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पर्यावरण बचाने के लिये आन्दोलन पर उतरे किसान

(जनादेश न्यूज़ नेटवर्क)
सिंगरौली। सोनांचल का यह अंचल फिर गरमा रहा है। अब पर्यावरण बचाने के लिये किसान सडक पर उतर आए है। सिंगरौली जिले के गोरबी-बरगवां मार्ग पर कसर गेट से करीब कोस भर आगे स्थित त्रिमुला ईण्डस्ट्रीज़ के आस-पास रहने वाले 12 गाँव के किसान इस कंपनी की वजह से फ़ैल रहे प्रदूषण से परेशान हैं। इसे लेकर वे लगातार सवाल उठाते रहे हैं पर पिछले कई वर्षों से लगातार होती बातचीत के नाकाम होने के बाद अब किसान आर पार की लड़ाई का मन बना चुके हैं। पच्चीस फरवरी को सुबह 11 बजे सैकडो किसानों ने त्रिमुला इण्डस्ट्रीज़़ के गेट पर पहुँच कर कम्पनी प्रबन्धन के सामने पाँच सूत्रीय माँगें रखीं। प्रबन्धन के तरफ से कोई पहल न होती देख किसानों ने कम्पनी के गेट पर ताला जड़ दिया, जिससे कम्पनी का काम बन्द हो गया।
  त्रिमुला इण्डस्ट्रीज़़ में सिंगरौली व सोनभद्र जिले से लोहे का कबाड़ इकट्ठा करा कर गलाया जाता है, जिसके बाद इससे लोहे के कई किस्म के सामान तैयार किये जाते हैं। वित्तीय वर्ष 2012-13 के कम्पनी के रिपोर्ट के मुताबिक, कम्पनी का वार्षिक लेन-देन लगभग 800 करोड़ रूपये का है। प्रदूषण के अलावा, समय-समय पर, इस एक परिवार द्वारा संचालित कम्पनी पर ढेरों आरोप लगते रहें हैं। इनमें संगठित तौर पर इलाके भर में कबाड़ चोरी करना, किसानों को डरा-धमका कर उनकी जमीने हथियाना, अवैध कब्जे करना, श्रम कानूनों का उलंघन आदि कुछ संगीन मामले हैं जिनमें कम्पनी को कई बार जाँच का सामना भी करना पड़ा है। यह बात दीगर है कि प्रशासनिक सांठ-गांठ और केन्द्रीय नेतृत्व व राज्य सरकार की खुलेआम मद्दद से, कोई भी जांच अब तक मुकम्मल नतीजे तक नहीं पहुच सकी है।
  बहरहाल, मेन गेट पर तालाबंदी के बाद कम्पनी प्रबन्धन हरकत में आया और जिला प्रशासन की मध्यस्थता मे वार्ता की पेशकश रखी। शाम छह बजे तक तीन बार बातचीत के नाकाम होने पर प्रशासनिक गुण्डागर्दी के बल पर कम्पनी प्रबन्धन ने गेट का ताला तो तुड़वा लिया, जिससे नाराज़् होकर किसानों ने तत्काल ‘ प्रदूषण मुक्ति मंच ‘ का ऐलान करते हुये अनिश्चितकालीन अनशन की घोषणा कर दी। अम्बरीश देव पाण्डेय, नईम खॅान, पप्पू सिंह, मैनू खान (सभी किसान), संजय नामदेव व रंजन चौधरी (ऊर्जांचल विस्थापित कामगार यूनियन) ने अनिश्चितकालीन अनशन तत्काल प्रारम्भ करते हुये आन्दोलन को और तेज करने की घोषणा कर दी। मौके पर उपस्थित उर्जांचल विस्थापित कामगार यूनियन ,लोकविद्या जन आन्दोलन और किसान, आदिवासी, विस्थापित एकता मंच के कार्यकर्ताओं ने आन्दोलन को बिना किसी शर्त के समर्थन देने की घोषणा की और किसानों के इस आन्दोलन को हरसम्भव तरीके से मजबूत बनाने का आहवान किया। अब यह आन्दोलन लंबा चलेगा।
प्रदूषण की स्थिति
  मौके पर उपस्थित रमपुरवा, समदा, पड़री, कसर, सालन, भलूआ, बस्तौली, बड़ोखड़, सेमुआर, गन्दवली तथा गोरबी तक के गांवों के किसानों ने जिन हालात की जानकारी दी वह भयावह है। पिछले वर्ष, 2013 में मप्र राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इलाके भर की मिट्टी की उर्वरता पर पडते असर की जांच की और पाया कि उर्वरता लगभग नष्ट हो चुकी है। गाँव के लोगो ने दिखाया कि किस प्रकार उनके भोजन और पीने के पानी, ढके रहने के बावजूद एक काली परत से पटे रहते है। गाँव के बुजुर्गों ने बताया कि उनके गाँव मौसमी फलों व सब्जियों से भरे पूरे रहते थे, आज इस प्रदूषण के कारण पेड़ों पर फल नहीं लगते, बच्चे आम, अमरूद जैसे फल खाने को तरस जाते हैं।
गाँव के युवा व अनशनकारी नईम खान ने बताया कि हमारे गाँव में सरसो के फूल पीले नहीं काले दिखते हैं, गेहूँ के खेत काटते समय महिलायें कपड़ो व शरीर में कालिख पुती हुई आती हैं। गाँव के लोगों ने बताया कि उन्हें याद नहीं कितने वर्ष हो गये थूकने पर थूक भी काली ही निकलती है। गाँव के कई कुओं का पानी, पीने तो दूर नहाने लायक भी नहीं रह गया है। इतनी तेज आवाज आती है कि पास बैठे दो लोग आपस में बात नहीं कर सकते, इशारों से काम चलाना पड़ता है। कई लोग इस वजह से बहरेपन के शिकार हो गये हैं। गाँव के किनारे कहीं भी राख भरे कचड़े का ढेर गिरा देतें है जो उड़ कर हमारे भोजन, पानी, खेतो, मवेशियों के चारों में पडता है, गाँव के कई मवेशी इसके चलते मर गये हैं, गोंदवाली गाँव के समला टोला में तो एक भी मवेशी अब जीवित नहीं रहा। यही हाल गाँव रमपुरवा का भी है। सफेद गाय भी यहाँ काली दिखती है। महिलाओं के गर्भ असमय गिर रहें है। अब इस सवाल को लेकर किसान बड़े आन्दोलन के मूड में हैं। इस आन्दोलन को क्षेत्रीय संगठनों, ट्रेड यूनियनों व राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन हासिल हो रहा है जिससे यह मुद्दा तूल पकड़ सकता है।

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