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परिवारी समाजवाद

विष्णु प्रभाकर उपाध्याय
1989 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने काँग्रेस के खिलाफ बिगुल फूँका तो मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में वीपी सिंह के सिपहसालार के तौर पर नमूदार हुए और देखते ही देखते उत्तर प्रदेश की रजनिति के नायक बन गए। जनता दल के टूटने के बाद मुलायम सिंह यादव समाजवादी जनता पार्टी के साथ हो लिये। परन्तु 1992 में सजपा से अलग होकर लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में पूर्व मंत्री रामशरण दास, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. जनेश्वर मिश्र, बेनी प्रसाद वर्मा सहित कई विख्यात नेताओं की मौजूदगी में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन किया। रामशरण दास को सपा का प्रदेश अध्यक्ष और मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। मुलायम सिंह यादव ने कहा समाजवाद, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र को पार्टी अपना आदर्श मानते हुये डॉ. लोहिया के आदर्शो को पुनर्जीवित करेगी। मुलायम सिंह यादव ने खुद को मुसलमानों का हिमायती कहते हुये कहा कि केवल समाजवादी पार्टी ही भाजपा के नेतृत्व वाली हिन्दू अतिवादी संगठन से लड़ने में समर्थ है। इस तरह यादव और मुसलमानों का पूरा समर्थन सपा को मिला। 11वीं, 12वीं, 13वीं, 14वीं और 15वीं लोकसभा चुनावों में 17 सूत्रीय घोषणा जिसमें सूबे की बेरोजगारी दूर करने, किसानों को उनकी उपज का वास्तविक मूल्य दिलाने, किसान पेंशन योजना लागू करने, दलित और अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने, नई आर्थिक नीति लागू करने और पांच साल के भीतर देश को विदेशी कर्ज से मुक्त करना इत्यादि था। 14वीं लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के 80 सीटों में से सपा को 36 सीटें मिली और साथ ही यादव और मुसलमानों का एक बड़ा तबका उनके साथ हो लिया है इसका सबूत मिला। मुलायम सिंह यादव को जब उत्तर प्रदेश की सत्ता मिली तो उन्होंने अल्पसंख्यकों के वोटों के बदले कुछ उर्दू अनुवादकों और कुछ हज़ार उर्दू अनुवादकों की नियुक्ति की तथा सरकारी विभागों में अफसरों के नाम उर्दू में भी लिखे जाने की अनिवार्यता मिली। मुलायम सिंह यादव को तीन बार सूबे की सत्ता की बागडोर मिली लेकिन मुलायम भूल गये कि उन्होंने जनता के सामने 5 नवम्बर 1992 में क्या कहा था और उनमें तेजी से बदलाव आया। समाजवाद की जगह गुंडाराज कायम हो गया जिनको बढ़ावा देने में मुलायम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव और बेटे अखिलेश यादव ने अहम् भूमिका निभाई। गुंडई के साथ समाजवादी पार्टी ने जातिवाद को भी बढ़ावा दिया जिसकी पहचान आज यादवों की पार्टी बनकर रह गयी है। मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी में साक्षी महाराज, राजा भैया, अतीक अहमद इत्यादि अपराधी पृष्ठभूमि वालों को सम्मान दिया जिसके कारण बेनी प्रसाद वर्मा, रशीद मसूद, राज बब्बर आदि ने उनसे दूरी बना ली। बाद में अमर सिंह भी बागी हो लिये और लोकमंच का गठन किये। अगर इस समय हम समाजवादी पार्टी को देखें तो मुलायम सिंह यादव को समाजवादी न कहकर परिवारवादी कहे तो ज्यादा बेहतर होगा। मुलायम सिंह यादव जिनके कारण अखिलेश यादव, रामगोपाल यादव, शिवपाल सिंह यादव, डिंपल यादव, धर्मेन्द्र यादव राजनीति में हैं। मुलायम के शासन में सैफई के विकास हेतु सरे द्वार खोल दिये। समय- समय पर रंगीन और हसीन बनाने की परंपरा की शुरुआत की जो परंपरा आज भी उनके बेटे अखिलेश यादव की सरकार में कायम है। अंत में अगर कहें कि मुलायम सिंह यादव जिन्होंने तथाकथित समाजवाद का नारा देकर राजनीति चमकाई थी, उन्हें आज परिवारवाद और गुंडाराज ने जकड लिया है। कल वो जिन अल्पसंख्यकों के हिमायती थे उनका हाल जो मुजफ्फरनगर में क्या हुआ। जहाँ बच्चे भूख और ठण्ड से ठिठुरकर मर रहे थे वहीं वो सैफई में बैठकर करोड़ों खर्चकर बम्बई की चकाचौंध से मनपसंद अदाकाराओ को बुलाकर सैफई की शाम हसीं और रंगीन करने में लगे थे। शायद उन्हें पता नहीं कि राजनीति में दिन फिरते समय नहीं लगता। सूबे की जिस जनता ने उन्हें कुर्सी तक पहुँचाया वही जनता लोकसभा में धल भी चटाएगी।

विष्णु प्रभाकर उपाध्याय, छात्र राजनीति में सक्रिय हैं।

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