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पूँजीवाद और भ्रष्टाचार के नये सेवक ‘आप’

विश्व बैंक ड्रीम प्रोजेक्ट का हिस्सा था इण्डिया अगेंस्ट करप्शन
आम आदमी पार्टी वैसी ही है जैसा भारत का आम बजट होता है

केजरीवाल की आर्थिक नीति को परिभाषित करने का काम उद्योगपति करते हैं?
भारत में जहाँ 1500 लोगों पर एक डॉक्टर है वहीं 600 लोगों पर एक एनजीओ काम करती है
सुनील कुमार
आप पार्टी का उदय इण्डिया अगेंस्ट करप्शन से हुआ। भ्रष्टाचार और पारदर्शिता विश्व बैंक का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है। जंतर-मंतर से शुरू हुआ इण्डिया अगेंस्ट करप्शन, विश्व बैंक के इसी ड्रीम प्रोजेक्ट का हिस्सा था। विश्व बैंक किस के लिये काम करता है हम सभी जानते हैं। विश्व बैंक ने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिये ग्लोबल डेवलपमेंट लर्निंग नेटवर्क (जी. डी. एल. एन.) बनाया है, जो विश्व में अपना सम्पर्क बना कर भ्रष्टचार के खिलाफ कार्यक्रम चला रहा है। इसने अभी तक 600 से अधिक भ्रष्टाचार कार्यक्रमों का समर्थन किया है। मई 2011 से जन्तर मन्तर पर शुरू हुआ अन्ना हजारे के आन्दोलन को मीडिया द्वारा लाइव प्रसारण किया गया। मीडिया द्वारा प्रचारित आन्दोलन का असर यह रहा कि जहाँ मई माह में जन्तर-मन्तर पर मुट्ठी भर लोग थे, वहीं रामलीला मैदान में भारी संख्या में लोग पहुँचे। इस भीड़ को देखते हुये इण्डिया अगेंस्ट करप्शन के बीच राजनीतिक पार्टी बनाने को लेकर बहस शुरू हो गयी। जहाँ अरविन्द केजरीवाल का मानना था कि सभी पार्टियों पर हल्ला बोला जाये, वहीं किरण बेदी जैसे लोगों का विचार था कि हमें केवल सत्ताधरी पार्टी पर ही हल्ला बोलना होगा। इस तरह इण्डिया अगेंस्ट करप्शन दो भागों में विभक्त होकर 26 नवम्बर, 2012 को आम आदमी पार्टी (आप) का जन्म हुआ।

‘आप’ पूँजीवाद और बाजारवाद का कभी विरोधी नहीं रहा। वह एक पूँजीपति का विरोध तो करता है, लेकिन दूसरे को सही बताता है। यही कारण रहा कि रिलायंस पर हल्ला बोलने के बावजूद मीडिया में उसे जगह मिलती रही, जो कि और आन्दोलनों को नहीं मिलती है।
बिजली और पानी के मुद्दे पर अरविन्द ने दिल्ली के मुख्यमंत्री का ताज तो पहन लिया लेकिन कुछ दिनों में ही उनको एहसास हो गया कि जो वादे किये थे वो आसान नहीं हैं। तीन माह के लिये सब्सिडि देकर बिजली की दर आधा करने की घोषणा की। घोषणा पत्र के वादे पूरे करने के लिये केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनते ही उनके सचिवालय के सामने धरना-प्रदर्शन शुरू हो गये। टीचर और डीटीसी कर्मियों के धरने लम्बे समय तक चले। ठेका मजदूरों की माँग को लेकर छोटी-छोटी ट्रेड यूनियनों ने प्रदर्शन किया, लेकिन सभी को केजरीवाल एण्ड कम्पनी ने कोरा आश्वासन के अलावा और कुछ नहीं दिया। लोकपाल बिल का बहाना बनाते हुये केजीरवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और वे लोकसभा चुनाव की तैयारी में लग गये।
