीपतियों को फायदा पहुँचाने की चाल- मोदी
अनुराग मोदी

पांच सौ और एक हजार के नोट पर बंदी, या तकनीकी रूप से कहें तो विमुद्रीकरण, के फायदों को लेकर सरकार कई तरह के दावे कर रही है। उसमें मुख्य हैं : कालेधन की समाप्ति; नकली नोट पर रोक और आतंकवादियों की फंडिंग पर रोक।

मैंने, इस बारे में जानने के लिए – मुख्य तौर पर – रिजर्व बैंक की वेब साईट पर मौजूद उनकी 2016 की वार्षिक रपट के चैप्टर VIII, ‘करेंसी मैनजमेंट’ और ‘ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी’ की रिपोर्ट और बैंको के डूबते लोन पर अंग्रेजी के अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बरों के पन्ने पलटे।  इसके आधार पर मैं यह लेख लिख रहा हूँ। 

असल में सरकार ने अडानी, अम्बानी, विजय माल्या जैसे लोगों को लाखों करोड़ रुपए का लोन बैंकों से देकर रखा है। यह राशि देश के करोड़ों किसानों और छोटे-मोटे व्यापरियों पर बकाया राशि से भी ज्यादा है। इनके नाम भी सरकार सुप्रीम कोर्ट में बताने से इंकार कर रही है। उल्टा, इसमें कुछ लोगों के बाढ़ हजार करोड़ तो स्टेट बैंक ने 18 नवम्बर को ही माफ़ किए; इसमें छह हजार करोड़ तो अकेले विजय माल्या के हैं, जो बिना लोन चुकाए विदेश जाकर इन पैसों से ऐश कर रहा है।
उन लोगों ने वो पैसा लौटाया नहीं है – जिसके चलते बैंक डूब रहे थे।
 सरकार व्दारा नोट बंद करने से इन लोगों का पैसा तो बैंक में नहीं आएगा, क्योंकि वो लोग अपना कालाधन नगदी में नहीं रखते। लेकिन गरीबों, छोटे व्यापारियों, मध्यमवर्गीय लोगों का सारा पैसा बैंक में पहुँच जाएगा। यह राशि दस लाख करोड़ से ऊपर होगी। इससे बिना लोन वसूली के 31 मार्च 2017 को बैंको के खातों में (लगभग) कम से कम 5 लाख करोड़ रुपए की राशि जमा दिखेगी; और बुरे-ऋण से वित्तीय संकट में पड़े बैंक कृत्रिम रूप से नोट से जमा से फटते नजर आएंगे। और, एक बार फिर पूंजीपतियों को बड़े पैमाने पर दिया जा सकेगा।

इस नोटबंदी से कालाधन खत्म होगा या नहीं यह हम देखते हैं:
दावा : बंद हुए नोट जमा करने और बदलने के लिए 30 दिसम्बर 2017 तक का पर्याप्त समय दिया गया है; लोगों को कोई दिक्कत नहीं होगी।
प्रतिदावा : यह सही नहीं है- यह समय रिजर्व बैंक के ही पुराने अनुभव के अनुसार कुछ भी नहीं है। रिजर्व बैंक ने जब 2013 में,  2005 से पहले की सीरीज़ के 500 के नोटों पर रोक लगाई थी, तब मई 2013 से जुलाई 2016 तक समय दिया गया था – 3 साल से ऊपर। और, उसके बाद भी इन्हें अभी भी  रिजर्व बैंक के देश भर के दफ्तरों में जमा किया जा सकता है; ऐसा उसने लोगों को असुविधा से बचाने के लिए किया।

वहीं, इस बार 86% करेंसी (नोट) को चलन से बहार करने के आदेश के बाद; उन्हें सिर्फ 50 दिनों में बदलने का काम कैसे संभव है? और यह अभी दिख भी रहा है – पूरा देश रुक सा गया है।

दावा : नए नोटों की कमी शीघ्र ही दूर हो जाएगी; बैंकों को पर्याप्त मात्रा में नए नोट भेजे जा रहे हैं।

प्रतिदावा : सरकार ने जो कुल राशि मुद्रण से बहार की है, उसका मूल्य 14.17 लाख करोड़ है। अब इसमें से कितनी राशि के नोट अगले एक साल में छप सकते हैं, जरा इसे समझें।

