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पार्टी पर नहीं जनता की ताकत पर भरोसा करने का समय

वर्गचरित्र लोकतान्त्रिक नहीं है आप का 
सुन्दर लोहिया

हिन्दी में मुहावरा है जैसा बोओगे वैसा काटोगे। अन्ना हज़ारे के आन्दोलन के दौरान केजरीवाल और इनके सहधर्मी कार्यकर्ताओं और नेताओं में जन लोकपाल को तीन दिन में पास करने का अल्टीमेटम देने जैसा अतिवाद था उसका नया रूप सत्तासीन होने के बाद कई तरह से प्रक्ट हुआ है। सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी भी पार्टी का समर्थन लेने से इन्कार शपथ ग्रहण के लिए ऑटोरिक्शा का इस्तेमाल डबलउुप्लेक्स मकान पर बवाल के बाद उसे छोड़ने की घोषणा फिर सरकारी गाड़ियों को लेने या न लेने की दुविधा जैसी ध्यान हटाऊ घटनाओं से पार्टी की छवि पर कछ धूल ज़रूर चढ़ी है। पार्टी को ऐसे विवादों से बचना चाहिए था लेकिन अतिवादी रूझान के कारण वे इसमें डूबते जा रहे हैं। यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते काबू न पाया गया तो इसके बढ़ते प्रभाव से अपने अस्तित्त्व को खतरे में पड़ा हुआ महसूस करने वाले विरोधी ऐसे सवाल खड़ा करके आप के लोकपक्षीय कार्यक्रम को बाधित करनें में कामयाब हो सकते हैं। इस पार्टी का बना रहना भारत में लोकतन्त्र के सशक्तिकरण की दृष्टि से आवश्यक है।

 बिना किसी विज़न के इस पार्टी को लोगों ने जिस तरह से अंगीकार किया है उसका मुख्य कारण यह है कि इसने आम आदमी की लोकतान्न्त्रिक प्रक्रियाओं में राजनीतिक कार्यशैली में घटित हो रहे बदलाव को सत्तापरिवर्तन के बजाय बहुआयामी परिवर्तन की शुरुआत के रूप में देखा है। यह जनता की खुली आँख का सपना है जो टूटना नहीं चाहिए। जिस तरह से इस पार्टी को अपना एजेण्डा तत्काल प्रभाव से लागू करने का दबाव बनाया जा रहा है उससे प्रकट होता हे कि अब तक देश की सत्ता को अपनी बपौती मानने वालों को अपने पांव के नीचे से ज़मीन खिसकती हुई लग रही है। जितना ये दल अपना दबाव बनायेंगे लोगों की सहानुभूति आप पार्टी के साथ उतनी ही बढ़ती जायेगी। साठ पैंसठ साल तक राज करने वाले जो सपने लोगों को दिखाते रहे उन्हें ग्लोबल मंदी के बहाने टालते रहे हैं जबकि उनके अपने वेतन भत्ते जैसी सुविधाओं में लगभग पांच गुना बढ़ोत्तरी के लिए उन हालात को आड़े नहीं आने दिया। इसलिए जब तक आप पार्टी के कथनी और करनी का अंतर सामने नहीं आ जाता तब तक उसे बेवफा तो नहीं माना जा सकता।

यह ठीक है कि इस पार्टी के भीतर भी वैसे ही अंतर्विरोध हैं जो अन्य दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों में व्याप्त हैं लेकिन जब तक वे सामने नहीं आते उनकी उपस्थिति भले ही नज़र आ रही हो, हमें उन्हें सम्भलने और सुधरने का मौका ज़रुर देना पड़ेगा।

कुछ लोगों को लगता है कि इस पार्टी के अस्तित्व में आने के पीछे पूंजीवाद के भीतर उमड़ रहा संकट है जिससे निजात पाने के नज़रिये से नागरिक समाज के बैनर तले इस राजनीतिक संगठन को कारपोरेट सैक्टर के सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है। यह सिद्धान्ततः सही आकलन है लेकिन इसमें एक चूक यह लगती है कि हर प्रकार के परिवर्तन के पीछे व्यवस्थागत संकट होता है यदि व्यवस्था में संकट न हो तो उसे बदलने की ज़रूरत क्यों पड़े? कई बार बदलाव की ज़रूरत व्यवस्था की निजी विवशता भी हो सकती है। लेकिन इस मामले में बदलाव की विवशता व्यवस्थागत हो तब भी बदलाव लाने के लिए जिस लोकशक्ति का उपयोग किया जा रहा है उसे मज़बूत करने की जिम्मेवारी उन लोगों की है जो परिवर्तन में जनभागीदारी का समर्थन करते हैं।