सत्ता में आने के लिये पूँजीपतियों का समर्थन लेना पड़ता है, उनको भरोसा दिलाना पड़ता है कि अगर वे सत्ता में आये तो पूँजीपतियों की लूट में कोई आँच नहीं आने वाली है और उनकी लूट की रफ्तार और तेज हो जायेगी। उन्हें फिक्की और सीआईआई (भारतीय उद्योग परिसंघ) जैसे औद्योगिक संगठनों में जाकर अपनी नीति को रखनी पड़ती है कि वो क्या करना चाहते हैं, जिससे उनकी लूट-खसोट को और बढ़ावा मिलेगा। प्रधानमंत्री पद के दो दावेदार- राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी सीआईआई और फिक्की की बैठकों में अपनी बात रख चुके हैं। इसी कड़ी में आप पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने 17 फरवरी को सीआईआई की बैठक में अपनी बात रखी। वहाँ मौजूद उद्योगपतियों से केजरीवाल ने सबसे पहले सवाल किया कि प्रधानमंत्री, जो दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री हैं, उनके अर्थतंत्र और व्यापार के वातावरण से आप लोग खुश हैं? उन्होंने बिना नाम लिये एक बड़े उद्योगपति से मुलाकात का जिक्र किया, जिसमें वह उद्योगपति उनकी इकोनॉमिक पॉलिसी, को दो शब्दों में परिभाषित किया। इकोनॉमिक पॉलिसी, यानी ईमानदार राजनीति।
केजरीवाल की आर्थिक नीति को परिभाषित करने का काम उद्योगपति करते हैं? सवाल यह है कि ईमानदार होने से देश का अर्थतंत्र किसके हित के लिये बनेगा? वह ईमानदारी किसके लिये होगी? पूँजीपति के सलाह में ईमानदारी से जो अर्थतंत्र बनेगा निश्चित ही उसके हित में होगा न कि आम जनता की। मनमोहन सिंह की आर्थिक नीति को देश में ईमानदारी से ही लागू किया गया है जिसका परिणाम बेरोजगारी, महंगाई भ्रष्टाचार के रूप में हम सभी के सामने है। ऐसी ईमानदारी की क्या जरूरत जो एक विशेष वर्ग के लिये हो, जिसमें आम जनता पिसती रहे।
केजरीवाल ने कहा कि मैंने ‘‘डेढ़ माह में करप्शन कम कर दिया है’’। केजरीवाल के मुंख्यमत्री रहते शाहपुर जाट गांव के रिहाईशी इलाके के तंग गलियों में चल रही एक्सपोर्ट फैक्ट्री में आग लगी जिसमें एक मजदूर की मृत्यु की बात आई और वह फैक्ट्री तक सील नहीं हुयी। इसी तरह मुन्डका में खिलौना गोदाम में आग लगी, जिसमें करीब 70-80 मजदूर कार्यरत थे। 60-70 दमकल गाडि़यों को आग पर काबू पाने में कई घण्टे लगे। कुछ गाडि़यां को तो 24 घण्टे वहाँ रह कर आग बुझानी पड़ी। आग तीन मंजिला ईमारत के पहली मंजिल पर लगी थी और मजदूर दूसरी व तीसरी मंजिल पर काम कर रहे थे। उसमें केवल एक मजदूर की मृत्यु की बात सामने आई। उस गोदाम को सील तक नहीं किया गया। केजरीवाल साहब क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? जो कि आप के शासन काल में हुआ है, इन मजदूरों की मृत्यु के लिये कौन जिम्मेदार है?
