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पूँजीवादी सिस्टम के नए सुल्तान केजरीवाल

अम्बानी की शक्ति और केजरीवाल की भक्ति!!
जगदीश्वर चतुर्वेदी
केजरीवाल का जनलोकपाल बिल पेश न हो सका। इसकी वजह से उनको इस्तीफ़ा नहीं देना चाहिए था। लेकिन वे जल्दी में हैं और सारी लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करके चटपट फ़ैसले लेना चाहते हैं। लोकतंत्र में प्रक्रियाएँ महत्वपूर्ण होती हैं और उनका पालन ज़रूरी है। केजरीवाल की अधीरता उनको बार-बार प्रक्रियाओं के बाहर ले जाती है।
अरविंद केजरीवाल की सरकार को न तो मुकेश अम्बानी ने गिराया न कांग्रेस या भाजपा ने गिराया। किसी ने उनके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं किया था। केजरीवाल की सरकार गिरी उनके सुल्तानी भावबोध के कारण! केजरीवाल ने तय कर लिया था कि वे इस्तीफ़ा देंगे बस वे एक बहाने की तलाश में थे, जनलोकपाल तो बहाना मात्र है ! वे जानते हैं कि मुकेश अम्बानी या गैस के दामों का मसला उनके 18सूत्रों में नहीं है। कांग्रेस उनको 18सूत्रों पर समर्थन दे रही थी जनलोकपाल बिल को केजरीवाल ने संसदीय नियमों और मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए पेश किया, जनता से झूठ बोला कि संविधान में कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत उनको केन्द्र की अनुमति लेनी पड़े। यदि ऐसा ही है तो केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट जाते और कोर्ट से कहते कि हमें केन्द्र सरकार संवैधानिक ढंग से काम नहीं करने दे रही ? पता चल जाता किसकी बात सच है ?
संविधान की व्याख्या अंततः जज तय करेंगे। वक़ील नहीं।
जो नेता अपने को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बाहर रखकर देखता है वह लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। केजरीवाल को पाँच साल के लिए चुना गया था वे चाहते तो पाँच साल मुख्यमंत्री रह सकते थे। लेकिन वे मानकर चल रहे थे कि उनको पाँच साल तो रहना ही नहीं है! कम से कम वे पाँच साल सरकार में रहते तो बिजली के आधे बिल आते और पानी मिलता!! लेकिन यह क्या किया केजरीवाल ने उन्होंने मात्र 48दिन बाद सरकार छोड़ दी !
केजरीवाल को एक बार भी ख़्याल नहीं आया दिल्ली के ग़रीबों और मध्य वर्ग के लोगों का कि उनके जेब पर क्या गुज़रेगी ? क्या वे गारंटी कर सकते हैं कि उनके लिए फ़ैसले बाद में बने रहेंगे ? असल में अब फिर से पुराने ढर्रे पर चीज़ें दौड़ने लगेंगी !
केजरीवाल के सुल्तानी भाव से किसका नुक़सान हुआ? किसकी जेब पर बोझ बढ़ा है ?
अरविंद केजरीवाल जान लें मुकेश अम्बानी के ख़िलाफ़ या किसी मंत्री के ख़िलाफ़ एफआईआर करना कोई महान राजनीतिक कर्म नहीं है। यदि कोई शिकायत है तो एफआईआर हो ही सकती है। लेकिन यह तो बच्चों जैसी हरकत है कि हमने मुकेश अम्बानी के ख़िलाफ़ एफआईआर की है इसीलिए हमारी सरकार के ख़िलाफ़ कांग्रेस-भाजपा एकजुट हो गए ! केजरीवाल को राजनेता के नेता यह कोशिश करनी थी कि ये एक न होते ! लेकिन संविधान की मर्यादाओं को केजरीवाल तोड़ेंगे तो सारे देश के सभी दल उनका विरोध करेंगे!
विरोध करने वाले सभी मुकेश अम्बानी के एजेंट या दलाल नहीं हैं! संविधान तो मुकेश अम्बानी का ग़ुलाम नहीं है! संविधान तो नेताओं और अमीरों से बड़ा है।
अरविंद केजरीवाल का सिस्टम विरोधी बाना एकदम बोगस चीज़ है। केजरीवाल पूँजीवादी व्यवस्था के निकृष्टतम अंशों के अनुदान पर पलता रहा है। उसका पिछला रिकॉर्ड कितना सुन्दर है यह उनको मिलने वाले अनुदान स्रोतों से समझा जा सकता है। तात्कालिक मसलों पर उसकी सक्रियता हम सबको अपील करती है लेकिन उसके पास रेहटोरिक के अलावा कोई गुण नहीं है।
यह सच है कि वह बहुत सुंदर और प्रभावशाली कम्युनिकेटर हैं। लेकिन पूँजीवाद के प्रति उसकी गहरी आस्थाएँ उसके सिस्टम विरोधी रूप की नहीं सिस्टम के नए सुल्तान के रूप को सामने लाती हैं। अन्ना हज़ारे के क्लोन के रूप में अरविंद केजरीवाल को देखें तो समझ में आ जाएगा कि केजरीवाल की दिशा क्या होगी ?
अन्ना ने ममता बनर्जी के लिए प्रचार करने की घोषणा करके साफ़ कर दिया है कि अन्ना के क्लोन किस दिशा में जाएँगे? केजरीवाल की तरह अन्ना हज़ारे भी सिस्टम बदलने का हल्ला मचाते रहे हैं ! फ़िलहाल वे पश्चिम बंगाल के इतिहास की सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना चाहते हैं। पश्चिम बंगाल में सरेआम घूसखोरी और ज़बरन धन वसूली के लोकल से लेकर राज्य स्तर तक के सिस्टम दीदी के आशीर्वाद से चल रहे हैं !
टेरर का आलम है कि कोई भी पुलिस अधिकारी दीदी के कृपापात्र नेता के अपराध की जाँच करना नहीं चाहता। अन्ना और उनके क्लोन, सिस्टम के नए सुल्तान हैं।
अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफ़ा देकर पुनः कांग्रेस के रहमोकरम पर दिल्ली के शासन को छोड़कर किसकी सेवा की है ? केजरीवाल रहते तो कांग्रेस-भाजपा दोनों को हाशिए पर रखते !
लेकिन अब तो कांग्रेस ही कर्ताधर्ता है दिल्ली की !!

