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पीकू-कितने गमों की भीड़ है इस आदमी के साथ

अगर मैं कोई फिल्म पहले दिन नहीं देखता तो खुद को उस पर समीक्षा लिखने का अधिकारी नहीं समझता हूं, किंतु पीकू इस मामले में अपवाद है। इस पर मैंने इसलिए लिखना चाहा क्योंकि पीकू में दीपिका पादुकोण और अमिताभ बच्चन के अच्छे अभिनय और पटकथा के बारे में विस्तार से बताती समीक्षाओं के अलावा मैंने कोई ऐसी समीक्षा नहीं पढ़ी जो दृश्यों के बीच की अंतर्कथा को इंगित करती हो। किसी शायर का शेर है

बाहर जो देखते हैं, वे समझेंगे किस तरह

कितने गमों की भीड़ है इस आदमी के साथ

‘पीकू’ केवल एक पुराने सनकी विधुर बुड्ढे रईस भास्कर [अमिताभ बच्चन] की कहानी भर नहीं है जो इतना आत्म केन्द्रित और स्वार्थी है कि उसे लगता है कि पूरी दुनिया में उसकी अपनी मामूली बीमारी के अलावा दूसरी कोई समस्या ही नहीं है। उसके कब्ज और उसके उपचार को ही हर समय चर्चा में रहना चहिए भले ही उसकी आर्कीटैक्ट बेटी पीकू [दीपिका पाडुकोण] उस समय अपने महत्वपूर्ण क्लाइंट के साथ जरूरी मीटिंग में व्यस्त हो, या अपने फ्रैंड के साथ डिनर की टेबिल पर बैठी हो, वह लगातार अपने शौच के बारे में बात कर सकता है। एक आम परम्परा के विपरीत इसे वह एक वर्जित या घृणास्पद विषय नहीं मानता अपितु दूसरी बीमारियों की तरह एक ऐसी बीमारी मानता है जो बहुत सारी बीमारियों की जड़ है, और उस पर कहीं भी कभी भी बात की जा सकती है।

पीकू एक प्रेम कथा भी है। जिस तरह से उर्दू के प्रसिद्ध शायर मुनव्वर राना कहते हैं कि क्या जरूरी है कि महबूब कोई युवती ही हो, उनकी महबूब उनकी माँ भी हो सकती है और उन पर भी शे’र कहे जा सकते हैं, उसी तरह फिल्म की नायिका का महबूब उसका विधुर पिता है जिसकी खुशी के लिए वह अपने जीवन की सारी कुर्बानियां कर रही है और आगे भी करने के लिए तैयार है। नारी पुरुष के अधिकारों की समानता के इस युग में पिता की जिम्मेवारी का भार केवल लड़कों पर ही क्यों हो! उसका पिता अपनी लड़की की शादी के खिलाफ है। उसका मानना है कि शादी करके किसी व्यक्ति की जीवन भर की गुलामी क्यों करना, अगर सेक्स एक शारीरिक जरूरत है तो उसकी पूर्ति अस्थायी रूप से किसी पुरुष मित्र से की जा सकती है, जिसकी अनुमति उसने अपनी बेटी को दी हुयी है। इतना ही नहीं अगर कोई शादी का प्रस्ताव भी लड़की के लिए आता है तो वह उससे कह देता है कि लड़की वर्जिन [कुँवारी] नहीं है। इसके समानांतर पीकू की मौसी है जो पुरुषों की गुलामी में न बँध कर तीसरी शादी कर चुकी है, और चाहती है कि पीकू शादी कर ले।

आत्म केन्द्रित भास्कर अपने जीवन से बहुत प्रेम करता है और स्वास्थ के प्रति इतना सचेत है कि उसके लिए एक पूर्णकालिक नौकर है, हर समय बुलाने पर उपस्थित हो सकने वाला फेमिली डाक्टर है। उसका ब्लड प्रैशर, ब्लड सुगर आदि प्रति दिन नापे जाने की व्यवस्थाएं हैं और वह फिर भी अपनी नियमित जाँच करवाता रहता है। वह न केवल मरने से घबराता है अपितु वेंटीलेटर, या ग्लूकोज आदि चढाये जाने की कल्पना भी उसे भयभीत करती है और वह मिलने वालों को ऐसी स्थिति आने से दूर रहने के लिए कहता है। कब्ज से मुक्ति के लिए ढेर सारी दवाएं हमेशा साथ रखने के साथ ही उसको जब भी कोई नुस्खा सुझाया जाता है, उस पर प्रयोग करके देखता है। चाहे वह तुलसी और पुदीने का काढा पीने की बात हो या इंडियन स्टायल से शौचालय में बैठने की सलाह हो। ऐसी ही एक सलाह पर वह अखबारवाले या लाँड्री वाले की साइकिल भी चलाने की कोशिश करके सबको आशंकित करता है।

