Home » पूँजीपतियों से 6 लाख करोड़ रुपयों का एनपीए वसूलने के बजाय मोदी नोटबंदी पर क्यों तुले हैं

पूँजीपतियों से 6 लाख करोड़ रुपयों का एनपीए वसूलने के बजाय मोदी नोटबंदी पर क्यों तुले हैं

पूँजीपतियों से 6 लाख करोड़ रुपयों का एनपीए वसूलने के बजाय मोदी नोटबंदी पर क्यों तुले हैं
इस 6 लाख करोड़ रुपयों से क्या किया जा सकता है?
— संजय पराते

वर्ष 1997 में बैंकों का फंसा हुआ क़र्ज़ 47300 करोड़ रूपये था, जो आज रिज़र्व बैंक के अनुसार 12 गुना बढ़कर 5.95 लाख करोड़ रूपया हो गया है. ऐसे कर्जों को बैंकिंग की भाषा में एनपीए कहा जाता है.
नॉन परफार्मिंग एसेट्स – एनपीए, बड़े पूंजीपतियों द्वारा लिया गया एक ऐसा क़र्ज़ होता है, जिसे वे एक निश्चित समय-सीमा में चुकाने से इंकार करते हैं. यदि लिए गए क़र्ज़ के मूलधन या ब्याज सहित किश्त की राशि 90 दिनों में या उससे अधिक दिनों तक नहीं पटाई जाती, तो ऐसे क़र्ज़ की वसूली को संदेहास्पद मानकर उसे एनपीए की श्रेणी में डाल दिया जाता है. इन कर्जों को ‘फंसा हुआ क़र्ज़’ मानकर बैंकों द्वारा फिर वसूली का प्रयास भी नहीं किया जाता – अर्थात पूंजीपतियों के लिए एक तरह की यह ‘अघोषित क़र्ज़ माफ़ी’ बन जाती है. ऐसे कर्जों का भार बैंकों के जमाकर्ताओं, शेयरधारकों और देश के क़रदाताओं को उठाना पड़ता है.
रिज़र्व बैंक के अनुसर बैंकिंग क्षेत्र के कुल बकाया कर्जों का 20-25% ऐसे क़र्ज़ ही हैं, जो फंसे हुए हैं और इसमें 75% से अधिक हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का ही फंसा हुआ है. 1992 में नवउदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद मुक्त बाज़ार प्रणाली अस्तित्व में आने से एनपीए का चलन तेजी से बढ़ा है, क्योंकि चालबाज कार्पोरेट घरनों और बड़े पूंजीपतियों का राजनैतिक प्रभाव और नौकरशाही व बैंक प्रबंधन से सांठगांठ बढ़ी है.
कुछ शीर्ष बैंकों द्वारा माफ़ किया गया फंसा हुआ क़र्ज़ इस प्रकार है :

बैंक का नाम
2015 का एनपीए (करोड़)
पिछले तीन सालों का एनपीए (करोड़)

1.स्टेट बैंक
21313
40084

2.पंजाब नेशनल बैंक
6587
9531

3.इंडियन ओवरसीज बैंक
3131
6247

4.इलाहाबाद बैंक
2109
4243

5.बैंक ऑफ़ बड़ोदा
1564
4884

6.सिंडिकेट बैंक
1527
3849

7.कैनरा बैंक
1472
4598

8.सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया
1386
4442

9.आईडीबीआई
1609

10.यूको बैंक
1401

11.बैंक ऑफ़ इंडिया

4983

12.ओरिएण्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स

3593

योग
40899
81969

 इस तालिका से स्पष्ट है कि मोदी सरकार के आने के बाद एनपीए में तेजी से वृद्धि हुई है. रिज़र्व बैंक के अनुसार सिर्फ 57 लोग इस देश के बैंकों का 85000 करोड़ रुपया दबाये बैठे हैं.
31 दिसम्बर 2015 की स्थिति में कुछ प्रमुख विलफुल डिफाल्टर्स कंपनियां और उनका एनपीए (करोड़ रुपयों में) इस प्रकार था :

ज़ूम डेवलपर्स
2411
रज़ा टेक्सटाइल्स
695

विसम डायमंड एंड ज्वेलरी
2266
एस कुमार नेशनलवाइड
681

फॉरएवर प्रेशियस ज्वेलरी एंड डायमंड
1315
रामसरूप इंडस्ट्रीज
681

डेक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स
1314
एक्सएल इंडस्ट्रीज
652