इस बात से कतई इन्कार नहीं किया जा सकता कि आप पार्टी का वर्गचरित्र लोकतान्त्रिक नहीं है। इसलिए लोकतन्त्र को इस्तेमाल करते हुए लोकविरोधी ताकतों के हित साधन की सम्भावनाओं से भी इन्कार नहीं किया जा सकता लेकिन वैज्ञानिक समाजवाद के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की प्रस्थापना की अनदेखी नहीं होनी चाहिए जिसमें विपरीत परिस्थितियां एक साथ उपस्थित होती हैं और क्रान्न्तिकारी ताकतें उनमें से जो प्रगतिशील हो उसका साथ देकर क्रान्किारी परिवर्तन सम्भव बनाते हैं। भारतीय वाम की सबसे बड़ी कमज़ोरी यही रही है कि वह राजनीतिक स्थिति के मूल्यांकन में चूक करता रहा है। एक कारण यह हो सकता है कि वामपंथी नेताओं का नज़रिया व्यक्तिकेन्द्रित रहा है वे जनान्दोलनों का आकलन उनके नेतृत्व के वर्गचरित्र के अनुसार करते रहे हैं। आज़ादी के बाद वामपंथी राजनीति में इन्दिरा गान्धी द्वारा आपातकाल की घोषणा का समर्थन जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन का विरोध से लेकर तीसरे मोर्चे के लिए मुलायमसिंह जैसे पारिवारिक समाजवादी से गठबन्धन के प्रयास इसी नज़रिये के चलते करते आये हैं। आप को लेकर जो दुविधा है उसके पीछे भी यही मानसिकता काम कर रही है। अब यह कहना कि केजरीवाल वामपंथ का कार्यक्रम अपना कर जन समर्थन जुटा रहा है इसलिए तर्कसंगत नहीं लग रहा कि फिर जनता सवाल है कि आप इस जनता का नेतृत्व करने में कैसे चूक गये ? सम्भवतः वामपंथ को जनता की परिवर्तन लाने की क्षमता पर उस तरह का भरोसा नहीं है जैसा वे इन्दिरा गान्धी या मुलायम सिंह की व्यक्तिगत विशेषताओं के कारण करते रहे हैं। जिस सर्वहारा को वे समाजवादी क्रान्ति का हरावल दस्ता मानते हैं उसकी राजनीतिक ताकत पर दुविधा भारतीय वामपंथ की कमज़ोरी है।

देश की राजनीति पर कारपोरेट सैक्टर का बढ़ता हुआ शिकंजा अवश्य चिन्ता का विषय है। यह शिकंजा सभी दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टियों में साफ दिख रहा है। सबसे ज़्यादा कांग्रेस में क्योंकि वह सत्तारूढ़ है इसलिए देश के प्राकृतिक संसाधनों पर  उसका आधिपत्य है। रिलायंस सहित कई कारोबारी धनकुबेर जब कानून की जद में आने लगे तो सब एकस्वर से उनके विरुद्ध किसी प्रकार की कार्रवाई रोकने के लिए लामबन्द हो गये। सरकार अभी तक संविधान की संकल्पना को वास्तविकता में प्रकट कर पाने में कामयाब नहीं हो सकी है जिसमें देश के सभी नागरिकों को कानून की नज़र में एक बराबर बताया गया है। हालांकि नेताओं और अफसरों पर कानून की गाज गिर चुकी है। इसके बावजूद कारपोरेट अब धुर दक्षिणपंथी भाजपा को देश की सत्ता सौम्पने का इरादा रखती है इसलिए नरेन्द्र मोदी की आरती उतारने में जुटी हुई है। देश के प्रमुख संचार माध्यमों पर कारपोरेट का कब्जा़ है इसलिए वहां लोकतन्त्र को तोड़ने की हर साजि़श जो बहस मुबाहिसों के ज़रिये आमआदमी के लिए परोसी जा रही है उसमें आप के उत्थान को केजरीवाल का व्यक्तिगत करिश्मा बता कर जनशक्ति के उभार को पीछे धकेला जा रहा है। मीडिया की यह कोशिश लोकतन्त्र को कमज़ोर करने की मुहिम का हिस्सा है। आप का नेतृत्व राजनीति में नौसिखिया है उसे दुश्मन की चालों का राजनीतिक अर्थ समझने में देर हो जाती है इतने में वे नया बखेड़ा शुरु कर देते हैं। बड़े घर के बजाये छोटे घर में या सरकारी गाड़ी के इस्तेमाल को लेकर जो बवाल खड़े किये जा रहे हैं वे इस बात के प्रमाण हैं कि इस लोकधर्मी राजनीति के प्रयोग में से लोगों की ताकत को अनदेखा कर के व्यक्ति को केन्द्र में रखा जाये। मुद्दों से हटकर मामूली बातों पर बहस चला कर सिद्ध किया जा सके कि इस देश में जनता कुछ कर नहीं सकती। कोई बदलाव ऐासा नहीं जो जनता की उम्मीदों को पूरा कर सके। इसलिए यथास्थिति ही एकमात्र विकल्प है। यह खतरनाक इरादा है इसलिए देशभक्त ताकतों को आप पर लगातार नज़र बनाये रखते हुए उसके लोकतान्त्रिक विचलन को रोकने के लिए इसी जनशक्ति का इस्तेमाल करना होगा।

About the author

सुन्दर लोहिया, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। आपने वर्ष 2013 में अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं। इनका न केवल साहित्य और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है बल्कि वे सामाजिक जीवन में भी इस उम्र में सक्रिय रहते हुए समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं। अपने जीवन के 80 वर्ष पार करने के उपरान्त भी साहित्य और संस्कृति के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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