असली कथा यह है कि वह भले ही दिल्ली में रहता है किंतु उसका दिल कलकता स्थित अपने भव्य पैतृक मकान में अटका हुआ है जहाँ उसका भाई रहता है जो आर्थिक रूप से कमजोर है व भास्कर द्वारा मकान बेचने का फैसला लेने के प्रति आशंकित है। एक प्रापर्टी ब्रोकर चाहता है कि वह मकान बेच दे जिसके लिए उसकी बेटी भी सहमत है किंतु न तो वह खुद और न ही उसका भाई व उसकी पत्नी चाहती है कि पैतृक मकान बिके। फिल्म की मूल थीम यह है कि आदमी की भावनाएं व्यक्ति की देह पर और देह की विकृतियां भावनाओं पर प्रभाव डालती हैं। कथा नायक भास्कर कहता है कि आदमी का इमोशन उसके मोशन से जुड़ा होता है जबकि कहानी इस बात को विपरीत ढंग से सिद्ध करती है कि आदमी का मोशन उसके इमोशंस से जुड़ा रहता है। जब वह अपने पैतृक मकान में पहुँच जाता है और मकान को न बेचे जाने की बात को सबसे मनवा लेता है तो उसकी वर्षों की कब्ज की समस्या हल हो जाती है तथा इस उपलब्धि के साथ ही वह शांति पूर्वक मर जाता है।

इसके समानांतर कथा उस टैक्सी कम्पनी चलाने वाले चौधरी [इरफान] की कथा है जो इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर नौकरी करने के लिए अरब देश गया होता है जहाँ पर गये कर्मचारियों को बाँड भर के काम करना होता है व उनके सार्टिफिकेट व पासपोर्ट जमा करवा लिये जाते हैं। वहाँ से छोड़ कर वह टैक्सी कम्पनी खोलने के लिए मजबूर है तथा उसकी कम्पनी की टैक्सी ही पीकू की कम्पनी में लगी होती है। अपने पिता की सनकों से परेशान पीकू हमेशा आफिस के लिए लेट होती है व जल्दी गाड़ी चलाने का कह कर दुर्घटनाएं आमंत्रित करती है फिर भी दोष ड्राइवरों पर डालती है इसलिए उसके यहाँ जाने में सारे ड्राइवर बचते हैं।

अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री छोड़ कर टैक्सी एजेंसी चलाने वाला चौधरी भी एक ओर तो अपनी इस विवशता पर कुण्ठित है, वहीं दूसरी ओर उसकी तुनुक मिजाज माँ उसके काम में अनावश्यक दखल देती रहती है। उसके घर में भी उसकी बहिन अपने पति को छोड़ कर आयी हुयी है और माँ के कहने पर पति के खिलाफ कार्यवाहियों की योजनाएं बनाती रहती है, जिससे उसके घर में भी तनाव रहता है। जब डाक्टर के हवा पानी बदलने के सुझाव को मानते हुए भास्कर अपने सारे टीमटाम को लेकर सड़क मार्ग से कलकत्ता जाने की योजना बनाता है तो चौधरी की टैक्सी ही मँगाई जाती है किंतु पीकू के परिवार से असंतुष्ट टैक्सी ड्राइवर ठीक समय पर धोखा दे जाता है तो मजबूरन चौधरी को खुद ही गाड़ी लेकर जाना पड़ता है। इस यात्रा में घटित घटनाक्रम से उसे पता चलता है अपने घर की समस्याओं से वह अकेला ही परेशान नहीं है अपितु पीकू, उसके काका आदि सब ही कहीं न कहीं आधे अधूरे हैं। समभाव की यही समझ दोनों के बीच में आकर्षण पैदा करती है। कुल घटनाक्रम पूरी समय फिल्म को रोचक बनाये रखता है। अपने फन में कुशल शिखर के अभिनेताओं ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है, जिससे केवल मनोरंजन के लिए फिल्म देखने वाले दर्शकों को भी निराश नहीं करती।

यह खुशी की बात है कि पिछले दिनों से हिन्दी सिनेमा नकली प्रेम और माफिया कथाओं से बाहर निकला है व समाज में व्याप्त विभिन्न विषयों पर फिल्में बनाने लगा है। यह एक शुभ संकेत है। साहिर के शब्दोंको याद करें तो कह सकते हैं कि- भूख और प्यास से मारी हुयी इस दुनिया में ज़िन्दगी सिर्फ मुहब्बत नहीं कुछ और भी है। अब उम्मीद की जा सकती है कि यथार्थ की ओर कलाओं के बढते कदम जल्दी ही फिल्मों को सामाजिक यथार्थ को सामने रखने वाले गुरुदत्त और राजकपूर के युग को वापिस लाने में सफल होंगे। सिनेमा समाज को सन्देश देने का सबसे सशक्त माध्यम है और ‘रंग दे बसंती’ समेत आमिरखान की कई फिल्मों ने यह काम पहले से शुरू कर दिया है।

वीरेन्द्र जैन

पीकू – फिल्म समीक्षा

पीकू- दृश्यों के पीछे की आधार कथा

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वीरेन्द्र जैन, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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