‘‘सरकार को बिजनेस नहीं करना चाहिए, सरकार को गर्वनेंस करनी चाहिए। बिजनेस सारा प्राइवेट सेक्टर को छोड़ देना चाहिए।’’ यही काम तो यूपीए और एनडीए सरकार ने किया है वे सभी लाभकारी उद्योगों व संस्थाओं को प्राइवेट सेक्टर के हाथों में सौंप दिया है। उसके मजदूरों, कर्मचारियों को उनके रहमों-करम पर छोड़ दिया है। स्थायी काम में भी ठेकेदारी प्रथा लागू कर दिया गया है और आप ने झूठे इन्हीं ठेकेदार मजदूरों को स्थायी करने की बात कही थी। जब यह ठेका मजदूर आपके पास आपकी वादों को याद दिलाने के लिये गये, धरने पर बैठे रहे, लेकिन आप को मिलने का मौका तक नहीं था इन मजदूरों से। आप पार्टी के मुख्य लोगों को आम लोगों से मिलने का समय नहीं होता, लेकिन दिल्ली औद्योगिक क्षेत्र के उद्योगपतियों के यूनियन प्रतिनिधियों से मिलने का समय होता है। व्यापारी वर्ग वैट से परेशान होते हैं तो आप उनसे मिलते हैं और उनकी समस्या तुरन्त वैट कमिश्नर को बुला कर सुलझा देते हैं। वहीं डीटीसी कर्मियों की समस्या को सुलझाने के लिये वक्त माँगते हैं।
‘‘सरकारें विकास नहीं करतीं विकास तो आप लोग (पूँजीपति) करते हैं जो हॉल के अन्दर बैठे हैं।’’ केजरीवाल ये भूल गये कि विकास मेहनतकश जनता करती है। किसानों-मजदूरों के खून से विकास होता है, जो गर्मी में तप कर, ठंड में ठिठुर कर भी काम करते हैं। आप जैसे वातानुकुलित कमरों में बैठ कर विकास नहीं होता। वातानुकुलित कमरों में बैठ कर शेयर के दाम फर्जी तरीके से बढ़ाये जाते हैं, जीडीपी का ग्रोथ दिखाया जा सकता है जो कि कागजी विकास होता है। नैनो कार के लिये किसानों की जमीन छीन सकते हैं, लेकिन रोजगार के नाम पर टाँय-टाँय फिस्स हो जाते हैं।
आप कहते हैं कि ‘‘सरकार का काम है सुरक्षा, न्याय, भ्रष्टाचार मुक्त ईमानदार प्रशासन देना। आप का सवाल होता है कि सुरक्षा और न्याय नहीं होगा तो बिजनेस कैसे हो सकता है?’’ जब दिल्ली का मुख्यमंत्री बिना सुरक्षा के चल सकता है तो एक व्यापारी को सुरक्षा क्यों चाहिए? क्या मजदूरों के खून चूस कर जमा की हुयी पूँजी की सुरक्षा के लिये चिंता आपको है? जहाँ तक न्याय की सवाल है तो न्यायपालिका मजदूरों के साथ न्याय नहीं करती। जब एक मजदूर अपने श्रम अधिकारों की माँग के लिये न्यायालय का दरवाजा खटखटता है तो वर्षों उसे तारीख पर तारीख दी जाती है। वह मजदूर कोर्ट का चक्कर लगाते- लगाते दुनिया को छोड़ देता है, लेकिन यह न्यायपालिका उसको न्याय नहीं देती है।
आप अपने दादा जी का उदाहरण देते हैं कि ‘‘उनकी एक कॉटन मिल थी, एक ऑयल मिल थी और कहते हैं कि एक व्यापारी 24 घण्टे तपता है, पैसा कमाता है और टैक्स देता है, चैरिटी करता है।’’ व्यापारी 24 घण्टे क्या एक घण्टे भी नहीं तपता है। तपता है तो मजदूर, जो कि भट्टियों में, सड़कों पर, खदानों में उस व्यापारी के लिये पूँजी कमा रहा होता है। तपता है किसान जो जेठ की दोपहरी में भी किसानी करता है और अन्न पैदा करता है। मजदूर, किसान तप कर जब मोटर गाड़ी, एसी बनाते हैं, अन्न पैदा करते हैं तो उसका उपयोग करता है व्यापारी वर्ग। चैरिटी तो वह सरकार के आंखों में धूल झोंक कर टैक्स बचाने के लिये करता है। अमेरिकी संस्थायें एन जी ओ को कल्याणकारी काम करने के लिये फंड देती है और दूसरी तरफ अमेरिका दुनिया को लूटने के लिये करोड़ों जनता का खून बहाता है, देशों को बरबाद कर देता है। भारत में जहाँ 1500 लोगों पर एक डॉक्टर है वहीं 600 लोगों पर एक एनजीओ काम करती है। आम जनता को ऐसी चैरिटी और एनजीओ से क्या फायदा है?
