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प्रभात सिंह..बस्तर पुलिस : कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है !

प्रभात सिंह के खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 67, 67A और आईपीसी की धारा 292 का अपराध बनता ही नहीं है…
महेंद्र दुबे
जगदलपुर (छत्तीसगढ़) के परपा थाने में पत्रकार प्रभात सिंह के खिलाफ शिकायतकर्ता संतोष तिवारी की रिपोर्ट पर दर्ज अपराध क्रमांक 79/2016 में पुलिस ने उनके खिलाफ धारा 67 और 67A इनफार्मेशन एंड टेक्नालाजी एक्ट 2000 और 292 आईपीसी का आरोप लगाया है। पुलिस ने दिनांक 22/03/2016 को उन्हें गिरफ्तार दिखा कर अदालत में पेश किया था जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। मजिस्ट्रेट कोर्ट और सेशन कोर्ट से उनकी जमानत ख़ारिज हो चुकी है। फिलहाल उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिलने तक जेल में ही रहना होगा लेकिन यदि पुलिस उन्हें उनके खिलाफ दर्ज तीन और मामले में इस बीच गिरफ्तार करती है(जिसकी आशंका है) तो उनकी जेल यात्रा और लंबी भी हो सकती है।
एक वकील की हैसियत से मुझे हासिल अल्प कानूनी ज्ञान के आधार पर मैंने प्रभात सिंह के खिलाफ दर्ज करायी गयी लिखित शिकायत और उसके आधार पर दर्ज की गयी एफआईआर के तथ्यों को उन पर आरोपित धारा 67 और 67A आईटी एक्ट और धारा 292 आईपीसी का अपराध गठित करने के लिए आवश्यक तत्वों के समांतर रख कर पुरे मामले का परीक्षण करने की कोशिश की तो इस पूरे मामले में कम से कम मुझे पुलिस की कार्यवाही मिस यूज आफ पावर और अराइजिंग आउट ऑफ़ सम मेलाफाइड वेस्टेड इंट्रेस्ट ही दिख रही है।
मामले को समझने के लिये पहले, जिस एक मात्र व्हाट्सअप पोस्ट के आधार पर पत्रकार प्रभात सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तार किया गया है, उसे पढ़ लीजिये..वो ये है…..
“पत्रकार सुरक्षा कानून से केवल उन्हें परहेज है जो आलरेडी मामा की गॉड में बैठे हैं।? देशद्रोही गद्दार हाय हिन्द जय भारत”
अब आगे पढ़ने से पहले ज़रा अपने एंड्राइड फोन में देवनागरी लिपि में गोद शब्द कैसे टाइप करेंगे, इस पर सोचिये या कर के देखिये ! आप टाइप करेंगे अंग्रेजी की पेड से god और हिंदी में लिखा आयेगा “गॉड”। जैसा आपके स्क्रीन में गॉड लिखा आया वैसा ही प्रभात सिंह से भी डिफाल्ट टाइप हो गया यद्यपि उन्होंने गोद लिखना चाहा होगा। ठीक इसी तरह ये समझना आसान है कि मोबाईल की पैड में J और H एक दूसरे से सटे हुये होते है जिससे कभी “जय” “हाय” टाइप हो सकता है हालांकि जय को हाय लिखने से प्रभात सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर का कोई लेना देना नहीं है और उनके खिलाफ आरोप “……….मामा की गॉड में बैठे है” से ही से सम्बंधित है। बस यहीं सामान्य टाइपिंग की गलती ही प्रभात सिंह का अपराध है जो वो जेल भेज दिये गये है।
यहां ये भी जान लीजिये कि आईटी एक्ट की ऊपर उल्लेखित दोनों धाराओ में स्पष्ट लिखा है कि किसी का इलेक्टानिक माध्यम में पोस्ट किया गया कोई मटेरियल अपराध है या नहीं, इसका निर्धारण सभी रिलेवेंट परिस्थितियों के आधार पर ही होगा जिसकी ओर तो पुलिस ने प्रभात सिंह के मामले में झाँका तक नहीं है। फिर भी मान लीजिये कि प्रभात सिंह ने “…..गॉड में बैठे है” ही लिखा था तो क्या इतना लिखने भर से धारा 67 और 67A आईटी एक्ट और धारा 292 आईपीसी का अपराध कर कर दिया उन्होंने ? यकीन करिये जवाब है…सौ प्रतिशत नहीं ही है ! समझिये…सामान्य भाषा में कहा जाये तो धारा 67 का सम्बन्ध इलेक्ट्रानिक फार्म में ऐसे लिखने, व्यक्त करने, प्रकाशित करने या पोस्ट करने से है जो सेक्सुअल डिजायर को आपराधिक नियत से जागृत करता हो या ऐसा करने की प्रवृत्ति रखता हो और 67A में तो स्पष्ट रूप से Sexually Explicit material शब्द का इस्तेमाल हुआ है जिसका सामान्य आशय सेक्स सम्बन्धी क्रिया या अंगों के प्रदर्शन से है जबकि धारा 292 आईपीसी भी सामान्यत इसी प्रकृति के अपराध का गठन करता है जो कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से इतर होने पर अपराध होता है। उक्त तीनों आपराधिक धाराओं के अपराध को आप साधारण प्रचलन की भाषा में “अश्लीलता” कह सकते है।

अब ऊपर दी गयी व्याख्या को प्रभात सिंह के व्हाट्सअप पोस्ट पर अप्लाई करके देखिये और खुद ही समझने की कोशिश कीजिये कि “…गॉड में बैठे है” वाक्य किस प्रकार की सेक्सुअल डिजायर को आपराधिक तरीके से किस प्रकार और कैसे जागृत कर सकता है या ऐसा करने की प्रवृति किस तरह और कैसे रखता है ? या ये वाक्य अंश कैसे और किस तरह sexually Explicit material की श्रेणी में आता है ? दूसरी अहम कानूनी पेंच इस प्रकरण में ये भी है कि अगर प्रभात सिंह की पोस्ट व्हाट्सअप जैसे इलेक्टानिक फार्म में हुई है तो आईटी एक्ट के साथ 292 आईपीसी की धारा भी कैसे जोड़ी जा सकती है ?
इस पूरे विश्लेषण का आशय यही दिखाना है कि प्रभात सिंह के खिलाफ की गयी लिखित शिकायत और एफआईआर के तथ्यों से प्रभात सिंह के खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 67, 67A और आईपीसी की धारा 292 का अपराध बनता ही नहीं है इसके बावजूद उसे बिना किसी कानून सम्मत कारण के गिरफ्तार किया जाना पुलिस की नियत पर सवाल खड़ा करता है। ये पोस्ट मेरी अपनी कानून की समझ के आधार पर दिया गया व्यक्तिगत ओपिनियन है जिस पर सहमत या असहमत होने को हर कोई स्वतंत्र है। हाँ प्रभात सिंह के द्वारा बस्तर आईजी पर पिछले साल उन्हें धमकी दिए जाने आरोप लगाये जाने, पत्रकार आंदोलन में अगुआ रहने और पुलिस के खिलाफ उनके द्वारा कई तथ्यपरक रिपोर्ट प्रकाशित किये जाने की पृष्टभूमि को देखते हुए ग़ालिब का ये शेर याद आ जाता है….
बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है !
‪#‎महेंद्र_दुबे
महेंद्र दुबे, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में अधिवक्ता हैं, उन की फेसबुक टाइमलाइन से साभार

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