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प्रवासी भारतीय समाज: मुक्ति युद्ध से जनसंहारी जमात तक

शमशाद इलाही शम्स
बीसवीं शताब्दी में प्रवासी भारतीयों ने देश से बाहर रहकर भारत को अंग्रेजो के साम्राज्यवादी चुंगल से मुक्त कराने की बहुत सी क्रांतिकारी तहरीकें शुरू की थी। 1913 में अमेरिका-कनाडा में बसे भारतीय किसान मजदूरों के बेटों और उस समय के प्रबुद्ध दानिश्वरों जैसे लाला हर दयाल, तारक नाथ दास, मौलवी बरकतुल्लाह, हरनाम सिंह, वी जी पिंगले, सोहन सिंह भखना, करतार सिंह सराभा आदि ने ग़दर पार्टी बनाई, भारत से दूर रह कर संसाधन इकट्ठे किये और क्रांतिकारियों की भारी तादाद भारत में भेज कर आज़ादी की लड़ाई तेज की। ब्रिटिश हकुमरानों द्वारा उनका भारी दमन हुआ, भारी तादाद में फांसी चढ़ाए गए तो बहुत से नेताओं को काले पानी की लंबी-लंबी सजाएँ हुई। इसी ग़दर पार्टी ने भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन को जन्म दिया जिसके परचम तले मजदूर, किसान, छात्र और दमित तबके एकत्र हुए।
1940 के दशक में पूर्वी एशिया के देशों में प्रवासी भारतीयों के बीच रहकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ‘इन्डियन नेशनल आर्मी’ बनायी और उन्हें जबरदस्त समर्थन मिला। सिंगापुर में भारतीय महिलाओं ने अपने जेवर त्याग कर आईएनए के कोष भर दिए और अपने परिजनों को सेना में भर्ती करवा कर गर्व महसूस किया। इन सब भारतीय समर्थकों का सपना भारत की आज़ादी और एक ऐसे देश का निर्माण करना था जिसमे सभी धर्मो के मानने वाले एकजुट होकर रहे और सशक्त, स्वावलंबी और आत्मनिर्भर  भारत बनाएं।
प्रवासी भारतीयों का यह गौरवशाली अतीत अब इतिहास बन चुका है। बीसवीं शताब्दी में भारत से बाहर जाने वाले या तो किसान मजदूर थे या पढ़ाई के लिए जाने वाले सम्पन्न घरों के छात्र। मजदूर-किसानों के बेटे अपने वर्गीय चरित्र के अनुरूप गुलामी के चुंगल से मुक्त होने की जन-अकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दे रहे थे और सार्वभौमिक न्याय पर आधारित एक समाज का सपना देखते थे। लेकिन आज प्रवासी भारतीयों की राजनीति की तस्वीर बदल चुकी है। आजादी के बाद विदेश जाने वाले भारतीय प्रवासियों में बेहतर जीवन चुनने की निजी महत्वकांक्षाओं ने जन्म लिया जिसका राजनीतिक स्वरूप अपनी अंतरवस्तु में यथास्थितिवादी-प्रतिक्रियावादी है।
1980 का दशक प्रवासी भारतीयों में प्रतिक्रियावादी चरित्र को पालने पोसने का दशक है। यही वह समय है जब भारत के राष्ट्रीय टेलीविजन पर महाभारत और रामायण का प्रसार हो रहा था और पूरे देश के गाँव-गाँव से राम मंदिर निर्माण के लिए ईंटें एकत्र की जा रही थीं। सांप्रदायिक फासीवादी शक्तियों ने राम मंदिर निर्माण और बाबरी मस्जिद विवाद पर पूरे देश में सांप्रदायिक सौहार्द को नष्ट करने में कोई कोर कसर नहीं छोडी थी जिसकी परिणिति 6 दिस्मबर 1992 को कथित हिन्दू राष्ट्रवादी लंपटों की फ़ौज द्वारा बाबरी मस्जिद के विध्वंस के रूप में सामने आई। लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्राओं द्वारा दूषित हुआ माहौल एक राष्ट्रीय दंगे के रूप में बदल गया, देश के कई राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा हुई, असंख्य लोग मारे गए, बेपनाह जन-धन की हानि हुई। ठीक इसी पृष्भूमि में विश्व हिंदू परिषद के लोग उत्तरी अमेरिका और यूरोप में प्रवासी भारतीयों के मध्य उनकी ‘सांस्कृतिक जड़ों’ को ठोस करते हुए ताबड़तोड़ सम्मलेन कर रहे थे। विदेशी भूमि पर मंदिर-मठों का निर्माण कर रहे थे और प्रवासी भारतीयों का एक बड़ा वर्ग इन्ही सांप्रदायिक संगठनों को भारी चंदे की रकम अदा कर उनकी मुट्ठियाँ गर्म कर रहा था। भारत में सांप्रदायिक शक्तियों को विदेश से होने वाली आय भारत में किसी चर्चा अथवा बहस को जन्म नहीं दे पाई यह अपने आप में एक रहस्यमय तथ्य है। जाहिर है इस हम्माम में सभी धर्मो से जुड़े संगठन नंगे हैं। इसाई मिशनरियां, इस्लामी मदरसे, इस्लामी राजनीतिक संगठन और संघ से जुड़े अनेक हिंदू संगठनों को विदेश से चंदे में मिली राशि पर भारत की संसद अथवा किसी जन संगठन ने, न कभी  कोई चिंतन किया है और न ही  विमर्श। 1940 से 1990 के मध्य मात्र पचास वर्षो के इस अंतराल में प्रवासी भारतीयों के इस बदले हुए राजनीतिक स्वरूप का ठोस मनोवैज्ञानिक, समाज शास्त्रीय अध्ययन किया जाना अभी बाकी है। 1940 में भारत की मुक्ति और एक समायोजित धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र की अभिलाषा रखने वाले इस समुदाय में आखिर वह कौन सी तबदीली थी कि उसका चरित्र प्रगतिशील समाज के बजाए प्रतिक्रियावादी फासीवादी शक्तियों का मुख्य आय स्रोत्र बन गया?
उपरोक्त विवरण की पृष्ठभूमि में 16वीं लोकसभा के चुनाव में जनसंहारी मोदी को उत्तरी अमेरिका में बसे भारतीय प्रवासियों द्वारा मिले जन समर्थन का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए। पिछले लगभग दो दशकों से प्रवासी भारतीयों में तथाकथित पढ़े लिखे प्रोफेशनल्स डॉक्टर, इंजीनियर, सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स की आमद में अनुपातिक वृद्धि दर्ज हुई है। जो फसल 1990 के दशक में विश्व हिन्दू परिषद ने यहाँ अपने सम्मेलनों और हिन्दू धार्मिक स्थानों मंदिरों आदि के निर्माण कर बोई थी अब वह पक चुकी है। उत्तरी अमेरिका में हिंदू संगठनों की जैसे बाढ़ आ गयी है जो हिन्दू समाज में धार्मिक पर्वों तो कभी हिन्दी भाषा की आड़ में अपनी गतिविधियाँ चलाते रहते हैं। ऐसे मंचो से मोदी का मुखर समर्थन सामने आना अप्रत्याशित नहीं है। कितने शर्म की बात है कि कनाडा जैसे देश में हिन्दी के रेडियो पर भारतीय पर्वो और संस्कृति के महिमा मंडन के तत्वावधान में वर्ण व्यवस्था जैसी जन विरोधी रीति का बखान किया जाता है। भारतीयों के धार्मिक आडम्बरों का कच्चा चिट्ठा आप इस समुदाय द्वारा प्रसारित प्रकाशित हिन्दी के अखबारों में आराम से देख सकते है। इनका व्यवहार किसी इस्लामी कट्टरपंथी ताकत से जरा भी भिन्न नहीं होता क्योकि दोनों ताकतें दम्भी हैं और अपने अतीत के गौरव में इन्हें आत्मिक सुख मिलता है। वह ऐसा करते हुए बेशर्मी के साथ उत्तर अमेरिकी इतिहास को भी दरकिनार कर देते हैं जिसके समाज ने विज्ञान और तकनीक को अपने जीवन अथवा पाठ्य कर्मो में उतार कर इतनी तीव्र प्रगति की है। जिसका समाज इंसान को उसके मूल अधिकार देता है और गैर बराबरी की दास प्रथा जैसी संस्थाओं का अंत कर चुका है।
भारतीय प्रवासी समुदाय उत्तर अमेरिका और यूरोप के देशों में पूंजीवादी लोकतंत्र की उत्तम व्यवस्था को भोग कर अपना जीवन निर्वाह करता है लेकिन अपने देश में उसे इस व्यवस्था से जुड़े लोकतान्त्रिक मूल्यों को रोपने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसे इस बात पर कोई आपत्ति अथवा अपराध बोध नहीं होता कि भारत में जाति व्यवस्था एक सामाजिक रंग भेद की नीति है, उसे साप्रदायिक हिंसा में इंसानों की हत्याओ पर कोई बेचैनी नहीं होती। उसे भारत की महान संस्कृति के चलते गर्भ में लड़कियों की भ्रूण हत्या पर कोई ऐतराज नहीं होता। उसे भारतीय समाज में महिलाओं की लगातार गिर रही स्थिति पर कोई शिकवा नहीं होता। उसे भारत के रोजमर्रा की ज़िंदगी में बढ़ते भ्रष्टाचार पर कोई दिक्कत नहीं। उसे भारत के जन संसाधनों पर विदेशी पूंजी के लगातार होते कब्जों पर कोई आपत्ति नहीं होती। भारत में 20 करोड़ दलितों के जीवन का नरक उसके विमर्श से नदारद है। ऐसा इसलिए संभव नहीं क्योंकि कहीं न कहीं ये खुद भारत के उसी शोषण आधारित व्यवस्था से जुड़े हैं उसी व्यवस्था में सुविधा प्राप्त यह जन विरोधी तबका अपने देश को छोड़ कर बेहतर जीवन यापन के लिए दूसरी जगह आया है। जाहिर है यह तबका इमीग्रेशन की भारी कीमतें अदा कर के विदेशो में बसा है। यह 1900 के दशक वाला जबरन जहाजों में अंग्रेजों द्वारा लाद कर भेजा गया मजदूर-किसान तबका नहीं है इनकी प्राथमिकताएं अलग हैं सो चिंतन भी स्वभाविक रूप से अलग ही होगा।
इसी कथित सांस्कृतिक पिछड़ेपन के चलते भारतीय एव अन्य एशियाई समाज से जुड़े तबकों में ‘ऑनर किलिंग’ जैसी घटनाओं का होना और यहाँ के प्रचार माध्यमों में आना कोई बड़ी बात नहीं है। कनाडा के सिख गुरुद्वारों में बाकायदा हथियार बंद झड़पें इस बात की शहादत है कि भारतीय समाज दुनिया के किसी भी उन्नत समाज में क्यों न रह रहा हो, वह अपनी तथाकथित ‘सर्वश्रेठ संस्कृति एवं धर्म’ का बोझा ढोते हुए खुद को पिछड़ा हुआ ही साबित करता है। वैज्ञानिक और बौद्धिक विकास की अनुपस्थिति उसके इस व्यवहार के लिए उत्तरदायी है, यह जरूरी नहीं कि विज्ञान पढ़ कर डॉक्टर इंजीनियर बनने वालो का चिंतन वैज्ञानिक ही हो।
अमेरिका में बसे भारतीय समुदाय के जिस हिस्से से मोदी को मुखर समर्थन मिला है उसमें डॉक्टर, इंजीनियर और आई टी प्रोफेशनल्स ही अधिक हैं। इनका वैज्ञानिक चिंतन इनके दाहिने हाथ की कलाई में बंधे धागे, गले में पड़े जनेऊ, कार में टंगी गणेश की मूर्ति और घरों के दरवाजों पर रखी देवी-देवताओं की तस्वीरों से स्पष्ट हो जाता है। कैंसर पर रिसर्च कर रही एक महिला डॉक्टर द्वारा भारत में रोज दस- पांच लोगो को फोन करके मोदी का प्रचार करने वाली बीबीसी हिन्दी सर्विस पर प्रसारित खबर अपने आप में बहुत कुछ कहती है।
इन पंक्तियों के लेखक को अपना देश छोड़े 12 साल से अधिक समय हो चुका है। कनाडा आने से पूर्व  7 सात वह मध्यपूर्व में बिता चुका है और अपने निजी अनुभवों के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि भारत में बढ़ रहे कट्टरपंथ के लिए हमारे समाज का अनपढ़ वर्ग जिम्मेदार नहीं है बल्कि उसके लिए कथित पढ़े लिखे लोग ही अधिक जिम्मेदार हैं और सबसे अधिक जिम्मेदार खामोश अधिसंख्यक वर्ग है जो न अपने जीवन में पोंगा पंडित है और न चिंतन में दकियानूस है लेकिन उसकी दिक्कत उसकी खामोशी है। वह इन मुद्दों पर हस्तक्षेप करना अपनी शान के खिलाफ समझता है। यह खामोशी अब आपराधिक बन चुकी है क्योंकि मुखर शक्तियों ने समाज के प्रत्येक संस्थान पर कब्ज़ा कर लिया है। अभी शायद वक्त है कि हम अपने वजूद को बचा पायें। कनाडा में अभी उन मजदूर किसानों के बेटे मौजूद हैं जिन्होंने पिछले वर्ष ग़दर पार्टी के शताब्दी समारोह पर बहुत उल्लेखनीय कार्यक्रम आयोजित किये। इसी गौरवमयी इतिहास में ऐसा बहुत कुछ छिपा हुआ है जिसके रास्ते पर चल कर मौजूदा फासीवादी संकटों से भी निपटा जा सकता है।
इस वक्त दुनिया के विभिन्न देशों में तीन करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग बसे हुए हैं जिनसे भारत सरकार के खजाने में प्रति वर्ष विदेशी मुद्रा आय 70 अरब डालर (2013) तक पहुँच गयी है। यह विदेशी मुद्रा आय भारत के सॉफ्टवेयर उद्योग से हुई प्राप्ति से 5 अरब डालर अधिक है। भारत को विदेशी मुद्रा से भी अधिक पश्चिमी संस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक, सरकारी संगठनों के बहुत से गुण सीखने हैं जिसके अभाव के चलते उसकी उन्नति संभव नहीं है। भारत की तथाकथित पाखंडपूर्ण संस्कृति पर जिसे गर्व हो उसे भारत में रह कर उसे जीना चाहिए। आज पश्चिम के उन मूल्यों को भारत में ले जाने की जरुरत है जिनके कारण वह समृद्ध और सशक्त हुआ है। भारतीय संस्कृति के संवाहक यदि इसी गति से इन देशो में पैर पसारते रहे तब वह दिन दूर नहीं जब धरती के इस हिस्से को भी वह धार्मिक-जातीय हिंसा में झोंक देंगे।

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शमशाद इलाही शम्स, लेखक “हस्तक्षेप” के टोरंटो (कनाडा) स्थित स्तंभकार हैं।

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