आप कहते हैं कि एक छोटा इंस्पेक्टर, बड़े-बड़े उद्योगपति की हालत पतली कर देता है, इसलिये इंस्पेक्टर राज व लाईसेंसी राज खत्म करना चाहिए। केजरीवाल साहब आपके मुख्यमंत्री रहते हुये कितने इंस्पेक्टर ने जाकर फैक्ट्रियों में छापा मारा है? सभी इंस्पेक्टर हाथ पर हाथ धरे वातानुकुलित कमरे में बैठे रहते हैं, जिनको ये मजदूरों ने तप कर तैयार किया होता है। आप के ही मुख्यमंत्री काल में बिना लाईसेंस की फैक्ट्री साहपुर जाट गांव में चल रही थी, जिसमें आग लगी और आप की भाषा में वो मजदूर तप कर मर गया। ओखला में गैर लाइसेंसी मेंहदी वाली फैक्ट्री में आग लगी, जिसमें तीन मजदूरों की मौत हो गयी। उसके बाद दिल्ली श्रम विभाग उसे लाईसेंस देने की बात करता है। इंस्पेक्टर राज और लाईसेंस राज तो केवल फाईलों की शोभा बढ़ाने के लिये है, उसमें रिक्त स्थानों पर भर्तिया नहीं की जा रही हैं। आप फाईलों में बची खुची कुछ चीजों को खत्म करना चाहते हैं, ताकि मजूदर उस कानूनी अधिकार का भी इस्तेमाल नहीं कर सके। आप कहते हैं कि ‘‘व्यापार बढ़ता है तो हर लोग व्यापारी को चोर की नजर से देखने लगते हैं’’!
हाँ यह व्यापारी चोर हैं। ये मजदूरों के श्रम का मूल्य चुराते हैं, ये सरकार का टैक्स चुराते हैं और दिन- दूना, रात- चौगुना तरक्की करते हैं। एक मजूदर, जो अपनी पूरी जिन्दगी में दो रूम नहीं बना पाता, बच्चों को शिक्षा नहीं देता, इलाज नहीं करा पाता, वहीं उसका मालिक हर साल महल तैयार करता है, बच्चों को शिक्षा के लिये विदेश भेजता है, खुद का इलाज करना हो तो मेदान्ता, अपोलो जैसे अस्पताल में जाता है।
आप कहते हैं कि ये उद्योगपति रोजगार पैदा करते हैं। यह सौ प्रतिशत झूठ है। यह उद्योगपति मजदूरों की श्रम को लूट कर मालामाल होते हैं और उससे आधुनिक मशीन लाकर लोगों को बेरोजगार करते हैं। छोटे छोटे रोजगारों में घुसपैठ बना कर यह व्यापारी लोगों के हाथों से छीन लेते हैं और उसी रोजगार पर उनको कम मूल्यों में रखते हैं।
आप कहते हैं कि ‘‘जो पॉलिसी व्यापार को बढ़ाने में रूकावट पैदा करता है, उसको रिविजिट करके बदलना होगा। हमें ऐसी पॉलिसी बनानी पड़े जो बिजनेस को बढ़ावा दे।’’ मेहनतकश जनता आप से माँग करती है कि आप मजदूरों, किसानों की विजिट कीजिये। जो पॉलिसी उनके श्रम का उचित मूल्य नहीं देती उसके लिये पॉलिसी बनाईये जो पॉलिसी है उसे लागू करवाईये। आप उन व्यापारियों को दंडित कीजिये जो श्रम कानूनों को धज्जियाँ उड़ाते हैं और उसमें रूकवाट पैदा करते हैं। आप कहते हैं कि ‘‘सरकार को उद्योगों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए’’। सरकार को अपने बनाये हुये कानून को लागू कराने के लिये हमेशा हस्तक्षेप करना चाहिए और मेहनतकश जनता के पक्ष में कानून बनाना चाहिये।
आप कहते हैं कि ‘‘आप के शासन काल में सरकारी अस्पताल में दवा मिलने लगी है’’। आप क्या जाने आपको तो छींक भी होती है तो प्राइवेट अस्पताल जाकर चेकअप कराते हैं। आम जनता तो 103 डिग्री बुखार में पूरे दिन लाईन में लग कर अपनी बारी आने की इंतजार करती है। आप अन्ना हजारे को गुरू मानते हैं, जो रामलीला मैदान में अनशन खत्म होने के बाद 25 कि.मी. दूर मेदांता अस्पताल में जाकर भर्ती हो जाते हैं, लेकिन पास के सरकारी अस्पताल में नहीं जाते। आप को तो सार्वजनिक व्यवस्था खत्म करनी है, इसलिये आपको प्राइवेट अस्पताल अच्छा लगता हैं
आपने चाय वाले का उदाहरण देकर बताया कि अगर रिश्वतखोरी कम हो जाये तो लागत कम हो जायेगी और जनता को सस्ता समान मिलने लगेगा। केजरीवाल साहब, आप ही के बताये अनुसार रिलायंस का प्रति यूनिट गैस निकालने की कीमत 1 डॉलर से कम होती है, उसके लिये वे 8 डॉलर वसूलना चाहते हैं। क्या यह रिश्वतखोरी के कारण हो रहा है?