अगर हम देश की सुरक्षा कागज़ मिल और नोट मुद्रण मिलों व्दारा रिजर्व बैंक को पिछले साल – 2015-16 – में  नए नोट की आपूर्ति पर नज़र डालें तो वास्तविक स्थिति का अंदाजा होगा। रिजर्व बैंक ने ‘क्लीन नोट’ योजना के तहत वर्ष 2015-16 में 500 रुपए के 560 करोड़ नए नोट मांगे थे, जिसके बदले उन्हें सिर्फ 421.9 करोड़ नोट ही मिले। यानी मांग से संख्या में 1/3 कम मिले;  कुल 2.14 लाख करोड़ रुपए राशि के नोट।
और 1000 रुपए के 190 करोड़ मांगे थे, मिले सिर्फ 97 लाख 7 हज़ार नोट – यानी मांग से आधे ही मिले; कुल मूल्य .977 लाख करोड़ रुपए।
अब, एक हजार की बजाए दो हजार के नोट मुद्रित हो रहे हैं – तो यह राशि होगी लगभग 2 लाख करोड़ रुपए।

 मतलब, हमारे नोट मुद्रण की क्षमता के अनुसार अगले एक साल तक – याने अक्टूबर 2017 – कुल 4.11 लाख करोड़ रुपए मूल्य के 500 और 2000 के नोट ही मुद्रित किए जा सकते हैं।

नोट छापने का कागज़ विदेश से आता है और,  इसमें वाटर मार्किंग आदि का काम सिर्फ सुरक्षा कागज पेपर मिल, होशंगाबाद में होता है; और मुद्रण: देवास (म. प्र.), नासिक (महारष्ट्र) मैसूर (कर्नाटक) और सलबोली (प. बंगाल) में। इसलिए इस क्षमता को कुछ हद तक ही बढ़ाया जा सकता है।
अगर नोट छापने की क्षमता को 25% बढ़ा भी ली गई लिया गया, तो यह होगा 5 लाख करोड़ रुपए।
याने 14.17 लाख करोड़ रुपए की मुद्रा के बदले अगले एक साल में लगभग 1/3 नगद राशि के नोट ही चलन में आ पाएंगे।

इसके आलावा, नोट की कीमत अनुमान एक साल मानी जाती है, याने हर साल की तरह कम से कम 1/3 नोट तो बदलने ही होगा; उसके लिए कम से कम 1.5 -2 लाख करोड़ रुपए के अतिरिक्त नोट लगेंगे।

दावा : कालाधन खत्म करने के लिए नोटबंदी जरूरी थी।

प्रतिदावा : नोटबंदी हर छोटे-बड़े शहरों में छोटे-बड़े व्यापारियों का कालाधन कुछ समय के लिए जरुर सिस्टम से बहार हो जाएगा – वो राशि आंकड़े में बढ़ी लग सकती है; लेकिन, वो  कुल काले धन के मुकाबले नगण्य प्रतिशत ।

1948 -2008 के बीच भारत में अवैध-धन को बहार के देशों में बहाव बने रहने के कारणों पर ‘ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी’ (एक अंतरार्ष्ट्रीय संस्था) ने वर्ष 2008 में एक रिपोर्ट निकली थी।

इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1991 से 2008 के उदारीकरण के दौर में मुक्त व्यापार (बिना रोकटोक के व्यापार) के चलते नियमों जो शिथिलता आई, उसके परिणामस्वरूप कालेधन के भारत से बहार के देशों में जाना काफी बढ़ा।

उनके आकलन के अनुसार 2008 में जो रुपए का मूल्य के हिसाब से यह कला धन 43 लाख करोड़ रुपए है; जो देश सकल उत्पादन का 50% है। इसमें से 72% कालाधन विदेश में पूंजीपतियों बैंक खातों में है।
रिपोर्ट के अनुसार: बाहर देशों से होने वाले आयात होने सामग्री की ओवर-बिलिंग कर के यह कालाधन पैदा किया जाता है।
उदाहरण के लिए 10 रुपए मूल्य की सामग्री की कीमत की 15 रु. बिलिंग कर बचे हुए 5 रुपए विदेश में ही खारीददार की मर्जी के खाते में डाल दिए जाते हैं। इसके अलावा, कैसे ‘कर आश्रय टापू’ (आईलैंड टैक्स हेवन्स) के जरिए कर भरने से बचा जाता है। जिससे कर संग्रह कम हुआ और इसका बुरा असर गरीबों पर पड रहा है – और यह लगातार बढ़ रहा है।