इसे कहते हैं प्रच्छन्न कांग्रेस सेवा !!
अरविंद केजरीवाल का दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा कई सवाल छोड़ गया है। उनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जनलोकपाल बिल के दिल्ली विधानसभा में पेश किए जाने को लेकर सोली सोराबजी ने कोई सलाह केजरीवाल को दी थी ? नवभारत टाइम्स में ख़बर है कि सोराबजी ने कहा है कि उन्होंने जनलोकपाल बिल के मसले पर कोई राय आम आदमी पार्टी या केजरीवाल को नहीं दी थी।
सोराबजी ने केजरीवाल को हिदायत दी है कि वे उनके नाम का इस प्रसंग में इस्तेमाल न करें। सोराबजी के बयान का केजरीवाल ने खंडन नहीं किया है। इससे साफ़ है कि केजरीवाल ने देश से सोराबजी के नाम से झूठा बोला साथ ही उनको कलंकित करने की कोशिश की।
नभाटा (15फरवरी 2014) के अनुसार

“सोली सोराबजी का कहना है कि चूंकि उप राज्यपाल ने खुद नियम नहीं बनाया, उन्हें तो बस नियम का पालन करना है। आम आदमी पार्टी सोली सोराबजी के उस बयान को अपने बचाव के लिए इस्तेमाल करती रही है, जिसमें उन्होंने कहा था कि गृह मंत्रालय का पत्र असंवैधानिक है। इसी के आधार पर अरविंद केजरीवाल बिना केंद्र की इजाजत के विधानसभा में बिल पेश करने को सही ठहराते रहे हैं। अब सोली सोराबजी ने उनसे कह दिया है कि अपने कामों को सही ठहराने के लिए मेरी राय का इस्तेमाल न करें। सोली सोराबजी ने साफ कह दिया है कि मैंने कोई राय दी ही नहीं। उन्होंने कहाः मुझे बिल नहीं भेजा गया था। मैंने इसे पढ़ा नहीं। इसलिए न तो मैंने इसके पक्ष में राय दी है न विपक्ष में।”
अरविंद केजरीवाल के दिल्ली शासन संबंधी झूठ की परतें खुलती जा रही हैं। केजरीवाल बार बार हर टीवी चैनल पर कह रहे हैं कि दिल्ली सरकार को कोई भी बिल पास कराने के लिए उपराज्यपाल की स्वीकृति लेना ज़रुरी नहीं था। सवाल यह है यदि ऐसा था तो दिल्ली का वित्तबिल विधानसभा में पेश करने के पहले उप राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए क्यों भेजा गया ? उनकी स्वीकृति के बाद विधानसभा में क्यों पेश किया ? मुख्य सचिव को हटाने के पहले उपराज्यपाल की अनुमति क्यों ली ?
केजरीवाल का बड़ा काम 323 करोड़ रुपये का रिलायंस बिजली कंपनी को तुरंत भुगतान ! इसे कहते हैं अम्बानी की शक्ति और केजरीवाल की भक्ति!!

About the author

जगदीश्वर चतुर्वेदी, लेखक जाने-माने आलोचक, मीडिया विमर्शकार हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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