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न कवि की मौत होती है और न कविता की

वीरेनदा आपको अपने बीच खड़े मिलेंगे उसी खिलंदड़ बेपरवाह अंदाज में हमेशा हमेशा सक्रिय!

वीरेनदा के जनपद और उनकी कविता को समझने के लिए पहले जानें सुधीर विद्यार्थी को, फिर जरुर पढ़ें उनका संस्मरण वीरेनदा की कविताओं पर केंद्रित!

पलाश विश्वास

जनपद के कवि वीरेनदा, हमारे वीरेन दा कैंसर को हराकर चले गये! लड़ाई जारी है इंसानियत के हक में लेकिन, हम लड़ेंगे साथी!

आज लिखा जायेगा नहीं कुछ भी क्योंकि गिर्दा की विदाई के बाद फिर दिल लहूलुहान है। दिल में जो चल रहा है, लिखा ही नहीं जा सकता। न कवि की मौत होती है और न कविता की क्योंकि कविता और कवि हमारे वजूद के हिस्से होते हैं। वजूद टूटता रहता है। वजूद को समेटकर फिर मोर्चे पर तनकर खड़ा हो जाना है। लड़ाई जारी है।

Let Me Speak Human!

An Ode to Freedom fighters whom nobody remembers!

कल दिन में जब यह संस्मरण हमारे इनबाक्स में लैंड हुआ तो बिना पढ़े मुझे अंदाजा हो गया कि सुधीर जी ने क्या लिखा होगा।

मेरी औकात भी जनपदों की कीचड़ मिट्टी बदबू तक सीमाबद्ध हैं और जनपदों के महायोद्धाओं जैसे त्रिलोचन शास्त्री या बाबा नागार्जुन को देखते रहने का फायदा भी मिला है, तो इन दोनों के दिलोदिमाग को अपने दिलोदिमाग, अपने वजूद का हिस्सा बना लेने में मुझे कोई तकलीफ नहीं हुई।

मुश्किल यह है कि सुधीर जी तकनीकी तौर पर अभी दक्ष नहीं है और गुगल ड्राइव या मेल पर लिखते नहीं हैं।

जैसे पश्चिम बंगाल के तमाम प्रतिबद्ध एक्टिविस्ट और संस्कृतिकर्मी गुगल पर लिखने के अभ्यस्त नहीं हैं।

ये लोग अटैचमेंट से और अक्सरहां पीडीएफ फाइल में अपना लिखा भेजते हैं, जो किसी और प्लाटफार्म में ले जाने की तकनीकी दक्षता हमारी है नहीं।

सुधीर जी कंप्यूटर में लिखने के अभ्यस्त नहीं हैं।

हम उनकी यह समस्या समझते हैं।

वे आफिस फाइल और कृतिदेव फांट में लिख रहे हैं।

कोलकाता में आकर वे लगातार इसी तरह लिख रहे हैं वरना वे कलम से लिखते रहे हैं।

मेरी मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है। अंग्रेज बच्चों के वर्चस्व के मुकाबले मैंने नैनीताल में जिद करके अंग्रेजी माध्यम अपना लिया।

मेरी अंग्रेजी भाषा पर डा. मानसमुकुल दास का कहना था कि एवरेज है। 1979 में कालेज छोड़ा और अंग्रेजी साहित्य से नाता टूट गया।

चिपको आंदोलन की वजह से नैनीताल समाचार, दैनिक पर्वतीय और पहाड़, तारांच्द्र त्रिपाठी, कपिलेश भोज और गिर्दा की वजह से हिंदी से अंग्रेजी माध्यम में कालेज लाइफ बिताने के बावजूद नाता कभी नहीं टूटा तो पत्रकारिता हिंदी में करने मेंअसुविधा भी नहीं हुई। साहित्यकर्म भी जारी रहा। जो अब मुद्दों को संबोधित करने में निष्णात भी हो गया है और हम इतिहास से बाहर हैं।

1991 के ग्लोबीकरण के आतंक ने सबकुछ स्वाहा कर दिया। फिर भी हमने हार नहीं मानी क्योंकि हमारे सामने, हमारे साथ आनंद स्वरूप वर्मा और पंकज बिष्ट थे तो वीरेनदा और सुधीर विद्यार्थी भी थे। बाद में अमलेंदु, रेयाज, यशवंत, अभिषेक और डा. आनंद तेलतुंबड़े से लेकर तमाम मित्र विभिन्न भाषाओं में हमारे कारवां में शामिल होते रहे। तो यह कारवां लंबा होते जा रहा है।

इस कारवां को छोड़कर चले गये गिरदा और फिर वीरेनदा, लेकिन सफर हमारा जारी है।

लड़ाई हमारी जारी है।

आनंद, पंकजदा, मंगलेशदा, सुधीर जी, तेलतुंबड़े हैसियत और उम्र में हमसे बड़े हैं। शेखर पाठक तो हमारे प्रोप्सर रहे हैं लेकिन छात्र जीवन से ही उनसे दोस्ती रही है। तो हमारे प्रोफेसर बटरोही के मित्र राजीव लोजन साह भी हमारे बड़े भाई कम, मित्र ज्यादा हैं।

हमारा वजूद इन लोगो से बना है।

यह साझा वजूद है, साझे चूल्हे की तरह, जिसकी आग कभी बूझती नहीं है।

शुक्र है कि हमें अमलेंदु, रेयाज, अभिषेक और यशवंत भी मिल गये और हमारे कारवां में शामिल है सीनियर पत्रकार सीमा मुस्तफा, कामायनी महाबल, रुक्मिण सेन, रोमा जैसी मजबूत स्त्रियां, जिनकी ताकत हमारी ताकत बन रही है।

अनेक लोग हैं अभी हमारे मोर्चे पर, उन पर अलग अलग लिखने का इरादा भी है।

फिलहाल अनकही बातों का सैलाब इतना घनघोर है कि लिखी नहीं जा सकती सारी बातें।

कही भी नहीं जा सकती।

हम शर्टकट बतौर लिखे के साथ-साथ अब अंग्रेजी में वीडियों भी जारी कर रहे हैं ताकि देश दुनिया को जोड़ा जा सके।

हम इंटरनेट आने पर मैदान में गुगल के आने से पहले तक लगातार अंग्रेजी में लिखते रहे हैं। यह भी दुस्साहस था लेकिन एक पाठक वर्ग तैयार हो गया।

मुश्किल यह था कि आम हिंदुस्तानी को कैसे संबोधित किया जाये। हमारे सहकर्मी इतिहासकार डा.मांधाता सिंह ने लगभग कोंच-कोंचकर हमसे हिंदी में लिखवाना शुरू किया।

अविनाश ने एक जबरदस्त प्रोफाइल बना डाला जो अब भी चल रहा है। हमारे साथी और तराई निवासी जगमोहन फुटेला ने लगातार हमें छापना शुरु किया अंग्रेजी और हिंदी में। जर्नलिस्ट डाट काम में।

शुरु में तो हिंदी लिखने में भारी गलतियां हो जाती थीं।

अविनाश को तो बाकायदा गलत वर्तनियों की सफाई साथ लगानी होती थी। तबसे गुगल बाबा की महिमा से हम बिना तकनीक दक्ष हुए अपना संबोधन तब से जारी रखे हुए हैं।

हिंदी या अंग्रेजी या बांग्ला या भोजपुरी या मराठी हम अब भी विशुद्ध लिख नहीं पाते। फिरभी लिखते हैं। अपने सोरकार के लिए लिखते हैं।

हस्तक्षेप जब से शुरू हुआ, तबसे हम तमाम साथियों को गोलबंद करने में लगे हुए हैं।

हर हालत में रीयल टाइम में जनसुनवाई जारी रखना चाहते हैं और जैसे नागरिक और मानवाधिकार हम किसी भी सूरत में निलंबित नहीं चाहते, वैसे ही खुले लब पर हम तमाम मुद्दों और मसलों को देश दुनिया के सामने लाने की हर चंद कोशिश बिना संसाधन कर रहे हैं। बिना किसी मदद के। सिर्फ मदद की गुहार लगा रहे हैं।

जितनी सामग्री हम टांग पाते हैं, उसके मुकाबले दस गुणा सामग्री रोज छूट जाती है।

बांग्लादेश और नेपाल से भी धुँआधार फीडबैक लगातार आ रहा है। बाकी दुनिया से भी अबाध सूचना प्रवाह है अबाध पूंजी प्रवाह के मुकाबले। हमारे पास संसाधन नहीं है।

लोग हैं तो हम उनके लिए कुछ नहीं कर सकते और उन्हें भी घर चलाना होता है। हम उन्हें घेर भी नहीं सकते।

अमलेंदु अमूमन भाषा वर्तनी वगैरह ठीक ठाक कर लेते हैं यथासंभव। अक्सरहां मुद्दों और मसलों को तत्काल संबोधित करने के लिए अकेले यह कर पाना मुश्किल हो जाता है।

अक्सर मैं लिखने के बाद फिर दोबारा देखे बिना पोस्ट करके अमलेंदु को कह देता हूं कि देख लेना।

हमारी प्राथमिकता न रक्त की विशुद्धता है और न भाषा की विशुद्धता है।

हम इंसानियत की दास्तां पेश कर रहे हैं।

हम लहूलुहान दिलोदिमाग का अफसाना जस का तस लगा रहे हैं।

यह सारी सफाई इसलिए कि सुधीर जी की अदक्ष टाइपिंग से आप यह न समझें कि उन्हें वर्तनी की कोई तमीज नहीं है।

बेहतर हो कि उनकी तमाम किताबें पढ़ लें।

यह हमारी खामी है कि वीरेनदा की चरचा जारी रखने के लिए मने उनका संस्मरण जस का तस टांग दिया क्योंकि उसकी फौरी प्रासंगिकता भाषा की शुद्धता के मुकाबले ज्यादा भारी है।

हमारे पाठक विद्वतजन हैं और हम जब भाषा और वर्तनी में चूक जाते हैं तो हम उम्मीद करते हैं कि वे सुधारकर पढ़ लेंगे और जो लिखा, जैसे लिखा है, उसे कला कौशल के आरपार, लिफाफे पर नहीं, मजमूं पर गौर करेंगे तो हम लगातार तुरंते ऐसी तमाम सामग्री आपको पहुंचाने का दुस्साहस करते रह सकते हैं।

आप हस्तक्षेप पर लगा यह संस्मरण पढ़ें जरूर और लगातार पढ़ते रहे हस्तक्षेप क्योंकि विशुद्धता के झंडेवरदार जो कर रहे हैं, उसका पर्दाफाश हम लगातार हस्तक्षेप पर रीयल टाइम में कर रहे हैं।

फुटेला कोमा में जाने के बाद लगता है हमारे साथी एक एक कर कोमा में जा रहे हैं।

हम भी जा सकते हैं।

फिलहाल हम कोमा में नहीं है।

सुधीर जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हमारा वीडियो भी देख लें साथ साथ।

वीरेनदा पर हमने खास लिखा नहीं है लेकिन उनके अवसान पर हमने उन्हें जैसे याद किया, उसका वीडियो भी देख लें साथ साथ।

फिर पढ़े सुधीर जी का यह संस्मरण।

वीरेनदा आपको अपने बीच खड़े मिलेंगे उसी खिलंदड़ बेपरवाह अंदाज में हमेशा हमेशा सक्रिय!

शहर को बड़ा बनाती है वीरेन डंगवाल की कविता

पलाश विश्वास

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