आप की आम आदमी पार्टी वैसी ही है जैसा भारत का आम बजट होता है। खास लोगों को आम बजट में ध्यान रखा जाता है उन्हें लाखों करोड़ की छूट दी जाती है और आम जनता पर महंगाई बढ़ा दी जाती है। सी आई आई की मीटिंग में आप उन व्यापारियों को खुलेआम ‘आप पार्टी’ में शामिल होने का निमंत्रण दे रहे थे। आप उन व्यापारियों को नये भारत बनाने के लिये आमंत्रित कर रहे थे, जो दिन-रात मेहनतकश जनता व प्राकृतिक सम्पदा को लूटते हैं। आपका नया भारत कैसा होगा? आप के संसद में हो सकता है कि भ्रष्टाचारी, बलात्कारी, कातिल, साम्प्रदायिक छवी के लोग नहीं हो लेकिन आप का संसद पूँजीवाद-सामंतवाद के गठजोड़ से भरा होगा। पूँजीवाद को जिस तरह आप बढावा दे रहे हैं और सामंती खाप पंचायतों पर आज तक आप ने मुँह नहीं खोला है।
आप देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते हैं। केजरीवाल साहब, भ्रष्टाचार, पूँजीवाद की जननी होती है। आप के राज में यह कैसे होगा जहाँ पूँजीवाद होगा लेकिन भ्रष्टाचार नहीं होगा? आप रिलांयस को भ्रष्ट बताते हैं और उनसे चंदे लेने में भी कोई आपत्ति नहीं है। 9,99,999 रु. का चंदा तो आप बिना किसी जांच पड़ताल को ले सकते हैं, इससे अधिक के चंदे पर जानना चाहेंगे कि देने वाला व्यक्ति आपसे क्या चाहता है। मेहनत से कमाने वाले व्यक्ति के पास तो 500 रु. के चंदे देने भारी पड़ते हैं तो आपको लाखों रु. का चंदा देने वाला व्यक्ति कौन होगा?
केजरीवाल अपने 49 दिन के कार्यकाल में उद्योगपतियों, व्यापारियों से मिले, उनकी समस्याओं का हाथो हाथ हल भी कर दिये, लेकिन जब मजदूर उनसे मिलने गये तो उनके पास समय नहीं था। वह मोहल्ला कमेटी बानने की बात कर रहे थे, लेकिन किसी भी मोहल्ले में एक दिन नहीं गये मिलने के लिये। कानून मंत्री यूगांडा की महिलाओं को रात में दबिस देने के लिये पुलिस को बोल सकते हैं, लेकिन उनके श्रम मंत्री ने एक भी फैक्ट्री में दिन के उजाले में भी जाकर दबिश नहीं डाली। बिजली, पानी के मुद्दे पर जो लोक लुभावना काम किया है उससे मेहनतकश जनता को कोई लाभ नहीं होने वाला है बल्कि उनके उपर और भार पड़ेगा। दिल्ली में मेहनतकश जनता किराये के कमरे में या छोटे से घरों में रहती है, जहाँ इन घटे हुये मूल्यों से उनको कोई विशेष लाभ नहीं होगा। इसका निश्चित ही लाभ उन लोगों को होगा, जिनके पास कई-कई घर हैं।
आप के भ्रष्टाचार खत्म करने से आम जनता को कुछ नहीं मिलने वाली है। इससे उन्हीं व्यापारियों को और ज्यादा फायदा होगा, जो आज दिन-दूना, रात-चौगुना फायदा उठा रहे हैं और उसका कुछ प्रतिशत नौकरशाह, मंत्री, संतरी पर खर्च कर देते हैं।
जब केजरीवाल (विश्व बैंक) के सपनों का भ्रष्टाचार मुक्त भारत होगा तब पूँजीपति वर्à¤

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