वैसे भी इनकम टैक्स विभाग के कालेधन के लिए मारे गए छापे से यह साफ़ हुआ है कि सिर्फ 5% कालाधन ही नगदी के रूप में है।

दावा : नोटबंदी से आतंकवाद में लगने वाली ‘नकली मुद्रा’ की आपूर्ति थमेगी।

प्रतिदावा : ऐसा कुछ ही हद-तक होगा; और वो अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान के मुकाबले नगण्य है।

सरकार ने हाल ही में ‘भारतीय सांख्यिकी संस्थान’ कोलकाता से इस बारे में एक अध्ययन करवाया था। उसके अनुसार देश में कुल 400 करोड़ की नकली मुद्रा है – जो 500 और 1000 रुपए की कुल मुद्रा का .026% ही है।

यह रिपोर्ट हमें यह भी बताती है: 80% नकली नोट को पकड़ने का काम तीन निजी बैंक ही मुख्य तौर पर करते हैं; जबकी जो ‘गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान’ बड़े पैमाने पर नगदी सँभालने का काम करते हैं – वो नकली नोट की जांच नहीं करते हैं। 

इसलिए, नोटबंदी से बड़े कॉर्पोरेट घरानों के कालेधन में रत्तीभर का भी फर्क नहीं आएगा। वो सरकार की नीतियों और कानून में छेद का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर कालाधन पैदा करते है; इसलिए, ना तो उसके स्रोत में कुछ फर्क आएगा, ना उनका कालाधन खत्म होगा। बल्कि, छोटे-बड़े व्यापरियों के कमजोर से होने से, इन कॉर्पोरेट घरानों की पकड़ बढ़ेगी।

कर भुगतान से बचाव के लिए टैक्स कानून को कैसा तोड़ना-मरोड़ना यह काम दुनिया-भर में होता है। जैसे, अमेरिका में हाल में चुने गए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर यह आरोप है कि उन्होंने 1995 में अपनी व्यक्तिगत कमाई में 6,221 करोड़ का घाटा दिखाया जिसके चलते, वो 2018 तक व्यक्तिगत कर देने से बच गए। उन्होंने तमाम दबाव के बावजूद अमरीकी चुनाव के दौरान अपना ‘टैक्स रिटर्न’ जारी नहीं किए। और जब उन्हें मजबूर करने के लिए, दुनिया के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति – अमरीकी निवासी ‘बारेन बफेट’ ने अपना जो ‘टैक्स रिटर्न’ ज़ारी किया: उसके अनुसार उन्होंने 2015 में 12 करोड़ रुपए (1.8 मिलियन $) का निजी कर भुगतान किया।

हमारे देश में भी सबसे ज्यादा निजी कर भुगतानदाता में एक छोटे कॉर्पोरेट घराने के 5 लोगों के अलावा 8 , 9 और 10 नम्बर पर फ़िल्मी हस्तियाँ है – 15 करोड़ के आसपास का कर भुगतान करते हैं।

वर्तमान नोट आपूर्ति से नगदी के लेन-देन की समस्या तो दो-तीन माह में हल हो जाएगी, लेकिन नगदी नोट की आपूर्ति में 1/3 की कमी आने से, नगदी व्यापार पर आघात लगेगा। मजदूरों को काम नहीं मिलेगा।

कालाधन हमारे देश में पैदा होता है, क्योंकि हमने आज़ादी के बाद अंग्रेजों का तंत्र ही अपनाया जिसके चलते नौकरशाही का और नेताओं के हाथ में सारी ताकते आ गई और उन्होंने अपने में केन्द्रित इस शक्ति के आधार पर भ्रष्ट्राचार को बढ़ावा दिया – इससे कालाधन भी बढ़ा।

अगर सरकार वाकई में कालेधन और समस्या से निजाद पाना चाहती है, तो: उसे सबसे पहले शक्तियों का विकेंद्रीकरण करना होगा; करचोरी को बढ़ावा देने वाली नीतियों को खत्म करना होगा, निजीकरण के दौर में तो उल्ट हुआ है; छोटे व्यापार को बढ़ावा देना होगा, वो मिट रहे हैं, और बड़े कॉर्पोरेट मज़बूत हो रहे हैं; लोकपाल जैसी संस्थाओं को प्रभाव में लाना होगा, लोकपाल बिल का पता नहीं है।

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