किंगफिशर एयरलाइन्स
1201
स्ट्रलिंग बायोटेक
657

सूर्या विनायक इंडस्ट्रीज
1102
आरईआई एग्रो
589

बीईटीए नेप्थोल
958
जीलोग सिस्टम्स
565

इंडियन टेक्नोमेक कंपनी
724
रैंक इंडस्ट्रीज
568

इलेक्ट्रोथर्म इंडिया
551
एमबीएस ज्वेलर्स
517

इस एनपीए को वसूलने की बजाये उसने बड़े औद्योगिक घरानों व धनाढ्यों का फरवरी में 2 लाख करोड़ रुपयों का बैंक-क़र्ज़ राईट-ऑफ कर दिया (बट्टे-खाते में डाल दिया). इसमें माल्या जैसे भगोड़े भी शामिल हैं.
एक साधारण भारतीय नागरिक अंकों में 6 लाख करोड़ रूपये शायद ही लिख पायें और यदि उसे बताया जाएं कि इसे लिखने के लिए 6 के बाद बारह शून्य लगाने होंगे, तो शायद उसका दिमाग ही चकरा जाए. लेकिन यदि इसे उसके जीवन से जोड़कर समझाने की कोशिश करें, तो शायद कुछ मदद मिलें. तो 6 लाख करोड़ रूपये कितने होते है? इतने ! :

हमारे देश में कुल 16-17 लाख करोड़ रुपयों की मुद्रा चलन में है. इसके एक-तिहाई से ज्यादा यह राशि होती है, जिसे सरकार यदि सख्ती से वसूल लें, तो कोई बजट घाटा नहीं होगा. हम लाभ के बजट में रहेंगे और जनता को अनावश्यक करों के बोझ से मुक्त किया जा सकता है.
यह राशि रेलवे के संपूर्ण आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक राशि के बराबर है या अगले 20 सालों तक यात्री भाड़ा बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
यह 4 सालों तक हमारे देश की खाद्यान्न सब्सिडी या 8 सालों तक खाद सब्सिडी या 22 सालों तक पेट्रोलियम सब्सिडी की जरूरतों को पूरा कर सकता है.  
अगले 15 सालों तक मनरेगा के लिए बजट जरूरतों को पूरा करने के लिए यह राशि पर्याप्त है.
यह राशि वर्ष ‘16-17 के रक्षा, शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य और सड़क बजट को पूरा कर सकता है.
गांवों से संबंधित जरूरतों – कृषि, पेयजल, मध्यान्ह भोजन, बाल विकास, इंदिरा आवास, सड़क, मनरेगा, शिक्षा – के लिए आवश्यक राशि का तीन सालों तक प्रबंध किया जा सकता है.
इसके दसवें हिस्से से ही किसानों का संपूर्ण बैंकिंग क़र्ज़ माफ़ किया जा सकता है, जबकि पिछले बजट में मोदी सरकार ने 21 लाख करोड़पतियों को करों में छूट दी है.
इससे अगले 33 सालों तक बैंकों की पूंजी-जरूरतों को पूरा किया जा सकता है.
इस राशि से अगले 50 वर्षों तक सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन में इजाफा किया जा सकता है.

तो 6 लाख करोड़ रुपयों का एनपीए वसूलने के बजाये मोदी नोटबंदी के जरिये एक लाख करोड़ रूपये का काला धन निकलने में क्यों लगे हैं?
कारण स्पष्ट है. काले धन के ‘जुमले’ को उन्होंने जिस प्रकार ‘कैशलेस इकॉनोमी’ तक पहुंचाया है, उसमें कार्पोरेटों की बल्ले-बल्ले हैं, तो एनपीए की वसूली में उनकी तबाही छुपी है. और श्रीमान मोदी आम जनता के नहीं, कार्पोरेटों के ही प्रतिनिधि हैं. याद रखिये, यह केवल पिछले कई सालों से जमा एनपीए का ही ‘गणित’ है, कार्पोरेटों को करों में दी जा रही उन छूटों का नहीं, जो हर साल लगभग 6 लाख करोड़ रूपये के हिसाब से दी जा रही है और पिछले एक दशक में 50 लाख करोड़ रुपयों से ज्यादा दी जा चुकी है.     
 

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: