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पहले तय कर लिया जाये कि मोदी को रोकना है या केजरीवाल को

संघी हिदू राष्ट्र का एजेण्डा कोई गोपनीय नहीं है, वह अब मुकम्मल खतरा है
धर्मोन्माद उत्तर आधुनिक मुक्त बाजार का सबसे मजबूत हथियार है
पलाश विश्वास
दोस्तों, पहले ही साफ कर दूँ, जैसा हमेशा मैं कहता आ रहा हूँ कि आम आदमी पार्टी से मेरा कोई लेना देना नहीं है। न मैं उनका या किसी राजनीतिक दल का समर्थक हूँ।
मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आगामी लोकसभा चुनावों के लिये निर्माणाधीन जनादेश को लेकर भी हमारी चिंता नहीं है। इसे थोड़ी गहराई में जाकर समझें। हमें दरअसल चुनाव के बाद धर्मोन्मादी भारत में जो निरंकुश राज्यतन्त्र का नरमेध अभियान जारी होना है विकास के नाम पर, उसकी चिंता है। उस आसन्न भविष्य की चिंता हैं।
हम अरविंद केजरीवाल और उनकी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ दागे जा रहे सवालों का जवाब नहीं देंगे। इनमें से अनेक सवाल हमारे भी हैं और अनिश्चित नमोमय भारत के माहौल में मैंने उनपर खुलकर लिखा भी है। कृपया मेरे ब्लाग देख लें और उन्हें खोलने में दिक्कत हो तो हस्तक्षेप पर लगे आप पर मेरे पुराने आलेख देख लें। मैं न अरविंद का और न आप का कोई प्रवक्ता हूँ न टिकट पर मेरा कोई दावा है। शुरुआती आकलन के बाद लगातार तेज होती नमो सुनामी में हमें अपनी प्राथमिकता बदलनी पड़ी है। ऐसा सिर्फ मेरे लिये नहीं है, परिस्थितियों पर तीखी नजर रखने वाले अनेक जनप्रतिबद्ध साथियों का आकलन बदल गया है।
दिल्ली में एफडीआई रद्द होने से पहले खास आदमी की पार्टी आप के पीछे मजबूती से खड़ा था कॉरपोरेट इंडिया। उसके बाद कॉरपोरेट राज के खिलाफ जो अरविंद के धुंआधार प्रहार हो रहे हैं, उनके किसी भी सूरत में अब कॉरपोरेट विकल्प बनने के आसार नहीं हैं। बनेंगे तो उनकी साख जाती रहेगी। वे शेर पर सवार हो चुके हैं और शेर की पीठ से जिसदिन उतरेंगे, शेर उन्हें खा लेगा। होगा विश्व बैंक का प्रोजेक्ट, लेकिन बताइये कौन सी सरकार बनी है सन 1991 के बाद वह कौन सी सरकार बनी है, जो विश्वबैंक का प्रोजेक्ट नही है। रंग बिरंगी तमाम अल्पमत सरकारों के संचालक कॉरपोरेट असंवैधानिक तत्व ही हैं। यहाँ तक कि बंगाल में परिवर्तन के बाद माँ माटी मानुष की सरकार आदिम कॉरपोरेट मसीहा सैम पित्रोदा हैं। मौजूदा प्रधानमंत्री से लेकर महामहिम राष्ट्रपति तक तमाम नीति निर्धारक, अर्थशास्त्री विश्व बैंक, आईएमएफ, यूनेस्को आदि घनघोर जायनवादी अमेरिकी संस्थानों के वेतनभोगी कारिंदे हैं। विनिवेश महायज्ञ के प्रथम पुरोहित अरुण शौरी भी विश्व बैंक से आये थे।
फोर्ड फाउंडेशन से पुरस्कृत राजनीति, साहित्य, कला क्षेत्र के तमाम महामहिम हैं। यहाँ तक कि राथचाइल्डस और राकफेलर के कारिंदे भी खूब हैं।
फिर सीआईए के एजेन्ट कौन हैं और कौन नहीं, भारतीय राजनीति में इसका कोई हिसाब उस तरह नहीं है, जैसे काला धन का लेखा-जोखा। पूर्व प्रधानमंत्री से लेकर राजनेता, मजदूर नेता और तमाम भ्रान्तियों के रथी महारथी सीआईए के एजेन्ट रहे हैं।
मौजूदा राज्यतन्त्र वर्ण वर्चस्वी, वर्ग वर्चस्वी, नस्ल वर्चस्वी व्यवस्था है, उसमें बदलाव अनिवार्य है और उसके बिना कोई बदलाव सम्भव नहीं है। समता, सामाजिक न्याय और डायवर्सिटी के लक्ष्य भी राज्यतन्त्र में बदलाव के बिना असम्भव है।
हम अपने बहुजन मसीहों की तर्ज पर ग्लोबीकरण को स्वर्णकाल भी नहीं मानते। हम यह भी मानते हैं कि यह पूँजीवादी तन्त्र भी नहीं है। यह क्रोनी कैपिटेलिस्ट साम्राज्यवाद है और आवारा पूँजी अर्थ व्यवस्था, राजकाज, समाज, संस्कृति, साहित्य, पत्रकारिता, उत्पादन प्रणाली पर काबिज है। साम्राज्यवादी वैश्विक शैतानी व्यवस्था का यह उपनिवेश हैं जहाँ सत्ता वर्ग सिरे से सामंती है। भ्रष्ट भी।
 इसके साथ ही यह भी समझना जरुरी है कि धर्मोन्माद उत्तर आधुनिक मुक्त बाजार का सबसे मजबूत हथियार है। इस सिलसिले में मैं हमेशा भारत में हरित क्रांति, भोपाल गैस त्रासदी, सिखों के जनसंहार, बाबरी विध्वंस और गुजरात नरसंहार जैसी घटनाओं को निर्णायक मानता रहा हूँ।
अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की पूँजी धर्मोन्माद नहीं है फिलहाल, जबकि बाकी विकल्प नख से शिख तक धर्मोन्मादी हैं।
हम दरअसल न अरविंद को देख रहे हैं और न आप में शामिल तमाम खास चेहरों को। हमारी नजर सामाजिक शक्तियों, उत्पादक शक्तियों के तेज ध्रुवीकरण पर है, जो अस्मिता तिलिस्म में कैद भारतीय समाज और भारतीय राजनीति में बदलाव की आखिरी उम्मीद है। हमें यानि जनपक्षधर मोर्चा और लाल नीले दोनों तबकों को समझ लेना चाहिए कि परिवर्तन की हर घड़ी पर धर्मोन्मादी तत्वों ने ही विजय पताका फहराया है।
मसलन सत्तर का दशक है। नक्सलवादी जनविद्रोह, तेलंगना, श्रीकाकुलम और ढिमरी ब्लाक ही नहीं, आजाद भारत में तेभागा और खाद्य आंदोलन जैसे जनांदोलनों से लेकर पराधीन भारत के तमाम आदिवासी किसान विद्रोह की विरासत की सम्पूर्ण भ्रान्ति में तिलांजलि हो गयी। अब जन युद्ध जंगल में सीमाबद्ध है। खेत खलिहान तबाह हैं। कृषि की हत्या हो गयी। जल जंगल जमीन से लेकर नागरिकता, पर्यावरण और मानवाधिकारों से बेदखली का पूरा कारोबार धर्मोन्मादी छाते के अन्दर हो रहा है। सामाजिक और उत्पादक शक्तियाँ, किसान और मजदूर केशरिया में सरोबार है। अंबेडकरी आंदोलन मलाईदार तबके के हितों के मुताबिक सत्ता की चाबी में तब्दील है और बहिष्कृत बहुसंख्य तमाम समुदाय धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की पैदल सेनाएं हैं। तो वामपक्ष भी संसदीय राजनीति के तहत दक्षिणपंथ में एकाकार है, जिसकी वजह से बंगाल में वाम पतन हो गया और बाकी देश में वाम का नामोनिशान बचा है तो सिर्फ केरल और त्रिपुरा में। उत्तर भारत में, हिमालयी क्षेत्र और पूर्वोत्तर में, कश्मीर और तमिलनाडु में कहीं भी वाम नहीं है।
सामाजिक व उत्पादक शक्तियों के गठजोड़ से सन सैंतालीस से सन 1952 तक मुख्य विपक्षा बने रहे वाम दलों की इस दुर्गति के पीछे वर्ण वर्चस्वी वर्ग वर्चस्वी नस्ल वर्चस्वी वाम नेतृत्व है, जिसने उत्तर भारत में वाम नेतृत्व को कुचलकर रख दिया और सत्ता की राजनीति में हमेशा दलाली करते रह गये। जनाधार बनाने के लिये आंदोलन की बजाय सत्ता समीकरण साधने का लाल नीला रिवाज सत्तर के दशक की भ्रान्तियों की उपज है।

सही मायने में अब न लाल है और न नील। लाल नील सब कुछ अब केशरिया है।
जनादेश बनाने में कॉरपोरेट, मीडिया और सम्राज्यवादी अति सक्रियता के मुखातिब राष्ट्र और जन गण के सामने जो मुख्य चुनौती है, आप मानें या न मानें वह यह सर्वव्यापी केशरिया है। अपढ़ लोगों की क्या कहें, पढ़े लिखे तकनीक समृद्ध नवधनाढ्य उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग बाजार में अतिरिक्त क्रयशक्ति हासिल करने की अंधी दौड़ में इस केशरिया तूफान की बुनियाद बने हुये हैं। सूचना क्रांति के कॉरपोरेट चरित्र और मीडिया विस्फोट से दरअसल सूचना निषेध नहीं है, सम्पूर्ण भ्रान्ति में उलझे लाल नील पक्षों के आत्मघात से संघ परिवार के हिंदुत्व एजेण्डा मुताबिक भारतीय मीडिया अब सर्वत्र वर्ण वर्चस्वी,वर्ग वर्चस्वी और नस्ल वर्चस्वी है। सारस्वत मीडिया प्रमुखों की यह फौज तब जनतादल सरकार में पहली बार सूचना प्रसारण मंत्री बने लालकृष्ण आडवाणी ने तैयार की। कमण्डल अभियान, मण्डल के बहाने जो जो शुरु हुआ,उसमें भी इस केशरिया खेसड़िया जहरीले ब्रिगेड का बड़ा योगदान है। आडवाणी को रामरथी बतौर पहचाना जाता है, लेकिन हिन्दू राष्ट्र के माफिक केशरिया आत्मघाती मीडिया दस्ते के वे जनक हैं और उनका यह  योगदान सैम पित्रोदा से कहीं ज्यादा निर्णायक हैं। मीडिया के प्रबंधकों की क्या कहें, जो पैदल सेनाएं हैं, उन्हें भी अपने पाँवों पर कुल्हाड़ी मारने से कोई परहेज नहीं है। अटल सरकार के जमाने में बछावत आयोग का महापाप ढोते हुये अधिकांश पत्रकार शार्टकाट से राजनीतिक अनुकम्पा के मार्फत अपना वजूद बहाल रखने में मजबूर है।
बछावत मार्फत जो वेतनमान बना वह मानवाधिकार का सरासर हनन है। देश में जब केंद्र और राज्यों के वेतनमान समान हैं, सेना में जब एक रैंक के लिये समान वेतनमान है तो न्याय के किस सिद्धांत के तहत एक ही संस्थान के अलग अलग केंद्रों में एक ही पद पर अलग-अलग वेतन मान है, बताइये। महज एक दफा सत्ता में आकर पत्रकारिता को कूकूर जमात में तब्दील करने वाले पेडन्यूज संस्कृति के लोग जब सत्ता में मुकम्मल तौर पर आयेंगे, तो मीडिया और अभिव्यक्ति, सूचना के अधिकार का क्या होगा, इसका अंदाज हो या न हो, मीडिया के लोग देश को केशरिया बनाने में रात दिन सातों दिन बारह मास चौबीसों घंटे एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। और तो और, सोशल मीडिया भी पीछे नहीं है।
यह सब इसलिये हुआ कि सामाजिक शक्तियों और उत्पादक शक्तियों को संबोधित करने में हमारी भारी चूक हो गयी। छात्रों युवाजनों और स्त्रियों का सत्तर दशक हमारे हाथों से फिसल गया और हम विचारधारा की जुगाली करते रहे। सामाजिक यथार्थ और वस्तुगत परिस्थितियों के मुताबिक नीतियों के साथ रणनीति बनाने औऱ अमल में लाने वाला कोई नेतृत्व जनपक्षधर मोर्चे में सिरे से अनुपस्थित रहा।
आज हम आप के बहाने मौजूदा तन्त्र से बुरी तरह नाराज आम लोगों की गोलबंदी को देख नहीं रहे हैं। देख रहे हैं तो अरविंद केजरीवाल और आप में शामिल तमाम खास चेहरों को।
माफ कीजियेगा, हम तो अरविंद के सवालों के बजाय देख रहे थे कि पूरे गुजरात में हाशिये पर खड़े तमाम लोग कैसे भय को तोड़कर सड़कों पर उतर आये। कच्छ में अनुसूचित जनजातियों को असंवैधानिक तरीके से पिछड़ी जातियों में बदलकर अनुसूचित क्षेत्र का दायरा तोड़कर जिस निरंकुश तरीके से भूमि अधिग्रहण हुआ और गुजरात के बाकी हिस्सों में सरकार प्रापर्टी डीलर में तब्दील हो गयी, उसका नजारा हमने भी कच्छ के रण में नमकीन हवाओं की सुगंध में महसूस किया है। इसके विरुद्ध जो जनाक्रोश की आँच है, उसको महसूसने की जरूरत है।
हम उत्तराखण्ड से हैं और उत्तर भारत के किसान समाज में हमारी जड़ें हैं, जहाँ कभी अत्यंत शक्तिशाली किसानसभा जिसके नेता और ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह के नेता भी मेरे दिवंगत पिता पुलिन बाबू थे और जिस किसान आंदोलन को हम चरण सिंह से लेकर महेंद्र सिंह टिकैत के हाथों सत्ता समीकरण के दक्षिणपंथ में बदलते देखा है, वहाँ भी किसानों में नयी हलचल महसूस की जा रही है। बदलाव के ये तत्व ही निर्णायक हैं न कि कारपोरट जनादेश और सत्ता समीकरण। हम दरअसल आप के मंच को घेरे उमड़ती हुयी भीड़ में अपने लोगों को देख रहे हैं, आंदोलनकारियों की फौज को देख रहे हैं, जिनसे नरंतर संवाद की जरूरत महसूस कर रहे हैं।
संघी हिदू राष्ट्र का एजेण्डा कोई गोपनीय नहीं है, वह अब मुकम्मल खतरा है और उसका ही निरंकुश चेहरा संघ भाजपी व्यापी नरेंद्र मोदी हैं। सबसे खतरनाक बात तो यह है कि संघ ने अपने लोकतांत्रिक उदार मुखौटों का भी परित्याग कर दिया है। अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो राजनीति और राजनय में अविराम कुशल संवाद के पैमाना भी है। भाजपा और संघ तमाम हिंदुत्व नेताओं औरयहाँ तक कि सरदार पटेल की हिंदुत्व वादी मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा को तत्पर  है।
कोई भी कहीं भी वाजपेयी का भूलकर उल्लेख नहीं कर रहा है।
संसद में सबसे अच्छी वक्ता सुषमा स्वराज, कुशल प्रवक्ता अरुण जेटली, कट्टर संघी मुरली मनोहर जोशी से लेकर रामरथी कमण्डलधारी लाल कृष्ण आडवाणी तक नरेंद्र मोदी के आगे म्लान हैं। हाशिये पर हैं। इसे संघ और भाजपा का संकट समझने की भूल कतई न करें। यह अनागत केशरिया भविष्य का अशनिसंकेत है।
नरेंद्र मोदी सुनामी का सबसे बड़ा खतरा लोकतन्त्र और उदारता का, मानवता और नागरिकता, संविधान, कानून का राज, देश के संघीय ढाँचे का अवसान है।
हम मामूली किसान शरणार्थी परिवार के बेटे हैं। हमारी तुलना में आपकी शिक्षा दीक्षा बेहद उच्च कोटि का है। आपसे विनम्र निवेदन किंतु यही है कि आसन्न केशरिया कयामत की तेज दस्तक को सुनने में भूल न करें, नमोसुनामी कोई परिकल्पना मात्र है तो उसके कार्यान्वयन के आसार भी पूरे हैं।
चूहो की दौड़ भागते जहाजों से हैं और न उन्हें देश की परवाह है और न देसवासियों की। उनकी दृष्टि और हमारी दृष्टि में कोई फर्क नही होना चाहिए।
आज मैने लाल पर लिखा है तो समय-समय पर नील पर भी खूब लिखा है। जिस बहुजन अस्मिता की नींव पर केशरिया तिलिस्म तामीर हो रही हैं, संगमरमरी उस इतिहास के तमाम नीले कारगरों के हाथ भी ताजनिर्मातओं की तरह काट दिये गये हैं या काट दिये जायेंगे।
इसी लिये हमने उनसे सवाल भी किया है कि जाति अस्मिता क्या चीज है कि धोकर पीने से सामाजिक न्याय का लक्ष्य हासिल हो जायेगा।
कृपया उसे भी पढ़े लें। और इस मंतव्य के साथ जोड़कर पढ़ लें।
स‌ाथी अशोक कुमार पांडेय ने फेसबुक वाल पर लिखा हैः

पहले कांग्रेस वाले दुखी थे “आप” से, अब निक्करधारी संघी तो जैसे पगला गये हैं। उनका चले तो केजरीवाल के चड्ढी का ब्राण्ड भी पता करके उसकी आलोचना कर दें। पागलपन की हद यह कि आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह यह सब नाम कमाने के लिये और चुनाव जीतने के लिये कर रहे हैं। तो भैया ये साहेब चाय क्या देश का कुपोषण दूर करने के लिये पी/पिला रहे हैं? उन्होंने सवाल किये हैं और सवाल करना हर नागरिक का हक है, जवाब नहीं है तो गाली गलौज से जनता बेवकूफ नहीं बनेगी।
“आप” को लेकर मेरी असहमतियाँ तीख़ी हैं लेकिन कोई दुश्मनी नहीं। वाम के जो साथी भी आपा खोये दे रहे हैं उन्हें थोड़ा नियंत्रण रख के मुद्दों पर आलोचना और असहमति दर्ज करानी चाहिए। याद रखें “असहमति के साहस के साथ सहमति का विवेक ज़रूरी है।”

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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