Home » समाचार » पॉलिथिन व प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण:एक बड़ी चुनौती

पॉलिथिन व प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण:एक बड़ी चुनौती

निर्मल रानी
देश के कई राज्यों में पॉलिथिन व प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की का$गज़ी घोषणा की जा चुकी है। इन में हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य और चंडीगढ़ जैसे केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल हैं। सरकार द्वारा इस लिए पॉलिथिन तथा प्लास्टिक आदि के सार्वजनिक प्रयोग पर प्रतिबंध लगाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं क्योंकि इनके कचरों का समूल नाश नहीं हो पाता। और यह मिट्टी की उर्वरक क्षमता को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। इसके  कारण हमारे पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त शहरों व क़ स्बों में बहने वाले नालों व नालियों में भी यही अनाशीय कचरा इनके जाम होने का कारण बनता है। परिणाम स्वरूप बरसात के दिनों में यही कचरा शहरों में बाढ़ जैसे हालात पैदा कर देता है। इन्हीं हालात से बचने के लिए सरकार प्राय: इस विषय पर विचार करती रहती है कि क्यों न पॉलिथीन व प्लास्टिक के सार्वजनिक रूप से होने वाले बेतहाशा प्रयोग को प्रतिबंधित कर दिया जाए।

देश के जिन जिन राज्यों व कें द्रशासित प्रदेशों में पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाने की बात होती है वहां पहले रेहड़ी,ठेलों तथा रोज़मर्रा के प्रयोग में आने वाले सामानों की दुकानों पर आम ग्राहकों को प्राप्त होने वाले पॉलिथीन कै री बैग पर सर्वप्रथम प्रतिबंध लगा दिया जाता है। ऐसी ख़बरें भी आती हैं कि पॉलिथीन प्रतिबंध राज्यों में पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों को ाी जुर्माना भुगतना पड़ता है तथा वह दुकानदार जिसने कि ग्राहक को उक्त बैग मुहैया कराया है उसे और भी अधिक जुर्माने का भुगतान करना पड़ता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पॉलिथिन व प्लास्टिक का कचरा हमारी धरती,पर्यावरण,स्वास्थय आदि सभी के लिए अत्यंत हानिकारक है। परंतु क्या मात्र कैरी बैग अथवा आम लोगों के हाथों में लटकने वाले प्लास्टिक थैलों को प्रतिबंधित करने मात्र से ऐसे अनाशीय कचरे को फैलने से रोका जा सकता है? क्या हमारे देश में पॉलिथिन तथा प्लास्टिक पैक के बदले में किसी ऐसी वस्तु की खोज की जा चुकी है जो हमें पूरी तरह से अनाशीय कचरों से मुक्ति दिलवा सके?

दरअसल हमारे देश में पॉलिथिन व प्लास्टिक पैक में आने वाले सामानों की सूची इतनी लंबी है कि उसे गिन पाना शायद संभव ही नहीं है। खासतौर पर आम लोगों के दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली तमाम वस्तुएं ऐसी हैं जो केवल प्लास्टिक या पॉलिथिन पैक में ही बाज़ार में उपलब्ध होती हैं। उदाहरण के तौर पर ब्रेड,दूध,दही,पनीर,लस्सी,मिनरल वॉटर की बोतलें,लगभग सारे ही ब्रांड के शीतल पेय पदार्थ,शराब कीबोतलें,चिप्स,नमकीन,बिस्कुट,बीड़ी के बंडल,गुटखा,शैंपू,साबुन,चाय की पत्ती के पैकेट,वाशिंग पाऊडर,टुथपेस्ट,क्रीम,रििफल,बॉलपेन,दवाईयों की पैकिंग,इंजेक्शन,सीरिंज,$ लेक्स,कंप्यूटर कचरा जैसे सीडी,डीवाडी $ लॉपी आदि,मोबाईल का कचरा,बैटरी का कचरा,सीमेंट बैग,आटा व बेसन बैग,यूरिया बैग आदि ऐसी न जाने कितनी वस्तुएं हैं जो अनाशीय कचरे के रूप में हमारे पर्यावरण को अत्यधिक प्रभावित करती हैं। सवाल यह है कि क्या देश की कोई भी सरकार इन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात कभी सोच सकती है? और यदि उपरोक्त वस्तुओं के कचरे को नियंत्रित करने या उन्हें प्रतिबंधित करने के समुचित उपाय नहीं किये जाते तो क्या मात्र साधारण व $गरीब आदमी द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले कैरी बैग पर प्रतिबंध लगने मात्र से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है?

हमारे देश में प्राय: आम आदमी यह कहता सुनाई देता है कि देश के $कानून व $कानूनी बंदिशें स पन्न व अमीर लोगों के लिए नहीं बल्कि साधारण व गरीब लोगों के लिए हैं। पॉलीथिन को प्रतिबंधित किए जाने वाले कानून को लेकर भी आम लोगों द्वारा कुछ ऐसी ही व्या या की जा रही है। आज आम आदमी यह सवाल कर रहा है कि पॉलिथिन व प्लास्टिक कचरा फैलाने की शुरुआत सूर्योदय होने से पूर्व ही हज़ारों करोड़ थैलियों को आम लोगों के घरों तक पहुंचाने का कारण देश का डेयरी मिल्क व्यापार ही बनता है। अब आ$िखर इस पर नियंत्रण पाने के क्या उपाए हो सकते हैं और कौन सी सरकार इन्हें प्रतिबंधित कर सकती है। क्योंकि  इस कारोबार में अधिकांशत: देश की तमाम राज्य सरकारें भी सांझीदार बनी हुई हैं। इसी प्रकार गुटखा व्यापार भी देश के अति स पन्न व उद्योगपति घरानों के हाथों में है जिनके हितों की अनदेखी कर पाना आसान बात नहीं है। पाठकों को याद होगा कि देश के एक केंदीय स्वास्थय मंत्री ने जब देश के युवाओं के स्वास्थय के मद्देनज़र गुटखा जैसी नु$कसानदेह वस्तु पर प्रतिबंध लगाने तथा इसके उत्पादन को बंद करने की बात सोची थी तथा इस सिलसिले में अपने विचार व्यक्त किए थे,बताया जाता है कि उस समय देश की ता$कतवर गुटखा उत्पादक लॉबी ने उस मंत्री का मंत्रालय तक बदलवा दिया था।

लगभग यही हाल शराब तथा चाय की पत्ती व डिटर्जेंट पाऊडर एवं शैंपू आदि के पाऊच उत्पादन को लेकर है। संक्षेप में यह समझा जा सकता है कि आम लोगों के दैनिक जीवन में प्रयोग में आने वाली रोज़मर्रा की चीज़ों के उत्पादन से जुड़े लोग तथा औद्योगिक घराने कोई साधारण लोग बिल्कुल नहीं हैं। लिहाज़ा हो न हो देश की सरकारेें इन बड़े घरानों के हितों को भी ध्यान में रखकर ही कोई $कानून बनाती हंै या निर्देश जारी करती है। ऐसे में प्रश्र यह है कि आ$िखरकार हमें इन समस्याओं से निजात कैसे मिल सकती है और हम अपने पर्यावरण व स्वास्थय को इन प्रदूषित व अनाशीय कचरों से होने वाले नु$कसान से कैसे बचा सकते हैं। इसके लिए हमें हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे से पहाड़ी राज्य से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है। हिमाचल प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है जिसने पॉलिथिन व प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है। इसके बावजूद भी वहां पाए जाने वाले प्लास्टिक कचरे जोकि मजबूरीवश अथवा पर्यटकों के कारण पाए जाते हैं उन्हें भी समाप्त करने का मा$कूल प्रबंध सरकार द्वारा किया गया है।

सर्वप्रथम तो यह कि हिमाचल प्रदेश की आम जनता ने यह स्वीकार व महसूस कर लिया है कि अनाशीय कचरे उनके पहाड़ी सौंदर्य,पर्यावरण तथा स्वास्थय के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। अपनी इसी जागरुकता के चलते वहां के आम लोग यह कोशिश करते हैं कि पॉलिथिन व प्लास्टिक जैसे अनाशीय कचरे को स्वयं इधर-उधर फेंकने से परहेज़ करें। उधर प्रदेश सरकार द्वारा 3 रुपये प्रति किलो की दर से ऐसे कचरे को खरीदने की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त वहां कई जगहों पर ऐसे प्लांट लगाए गए हैं जहां इन कचरों को रिसाईकल किया जाता है। इन कचरों का इस्तेमाल हिमाचल प्रदेश में सड़कों के निर्माण में किया जाता है। ऐसे कचरे को गलाकर सड़कों के निर्माण में इस्तेमाल करने से सड़कें मज़बूत बनती हैं। इन सब के अतिरिक्त सरकार की ओर से स ़ती भी बरती जाती है कि कोई व्यक्ति ऐसी अनाशीय पैकिंग का प्रयोग न करने पाए। वैसे तो पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय को गंभीरता से लेते हुए गुटका पैकिं ग पॉलिथिन व प्लास्टिक के पाऊच में न किए जाने के आदेश जारी किए थे। परंतु सर्वोच्च नयायालय के इस आदेश के बावजूद आज भी बाज़ार में प्लास्टिक पाऊच में ही गुटखा बिकते देखा जा रहा है। ज़ाहिर है उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन करना तथा इसको अमल में लाना शासन व प्रशासन का ही काम है। ऐसी विरोधाभासी परिस्थितियों में हमें साफ नज़र आता है कि किसी ऐसे विषय को लेकर दोहरे मापदंड अपनाया जाना ही हमारे व हमारे समाज के लिए,हमारे स्वास्थय तथा पर्यावरण के लिए घातक साबित होता है।

इन हालात में हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ऐसे अनाशीय कचरे को लेकर हम स्वयं सचेत व जागरुक बनें। इससे होने वाले नुकसान तथा इनके दूरगामी परिणामों को खुद अच्छी तरह समझें तथा इनके समूल नाश का स्वयं पु ़ता उपाय ढंूढें। हमारी लापरवाही तथा अज्ञानता ही हमारे लिए पर्यावरण असुंतलन,बाढ़,बीमारी तथा अन्य कई प्रकार की तबाही का कारण बनती है। जहां तक हो सके हम अपने घरों में ऐसे अनाशीय कचरों को एकत्रित कर उन्हें स्वयं या तो समाप्त करें या रिसाईकल होने हेतु उसे किसी कबाड़ी की दुकान तक पहुंचाने के उपाय करें। नाली,नालों व सड़कों पर न तो स्वयं ऐसे कचरे फेंके न ही दूसरों को फेंकने दें। हम इस बात की प्रतीक्षा कतई न करें कि सरकार इन अनाशीय कचरों पर स्वयं प्रतिबंध लगाएगी। हमेंस्वयंजागरुकहोनाहोगातथाऐसीनकारात्मकपरिस्थितियोंसेस्वयंहीजूझनाहोगा

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: