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प्रियंका गांधी के हमलों से घबराई भाजपा में हड़कंप

शेष नारायण सिंह
नई दिल्ली, 28 अप्रैल। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने पिछले छः महीने से कांग्रेस पार्टी और खासकर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और राबर्ट वाड्रा पर ज़बरदस्त जुबानी जंग छेड़ रखी है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी आमतौर पर ज़बानी मुकाबले में उस स्तर तक नहीं जाते जिस स्तर पर नरेंद्र मोदी जाते हैं। एकाध बार जब राहुल गांधी ने कोई सख्त बात कह दी तो नरेंद्र मोदी कहते सुने गए कि राहुल गांधी अपनी सीमा में रहें, या यह कि बस कुछ दिन बाकी हैं, एक-एक मिनट का हिसाब लूँगा। नरेंद्र मोदी इस तरह से बात कर रहे हैं जैसे 16 मई के बाद उनकी ही सरकार बन जायेगी। उनकी धमकियों पर आमतौर पर राहुल गांधी को चुप होते देखा गया था। कांग्रेस का चुनाव अभियान आम बैकफुट पर ही चल रहा था लेकिन प्रियंका गांधी ने सब कुछ बदल दिया है।
प्रियंका गांधी ने नरेंद्र मोदी और भाजपा पर सीधे हमले करके एक बार साबित कर दिया है कि अगर कांग्रेस ने जयपुर चिंतन बैठक के बाद पार्टी का काम राहुल गांधी को देकर पूरे देश में प्रचार का काम प्रियंका को दे दिया होता तो आज बात दूसरी होती। प्रियंका गांधी ने रायबरेली और अमेठी के कांग्रेस प्रचार के इंचार्ज के रूप में करीब हफ्ता भर पहले यह कहकर कि ‘यह लोग लड़कियों के साथ गलत काम करते हैं’ भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा में जाने के लिए विवश कर दिया था। उसके बाद नरेंद्र मोदी सहित बाकी भाजपा वालों ने प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा की कुछ कथित बेईमानियों को रेखांकित करना शुरू कर दिया।
 जब अरुण जेटली ने भी राबर्ट वाड्रा पर हमला किया तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि अरुण जेटली एक नामी वकील हैं उनको मालूम है कि राबर्ट वाड्रा पर कोई आपराधिक केस नहीं है वर्ना वे मीडिया के ज़रिये वाड्रा को बदनाम करने के बजाय उनके ऊपर आपराधिक मुक़दमा करवा देते। अरुण जेटली खुद एक बहुत ही मुश्किल चुनावी मुकाबले में हैं, लिहाजा उन्होंने बात को आगे नहीं बढ़ाया लेकिन भाजपा की पैदल सेना वाड्रा-वाड्रा करती रही। उसके बाद प्रियंका गांधी ने हमला और तेज़ कर दिया। उन्होंने कहा कि –

-“यह बौखलाए चूहों की तरह भाग रहे हैं। जितना करना है कर लें। मैं किसी से नहीं डरती। मैं इनकी विनाशक, नकारात्मक, और शर्मनाक राजनीति पर बोलती रहूँगी। और करें, चुप नहीं रहूँगी, बोलती रहूँगी।”

दिन में प्रियंका गांधी के इस बयान के बाद भाजपा के मुख्य प्रवक्ता, रविशंकर प्रसाद ने भाजपा की आधिकारिक प्रेस वार्ता में एक किताब और एक सीडी जारी की। “दामाद्श्री” नाम के इन प्रकाशनों में उन्हीं बातों को लिखा गया है जो भाजपा के छोटे नेता बहुत दिन से कहते आ रहे हैं। एक टीवी बहस में जब रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि वे इस बात पर एकाएक विश्वास नहीं कर सके कि उनके सीनियर वकील रविशंकर प्रसाद इस तरह की भाषा में छपी किताब से अपने आपको कभी भी जोड़ेंगे। टेलिविज़न कैमरों से पूरी दुनिया को बता दिया कि रविशंकर प्रसाद सुरजेवाला के बयान से खिसिया गए थे।
 इस प्रकाशन के बाद रायबरेली में प्रियंका गांधी से इस किताब के बारे में प्रतिक्रिया पूछी गयी तो उन्होंने कहा-

 “भाजपा का यही स्तर है। एक व्यक्ति, जो राजनीति में नहीं है,उसको इसलिए ज़लील करने की कोशिश की जा रही है कि वह इनके राजनीतिक विरोधी का रिश्तेदार है। यह भारत देश है जिसे चलाने के लिए छप्पन इंच का सीना नहीं, दरियादिल चाहिए। सत्ता का क्रूर बल नहीं, नैतिक शक्ति चाहिए।”

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के पास नैतिक शक्ति की कमी की बात को बहुत ही ज़ोरदार तरीके से रेखांकित करके प्रियंका गांधी ने साबित कर दिया है कि वे वास्तव में किसी तरह की घुड़की से नहीं डरतीं।
प्रियंका गांधी के भाजपा पर लगातार चल रहे हमलों से साफ़ हो गया है कि अब वे अमेठी और रायबरेली में इंचार्ज रहने के साथ साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाने वाली हैं। “दामादश्री” का प्रकाशन करके भाजपा ने उन्हें वह अवसर दे दिया है कि अब वे जो कुछ भी कहेगीं, वह समाचारों की सुर्खियाँ बनता रहेगा। मौजूदा राजनीतिक माहौल ऐसा है कि इस बात की संभावना भी है कि कांग्रेस को विपक्ष में रहना पडेगा। लेकिन उस हालत में भी अगर प्रियंका गांधी के धारदार हमले चलते रहे तो जल्दी ही कांग्रेस फिर से महत्व हासिल कर लगी। प्रियंका के हमले इंदिरा गांधी के 1978 के रोल की याद दिला देते हैं जब जनता पार्टी की सरकार के गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने कई आरोपों में इंदिरा गाँधी को गिरफ्तार करने के आदेश दिए। गिरफ्तारी के बाद इंदिरा गांधी, जो लगभग गुमनामी की ज़िंदगी बिता रही थीं, अखबारों की मुख्य खबर बन गयीं। उसके बाद तो रोज़ ही वे अखबारी सुर्ख़ियों में छाई रहीं। टेलिविज़न था नहीं, गिने चुने अखबार थे और समाचारों को गंभीरता से लिया जाता था। गिरफ्तारी के बाद इंदिरा गांधी ने जनता पार्टी के आपसी झगड़ों पर रोज़ ही बयान देना शुरू कर दिया और 1979 में जनता पार्टी को तोड़ दिया। उनको उन लोगों से सहानुभूति मिली जो अभी दो साल पहले उन्हें तानाशाह समझकर डर गये थे। उन्होंने फिर से, आपातकाल के दौरान हुई “गलतियों” के लिए चालाकी से माफी माँगी और भाषण देने लगीं। नतीजा यह हुआ कि हारी हुयी सरकार वापस ले ली।
लगता है कि दामाद्श्री प्रकरण के बाद भाजपा ने एक बार फिर पहल इंदिरा गांधी की पौत्री प्रियंका की झोली में डाल दिया है। अब प्रियंका गांधी के पास भाजपा के नेताओं को क्रूर और गैरज़िम्मेदार साबित करने का मौक़ा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले कुछ महीनों में प्रियंका गांधी भाजपा पर हमले किस तरह से तेज़ करती हैं।

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